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भागीरथपुरा मामला: हाईकोर्ट का रिपोर्ट सार्वजनिक करने से इंकार, वकील बोले- अफसरों की जिम्मेदारी, मुआवजे की सिफा
Sat, 29 Aug 2026 06:34 PM IST
Arjun Richhariya
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Arjun Richhariya
Updated Sat, 29 Aug 2026 06:34 PM IST
सार
इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में हाईकोर्ट की एक सदस्यीय न्यायिक समिति की रिपोर्ट में 36 में से 24 मौतों का कारण दूषित पानी माना गया है। रिपोर्ट में मृतकों के परिजनों को 20 लाख रुपए और प्रभावितों को 5 लाख रुपए मुआवजा देने की सिफारिश की गई है।
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भागीरथपुरा हादसे के समय का एक मार्मिक दृश्य।
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
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विस्तार
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में हुए दूषित पानी केस में 36 लोगों की मौत के मामले की जांच के लिए गठित हाईकोर्ट की एक सदस्यीय न्यायिक समिति की रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बिंदु उजागर हुए हैं। हालांकि, यह जांच रिपोर्ट अभी आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसके मुख्य अंशों की जानकारी सामने आई है। वहीं, अधिवक्ता रितेश इनानी ने कहा कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करने संबंधी आवेदन पर हाईकोर्ट द्वारा आगामी सुनवाई में निर्णय लिए जाने की संभावना है।
केस से जुड़े वकीलों के अनुसार, रिपोर्ट में कुल 36 मौतों में से 24 मौतों का सीधा कारण दूषित पानी के सेवन को माना गया है, जबकि शेष 12 मौतों के संदर्भ में स्थिति को स्पष्ट नहीं बताया गया है। जांच समिति ने अपनी अनुशंसाओं में दूषित पानी से जान गंवाने वाले मृतकों के परिजनों को 20 लाख रुपए का मुआवजा देने की सिफारिश की है। इसके साथ ही, दूषित पानी के कारण गंभीर रूप से बीमार या प्रभावित हुए नागरिकों के लिए 5 लाख रुपए के मुआवजे का सुझाव दिया गया है। वकीलों के अनुसार रिपोर्ट में मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) और जनप्रतिनिधियों को क्लीन चिट दिए जाने की बात भी सामने आई है।
पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया में देरी से हुई घटना
वकीलों के अनुसार, भागीरथपुरा क्षेत्र में भीषण दूषित पानी त्रासदी के पीछे पेयजल पाइपलाइन से जुड़े कार्यों में हुई देरी को प्राथमिक वजह माना गया है। पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है कि यदि समय रहते पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइपलाइन को बदल दिया जाता, तो दूषित पानी मिलने जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। जांच समिति ने इस पूरे घटनाक्रम में संबंधित प्रशासनिक और तकनीकी अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में पाइपलाइन निर्माण कार्य और उससे जुड़ी टेंडर प्रक्रिया में हुई हीला-हवाली को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।
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प्रशासनिक और तकनीकी अधिकारियों की लापरवाही उजागर
वकीलों के अनुसार, पाइपलाइन कार्य की सुस्त रफ्तार और लापरवाही के लिए नगर पालिक निगम के जल कार्य विभाग से जुड़े अधिकारियों की कार्यशैली को जिम्मेदार माना गया है। इसके अलावा, टेंडर जारी करने और प्रशासनिक स्वीकृतियों की प्रक्रिया में हुई देरी का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है। चूंकि हाईकोर्ट में प्रस्तुत इस रिपोर्ट की आधिकारिक प्रति अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, इसलिए इसमें शामिल निष्कर्षों और सिफारिशों पर अंतिम मुहर अदालत की आगामी सुनवाई और आने वाले आदेश के बाद ही लगेगी।
जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ नेतृत्व को राहत
वकीलों के अनुसार महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जांच समिति ने इस पूरी घटना के लिए किसी भी स्थानीय जनप्रतिनिधि की सीधी जवाबदेही तय नहीं की है। इसके अतिरिक्त, नगर निगम की सर्वोच्च नीति-निर्धारक संस्था मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) को भी मामले में क्लीन चिट दे दी गई है। इसी प्रकार कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को भी इसमें सीधे जिम्मेदार नहीं माना गया है। न्यायिक जांच समिति ने घटना का मुख्य कारण निचले एवं मध्य स्तरीय प्रशासनिक और तकनीकी विभागों की विफलता को माना है। इसमें मुख्य रूप से दो अधिकारियों को इस घटना में दोषी माना गया है लेकिन अभी उनके नामों पर कोर्ट द्वारा अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कानूनी मांग
वकीलों के अनुसार याचिकाकर्ता पक्ष ने इसे पूरी तरह सार्वजनिक करने और इसकी प्रमाणित प्रति सभी पक्षकारों को सौंपने की मांग उठाई है। याचिकाकर्ता प्रमोद द्विवेदी की ओर से अधिवक्ता मनीष यादव ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत किया। वकीलों के अनुसार, यह मामला केवल भागीरथपुरा में हुई मौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य इंदौर शहर के किसी भी अन्य क्षेत्र में भविष्य में ऐसी भयावह घटना की पुनरावृत्ति को रोकना और संपूर्ण पेयजल आपूर्ति प्रणाली में कड़ा जवाबदेही तंत्र स्थापित करना है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि न्यायिक जांच में दूषित पानी को मौतों का कारण माना गया है, तो पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा और दोषियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।
रिपोर्ट रजिस्ट्रार के पास सुरक्षित, अदालती निर्णय का इंतजार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा गठित सेवानिवृत्त जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाली एक सदस्यीय जांच समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत कर दी है। वर्तमान में इस रिपोर्ट को सार्वजनिक न करते हुए हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के पास सुरक्षित रखा गया है। प्रकरण से जुड़े सभी पक्षकारों के अधिकृत अधिवक्ता रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर रिपोर्ट का अवलोकन कर सकते हैं। अधिवक्ता रितेश इनानी ने कहा कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करने संबंधी आवेदन पर हाईकोर्ट द्वारा आगामी सुनवाई में निर्णय लिए जाने की संभावना है।
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केस से जुड़े वकीलों के अनुसार, रिपोर्ट में कुल 36 मौतों में से 24 मौतों का सीधा कारण दूषित पानी के सेवन को माना गया है, जबकि शेष 12 मौतों के संदर्भ में स्थिति को स्पष्ट नहीं बताया गया है। जांच समिति ने अपनी अनुशंसाओं में दूषित पानी से जान गंवाने वाले मृतकों के परिजनों को 20 लाख रुपए का मुआवजा देने की सिफारिश की है। इसके साथ ही, दूषित पानी के कारण गंभीर रूप से बीमार या प्रभावित हुए नागरिकों के लिए 5 लाख रुपए के मुआवजे का सुझाव दिया गया है। वकीलों के अनुसार रिपोर्ट में मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) और जनप्रतिनिधियों को क्लीन चिट दिए जाने की बात भी सामने आई है।
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पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया में देरी से हुई घटना
वकीलों के अनुसार, भागीरथपुरा क्षेत्र में भीषण दूषित पानी त्रासदी के पीछे पेयजल पाइपलाइन से जुड़े कार्यों में हुई देरी को प्राथमिक वजह माना गया है। पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है कि यदि समय रहते पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइपलाइन को बदल दिया जाता, तो दूषित पानी मिलने जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। जांच समिति ने इस पूरे घटनाक्रम में संबंधित प्रशासनिक और तकनीकी अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में पाइपलाइन निर्माण कार्य और उससे जुड़ी टेंडर प्रक्रिया में हुई हीला-हवाली को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।
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प्रशासनिक और तकनीकी अधिकारियों की लापरवाही उजागर
वकीलों के अनुसार, पाइपलाइन कार्य की सुस्त रफ्तार और लापरवाही के लिए नगर पालिक निगम के जल कार्य विभाग से जुड़े अधिकारियों की कार्यशैली को जिम्मेदार माना गया है। इसके अलावा, टेंडर जारी करने और प्रशासनिक स्वीकृतियों की प्रक्रिया में हुई देरी का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है। चूंकि हाईकोर्ट में प्रस्तुत इस रिपोर्ट की आधिकारिक प्रति अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, इसलिए इसमें शामिल निष्कर्षों और सिफारिशों पर अंतिम मुहर अदालत की आगामी सुनवाई और आने वाले आदेश के बाद ही लगेगी।
जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ नेतृत्व को राहत
वकीलों के अनुसार महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जांच समिति ने इस पूरी घटना के लिए किसी भी स्थानीय जनप्रतिनिधि की सीधी जवाबदेही तय नहीं की है। इसके अतिरिक्त, नगर निगम की सर्वोच्च नीति-निर्धारक संस्था मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) को भी मामले में क्लीन चिट दे दी गई है। इसी प्रकार कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को भी इसमें सीधे जिम्मेदार नहीं माना गया है। न्यायिक जांच समिति ने घटना का मुख्य कारण निचले एवं मध्य स्तरीय प्रशासनिक और तकनीकी विभागों की विफलता को माना है। इसमें मुख्य रूप से दो अधिकारियों को इस घटना में दोषी माना गया है लेकिन अभी उनके नामों पर कोर्ट द्वारा अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कानूनी मांग
वकीलों के अनुसार याचिकाकर्ता पक्ष ने इसे पूरी तरह सार्वजनिक करने और इसकी प्रमाणित प्रति सभी पक्षकारों को सौंपने की मांग उठाई है। याचिकाकर्ता प्रमोद द्विवेदी की ओर से अधिवक्ता मनीष यादव ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत किया। वकीलों के अनुसार, यह मामला केवल भागीरथपुरा में हुई मौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य इंदौर शहर के किसी भी अन्य क्षेत्र में भविष्य में ऐसी भयावह घटना की पुनरावृत्ति को रोकना और संपूर्ण पेयजल आपूर्ति प्रणाली में कड़ा जवाबदेही तंत्र स्थापित करना है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि न्यायिक जांच में दूषित पानी को मौतों का कारण माना गया है, तो पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा और दोषियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।
रिपोर्ट रजिस्ट्रार के पास सुरक्षित, अदालती निर्णय का इंतजार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा गठित सेवानिवृत्त जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाली एक सदस्यीय जांच समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत कर दी है। वर्तमान में इस रिपोर्ट को सार्वजनिक न करते हुए हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के पास सुरक्षित रखा गया है। प्रकरण से जुड़े सभी पक्षकारों के अधिकृत अधिवक्ता रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर रिपोर्ट का अवलोकन कर सकते हैं। अधिवक्ता रितेश इनानी ने कहा कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करने संबंधी आवेदन पर हाईकोर्ट द्वारा आगामी सुनवाई में निर्णय लिए जाने की संभावना है।
