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Bhagoriya: पर्व में आदिवासी परंपरा के साथ अब आधुनिकता भी झलकने लगी, कुल्फियों के साथ सेल्फियां, देखें तस्वीरें

Thu, 21 Mar 2024 10:34 PM IST
अभिषेक चेंडके न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: अभिषेक चेंडके Updated Thu, 21 Mar 2024 10:34 PM IST
सार

भगोरिया की पहचान पंद्रह-बीस बरस मेले में मदिरा पान,मांदल की थाप पर नृत्य और हाट मेें विवाह के लिए कन्या को पसंद करना और उसे हाट से ले जाना होता है, लेकिन अब आदिवासी कन्याएं भी विवाह सोच समझ कर करती है। अब गिने-चुने वैवाहिक रिश्ते ही आगे बढ़ते है।

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Indore: Now modernity along with tradition is visible in Bhagoria, selfies along with Kulfis
भगोरिया पर्व - फोटो : अमर उजाला

होली के पहले आने वाला भगोरिया पर्व आदिवासी अंचल की उत्सवी बयारों में उमंग और उल्लास घोल दिया है। अब भगोरिया में परंपरा के साथ आधुनिकता ने भी जगह ले ली है, मेले-हाट में सजे-धजी आदिवासी युवक-युवतियां के हाथ में कुल्फियों के साथ सेल्फियां भी लेने लगे है। महंगे गजेंट्स, ईयर फोन के साथ परंपरागत आभूषण और लिबास बदलते दौर की कहानी बयां कर रहे है।



 

Indore: Now modernity along with tradition is visible in Bhagoria, selfies along with Kulfis
भगोरिया पर्व का उल्लास - फोटो : अमर उजाला

जनजातीय संस्कृति का महापर्व भगोरिया इस वर्ष 18 मार्च से शुरू हो चुका है। मालवा-निमाड़ के ग्रामीण अंचल फिर उमंग और उल्लास के साथ भगोरिया हाट लगने का इंतजार कर रहे। हर क्षेत्र मेें अलग-अलग समय में भगोरिया होता है। पड़ोसी राज्यों में मजदूरी करने गए मेहनतकश परिवारजन भी भगोरिया और होली मनाने के लिए अपने-अपने गांव-फलियों में लौटने लगे हैं। ग्रामीण ढोल-मांदल की दुरुस्ती करने जुट गए हैं।

Indore: Now modernity along with tradition is visible in Bhagoria, selfies along with Kulfis
भगोरिया पर्व का उल्लास - फोटो : अमर उजाला

भगोरिया की पहचान पंद्रह-बीस बरस मेले में मदिरा पान,मांदल की थाप पर नृत्य और हाट मेें विवाह के लिए कन्या को पसंद करना और उसे हाट से ले जाना होता है, लेकिन अब आदिवासी कन्याएं भी विवाह सोच समझ कर करती है। हाट के दौरान अब गिने-चुने वैवाहिक रिश्ते ही आगे बढ़ते है। अब भगोरिया एक त्योहार, ग्रामीण बाजारों की ग्राहकी और पर्यटकों के लिए एक इवेेंट की तरह है।
 

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Indore: Now modernity along with tradition is visible in Bhagoria, selfies along with Kulfis
भगोरिया पर्व का उल्लास - फोटो : अमर उजाला

हजारों लोग भगोरिया मेले को देखने आते है और आदिवासी संस्कृति को करीब से जानते हैै। गुरुवार को सोंडवा गांव मेें भगोरिया हाट लगा। आदिवासी युवतियां कलर थीम के साथ पारंपरिक वस्त्रों को पहन कर आई थी। युवक भी सजे सवरे थे और आंखो पर सन ग्लासेस पहने बांसुरी बजाते, नृत्य करने नजर आ रहे थे। हाट में भीड़ के बावजूद एक अनुशासन था। हर तरफ पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल-मांदल के साथ थाली की खनक पर लयबद्ध थिरकन का दौर रहा था।

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भगोरिया पर्व का उल्लास - फोटो : अमर उजाला

राज भोज के समय हुई थी भगोरिया की शुरुआत
माना जाता है कि भगोरिया की शुरुआत राजा भोज के कालखंड में हुई थी। तत्कालीन भील राजाओं कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी भगोर में मेले की शुरुआत की। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी यह आयोजन होने लगा। कालांतर में स्थानीय हाट और मेलों में लोग इसे भगोरिया कहने लगे। पश्चिमी निमाड़, झाबुआ-आलीराजपुर, धार, बड़वानी में भगोरिया अधिक धूमधाम से मनाया जाता है। भगोरिया के दौरान ग्रामीण जन ढोल-मांदल एवं बांसुरी बजाते हुए मस्ती में झूमते हैं। गुड़ की जलेबी, भजिये, खारिये (सेंव), पान, कुल्फी की दुकानों से मेले सजे रहते है। आदिवासी समाज इस त्योहार की खुशियों मेें इस बार भी सराबोर नजर आ रहा हैै। 

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