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Indore News: कौवे गायब, कौन खाएगा श्राद्ध का भोग, पर्यावरण प्रदूषण ने खत्म किए पक्षी
Tue, 01 Oct 2024 08:06 PM IST
अर्जुन रिछारिया
अमर उजाला, डिजीटल डेस्क, इंदौर
अमर उजाला, डिजीटल डेस्क, इंदौर
Published by: अर्जुन रिछारिया
Updated Tue, 01 Oct 2024 08:06 PM IST
सार
शहरवासी श्राद्ध का भोग खिलाने के लिए जगह जगह भटक रहे हैं लेकिन कहीं पर भी कौवे नहीं हैं, प्रदूषण और अन्य कारणों की वजह से कौवे खत्म हो गए हैं।
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राजकुमार ब्रिज पर अब नजर नहीं आते कौवे।
- फोटो : अमर उजाला, इंदौर
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विस्तार
एक समय कौवे दिनभर गांव-शहर में छतों या मुंडेर पर बैठकर कांव-कांव करते रहते थे लेकिन अब तलाशने पर भी कौवे नजर नहीं आते हैं। कल सर्वपितृ अमावस्या है और अब श्राद्ध पक्ष में भोग मिलने पर भी कौवे नहीं आते हैं। लोग उन्हें भोग खिलाने के लिए तलाशते रहते हैं। एक ओर जहां भारतीय संस्कृति में कौओं को पितृपक्ष में बहुत सम्मान दिया जाता है, उन्हें भोजन खिलाया जाता है, वहीं यह गहन चिंता का विषय है कि पिछले कुछ वर्षों से कौवे शहर और गांवों से गायब होते जा रहे हैं। कौवे ग्रामीण अंचलों में तो फिर भी कहीं-कहीं दिख जाते हैं लेकिन शहरी वातावरण में अब बड़ी मुश्किल से नजर आते हैं।
विकास ने छीन लिए पक्षी
पर्यावरण विशेषज्ञ ओपी जोशी बताते हैं कि बढ़ती मानव आबादी के साथ बढ़ते कंक्रीट के जंगल और उसी के साथ निरंतर कम होती हरियाली कौओं के प्राकृतिक आवास छिनने के लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा खेतों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग, मोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडियोधर्मी किरणें और बढ़ता प्रदूषण भी कौओं के पलायन का बड़ा कारण है। विशेषज्ञों के अनुसार गांव हों या शहर, हरियाली तेजी से गायब होती जा रही है, पुराने और बड़े-बड़े पेड़ काटे जा रहे हैं। इन सब वजह से कौवे गायब होते जा रहे हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कौवे हमारे पर्यावरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। वे कचरा साफ करते हैं और कीड़े-मकोड़ों को खाकर फसलों को बचाते हैं। इसलिए हमें कौओं की रक्षा के लिए प्रयास करने चाहिए।
क्यों गायब हो रहे कौवे
प्राकृतिक आवास का नष्ट होना: शहरीकरण और पेड़ों की कटाई से उनके प्राकृतिक आवास कम हो रहे हैं। कौवे पेड़ों पर घोंसले बनाते हैं, और जब पेड़ कट जाते हैं, तो उनके पास रहने के लिए जगह नहीं बचती।
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प्रदूषण: वायु, जल, और ध्वनि प्रदूषण की वजह से भी पक्षियों की संख्या प्रभावित हो रही है। जहरीले रसायन और कीटनाशक भी उनके भोजन और जीवन चक्र पर असर डालते हैं।
खाद्य संसाधनों की कमी: शहरी क्षेत्रों में कचरे का प्रबंधन बेहतर हो रहा है, जिससे कौओं को आसानी से भोजन नहीं मिल पाता। पहले वे कचरे में से खाना ढूंढ लेते थे, लेकिन अब उन्हें यह कठिनाई हो रही है।
मोबाइल टावर और रेडिएशन: मोबाइल टावरों और उनसे निकलने वाले रेडिएशन का भी पक्षियों, विशेष रूप से छोटे पक्षियों पर बुरा असर पड़ रहा है, जिसमें कौवे भी शामिल हो सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन: मौसम में हो रहे बदलाव भी कई पक्षियों की आदतों और प्रवास के तरीके को बदल रहे हैं। हो सकता है कि कौवे अब पहले की तुलना में किसी और क्षेत्र में चले जा रहे हों या उनकी जनसंख्या में कमी आ रही हो।
प्रजनन दर में कमी: पर्यावरणीय परिवर्तन और प्रदूषण के कारण कौओं की प्रजनन दर कम हो सकती है।
कीटनाशकों का प्रयोग: कृषि में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से कौओं के लिए भोजन की कमी हो सकती है और उनकी मृत्यु भी हो सकती है।
कौवे को बचाने के लिए क्या करें हम
पेड़ लगाएं: अपने आसपास अधिक से अधिक पेड़ लगाएं ताकि कौओं के रहने के लिए जगह बने।
प्रदूषण कम करें: प्रदूषण कम करने के लिए प्रयास करें।
खाद्य पदार्थों को खुले में न फेंके: खाद्य पदार्थों को कूड़ेदान में डालें ताकि कौवे उन्हें न खा सकें।
कीटनाशकों का कम से कम उपयोग करें: जैविक खेती को बढ़ावा दें।
जागरूकता फैलाएं: लोगों को कौओं के महत्व के बारे में बताएं।
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विकास ने छीन लिए पक्षी
पर्यावरण विशेषज्ञ ओपी जोशी बताते हैं कि बढ़ती मानव आबादी के साथ बढ़ते कंक्रीट के जंगल और उसी के साथ निरंतर कम होती हरियाली कौओं के प्राकृतिक आवास छिनने के लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा खेतों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग, मोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडियोधर्मी किरणें और बढ़ता प्रदूषण भी कौओं के पलायन का बड़ा कारण है। विशेषज्ञों के अनुसार गांव हों या शहर, हरियाली तेजी से गायब होती जा रही है, पुराने और बड़े-बड़े पेड़ काटे जा रहे हैं। इन सब वजह से कौवे गायब होते जा रहे हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कौवे हमारे पर्यावरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। वे कचरा साफ करते हैं और कीड़े-मकोड़ों को खाकर फसलों को बचाते हैं। इसलिए हमें कौओं की रक्षा के लिए प्रयास करने चाहिए।
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क्यों गायब हो रहे कौवे
प्राकृतिक आवास का नष्ट होना: शहरीकरण और पेड़ों की कटाई से उनके प्राकृतिक आवास कम हो रहे हैं। कौवे पेड़ों पर घोंसले बनाते हैं, और जब पेड़ कट जाते हैं, तो उनके पास रहने के लिए जगह नहीं बचती।
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प्रदूषण: वायु, जल, और ध्वनि प्रदूषण की वजह से भी पक्षियों की संख्या प्रभावित हो रही है। जहरीले रसायन और कीटनाशक भी उनके भोजन और जीवन चक्र पर असर डालते हैं।
खाद्य संसाधनों की कमी: शहरी क्षेत्रों में कचरे का प्रबंधन बेहतर हो रहा है, जिससे कौओं को आसानी से भोजन नहीं मिल पाता। पहले वे कचरे में से खाना ढूंढ लेते थे, लेकिन अब उन्हें यह कठिनाई हो रही है।
मोबाइल टावर और रेडिएशन: मोबाइल टावरों और उनसे निकलने वाले रेडिएशन का भी पक्षियों, विशेष रूप से छोटे पक्षियों पर बुरा असर पड़ रहा है, जिसमें कौवे भी शामिल हो सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन: मौसम में हो रहे बदलाव भी कई पक्षियों की आदतों और प्रवास के तरीके को बदल रहे हैं। हो सकता है कि कौवे अब पहले की तुलना में किसी और क्षेत्र में चले जा रहे हों या उनकी जनसंख्या में कमी आ रही हो।
प्रजनन दर में कमी: पर्यावरणीय परिवर्तन और प्रदूषण के कारण कौओं की प्रजनन दर कम हो सकती है।
कीटनाशकों का प्रयोग: कृषि में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से कौओं के लिए भोजन की कमी हो सकती है और उनकी मृत्यु भी हो सकती है।
कौवे को बचाने के लिए क्या करें हम
पेड़ लगाएं: अपने आसपास अधिक से अधिक पेड़ लगाएं ताकि कौओं के रहने के लिए जगह बने।
प्रदूषण कम करें: प्रदूषण कम करने के लिए प्रयास करें।
खाद्य पदार्थों को खुले में न फेंके: खाद्य पदार्थों को कूड़ेदान में डालें ताकि कौवे उन्हें न खा सकें।
कीटनाशकों का कम से कम उपयोग करें: जैविक खेती को बढ़ावा दें।
जागरूकता फैलाएं: लोगों को कौओं के महत्व के बारे में बताएं।
