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Indore News: 33 साल बाद भी हुकुमचंद मिल से जुड़े 380 परिवारों को नहीं मिला उनके हक का पैसा
Mon, 31 Aug 2026 07:52 AM IST
Abhishek Chendke
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Abhishek Chendke
Updated Mon, 31 Aug 2026 07:52 AM IST
सार
हुकुमचंद मिल की जमीन बिकने के दो साल बाद भी 380 श्रमिक परिवारों को उनका हक नहीं मिल पाया है। एक से ज्यादा वारिस वाले 380 परिवारों की 80 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अब भी अटकी हुई है।
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हुकमचंद मिल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दो साल पहले इंदौर की बंद पड़ी हुकुमचंद मिल की 41 एकड़ जमीन बिकने के बाद आए 380 करोड़ रुपये साढ़े चार हजार से ज्यादा श्रमिकों और उनके परिवारों के खातों में डाल दिए गए, लेकिन 380 श्रमिकों के परिवारों को अभी भी पैसा नहीं मिला है। इन परिवारों में श्रमिक और उनकी पत्नी की मौत हो चुकी है तथा उनके एक से ज्यादा वारिस हैं।
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कोर्ट ने इन्हें थर्ड पार्टी वारिस माना है। हाईकोर्ट द्वारा गठित कमेटी ने इन परिवारों के आवेदनों का सत्यापन कर लिस्ट परिसमापक को सौंपी है, लेकिन पैसा अभी तक नहीं मिल पाया है। यह राशि 80 करोड़ रुपये से ज्यादा की है। यह राशि दो साल बाद भी वितरित नहीं हो पाई है। दरअसल, एक से ज्यादा वारिस होने के कारण 380 परिवारों के केस का निराकरण बाद में करने का फैसला कमेटी ने लिया था, जो श्रमिक या उनकी पत्नी जीवित थी, उन्हें भुगतान करने में कोई परेशानी नहीं आई। उनका भुगतान तीन माह के भीतर ही हो गया था, लेकिन कुछ श्रमिकों के वारिसों ने आपत्ति लगाना शुरू कर दी थी कि वे वारिस हैं और भुगतान उनके खाते में किया जाए। इसके बाद कमेटी ने पैसा भुगतान करने में सावधानी बरतना शुरू कर दिया।
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थर्ड पार्टी के मामलों में दिक्कत
श्रमिक नेता नरेंद्र श्रीवंश का कहना है कि थर्ड पार्टी के प्रकरणों के निपटारे के लिए पिछले साल जाहिर सूचना जारी हुई थी। इसके बाद 380 श्रमिकों के परिजनों के हर आवेदन फॉर्म का निराकरण किया गया था। इसके लिए एक से अधिक वारिसों की सहमति भी मिल चुकी थी। इसके बाद भुगतान के लिए लिस्ट परिसमापक को भेज दी गई है, लेकिन अभी तक पैसा खातों में नहीं आया है।
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बता दें, किसी वक्त सूती कपड़ों के मामले में इंदौर की हुकुमचंद मिल काफी प्रसिद्ध थी, लेकिन 33 साल पहले यह अचानक बंद हो गई थी और श्रमिकों के पीएफ और अन्य भुगतान का पैसा अटक गया था। श्रमिकों ने वर्षों तक हाईकोर्ट में अपनी लड़ाई लड़ी। कोर्ट ने जमीन बेचकर किसानों को पैसा देने का फैसला लिया। इसके बाद नगर निगम ने हाउसिंग बोर्ड को जमीन बेची और इसमें से पैसा श्रमिकों को वितरित किया गया।
