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दुर्लभ केसः 20 मिनट तक रुकी रहीं सांसें और थम गया खून, 8 घंटे चले खतरनाक ऑपरेशन से बची बुजुर्ग की जान
Thu, 01 Oct 2026 08:47 PM IST
Arjun Richhariya
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Arjun Richhariya
Updated Thu, 01 Oct 2026 08:47 PM IST
सार
इंदौर के डॉक्टरों ने 65 वर्षीय बुजुर्ग की किडनी से ढाई किलो की कैंसर गांठ और फेफड़ों की नस तक फैले ट्यूमर को सफलतापूर्वक निकाला है। 8 घंटे चली इस जटिल सर्जरी में मरीज का तापमान 18 डिग्री घटाकर 20 मिनट तक ब्लड फ्लो रोका गया था।
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INDORE NEWS
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
विस्तार
इंदौर में चिकित्सा क्षेत्र की एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। शहर के सर्जनों की एक संयुक्त टीम ने एक 65 वर्षीय मरीज की बेहद जटिल और दुर्लभ सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देकर उन्हें नया जीवन दिया है। मरीज दिनेश गुप्ता की दायीं किडनी में लगभग ढाई किलोग्राम वजन की कैंसर की गांठ थी। यह ट्यूमर इतना खतरनाक रूप ले चुका था कि वह शरीर की मुख्य रक्त वाहिका यानी इंफीरियर वेना कावा (आईवीसी) से होते हुए फेफड़ों तक जाने वाली पल्मोनरी आर्टरी तक फैल गया था। डॉक्टरों ने न केवल किडनी से गांठ को निकाला, बल्कि खून की नसों और फेफड़ों की रक्त वाहिका में घुसे ट्यूमर को भी पूरी तरह साफ कर दिया।
दो महीने से खांसी, सांस की तकलीफ और कमर दर्द से पीड़ित थे मरीज
इंदौर निवासी 65 वर्षीय दिनेश गुप्ता पिछले दो महीनों से लगातार खांसी, सांस लेने में असमर्थता और कमर दर्द की समस्या से जूझ रहे थे। शुरुआती लक्षणों के बाद जब उनका सीटी स्कैन और इको टेस्ट कराया गया, तो रिपोर्ट देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए। रिपोर्ट में किडनी में भारी-भरकम कैंसर गांठ के साथ-साथ खून की नसों तक ट्यूमर के प्रसार का खुलासा हुआ। गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें 3 सितंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने तुरंत ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार की।
टोटल सर्कुलेटरी अरेस्ट तकनीक का इस्तेमाल कर 20 मिनट रोका गया ब्लड फ्लो
सर्जरी की जटिलता को देखते हुए यूरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ जुल्का और कार्डियक सर्जन डॉ. मनीष पोरवाल के नेतृत्व में यह ऑपरेशन किया गया। सर्जरी के दौरान मरीज को बायपास मशीन पर रखा गया। फेफड़ों की खून की नस से ट्यूमर को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए डॉक्टरों ने टोटल सर्कुलेटरी अरेस्ट की दुर्लभ और जोखिम भरी प्रक्रिया का सहारा लिया। इस तकनीक के तहत मरीज के शरीर का तापमान घटाकर लगभग 18 डिग्री सेल्सियस तक लाया गया और लगभग 20 मिनट के लिए पूरे शरीर में रक्त का प्रवाह रोक दिया गया, ताकि बिना किसी रक्तस्राव के ट्यूमर को निकाला जा सके।
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एनेस्थीसिया और शरीर के तापमान की लगातार मॉनिटरिंग रही बेहद अहम
इस संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. विजय महाजन और उनकी टीम का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। डॉक्टरों के अनुसार जब शरीर का तापमान 18 डिग्री तक गिराया जाता है और रक्त प्रवाह बंद किया जाता है, तब मरीज के ऑक्सीजन स्तर, मस्तिष्क और हृदय की गतिविधियों तथा शरीर के तापमान की प्रति सेकंड मॉनिटरिंग करना अनिवार्य होता है। इस दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती थी, लेकिन मेडिकल टीम ने सभी मानकों का पूरी सटीकता के साथ पालन किया।
8 घंटे चली मैराथन सर्जरी के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ, एक सप्ताह में डिस्चार्ज
यह बेहद कठिन ऑपरेशन लगभग 8 घंटे तक चला। बायपास और सर्कुलेटरी अरेस्ट जैसी प्रक्रियाओं के बाद मरीज में ब्रेन स्ट्रोक या हार्ट फेलियर जैसी जटिलताओं का जोखिम काफी अधिक रहता है। इसलिए सर्जरी के बाद मरीज को आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। डॉक्टरों की गहन देखभाल के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ और उन्हें एक सप्ताह के भीतर अस्पताल से सकुशल डिस्चार्ज कर दिया गया।
मल्टी-स्पेशलिटी टीम के तालमेल से मिली सफलता, सेंट्रल इंडिया का पहला मामला होने का दावा
डॉक्टरों के मुताबिक कुल कैंसर मामलों में किडनी कैंसर लगभग 4 प्रतिशत पाया जाता है, लेकिन किडनी के ट्यूमर का खून की नसों से होते हुए फेफड़ों की पल्मोनरी आर्टरी तक पहुंचना अत्यंत दुर्लभ स्थिति है। इस सफल ऑपरेशन में यूरोलॉजी, कार्डियक सर्जरी और एनेस्थीसिया टीम के बीच का तालमेल निर्णायक रहा। सर्जिकल टीम में डॉ. सौरभ जुल्का, डॉ. मनीष पोरवाल, डॉ. विजय महाजन, डॉ. आशीष जैन, डॉ. राजेश कुकरेजा और डॉ. करण पोरवाल सहित नर्सिंग स्टाफ शामिल रहा। अस्पताल प्रशासन ने इसे मध्य भारत (सेंट्रल इंडिया) में इस तरह का पहला सफल ऑपरेशन होने का दावा किया है।
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दो महीने से खांसी, सांस की तकलीफ और कमर दर्द से पीड़ित थे मरीज
इंदौर निवासी 65 वर्षीय दिनेश गुप्ता पिछले दो महीनों से लगातार खांसी, सांस लेने में असमर्थता और कमर दर्द की समस्या से जूझ रहे थे। शुरुआती लक्षणों के बाद जब उनका सीटी स्कैन और इको टेस्ट कराया गया, तो रिपोर्ट देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए। रिपोर्ट में किडनी में भारी-भरकम कैंसर गांठ के साथ-साथ खून की नसों तक ट्यूमर के प्रसार का खुलासा हुआ। गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें 3 सितंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने तुरंत ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार की।
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टोटल सर्कुलेटरी अरेस्ट तकनीक का इस्तेमाल कर 20 मिनट रोका गया ब्लड फ्लो
सर्जरी की जटिलता को देखते हुए यूरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ जुल्का और कार्डियक सर्जन डॉ. मनीष पोरवाल के नेतृत्व में यह ऑपरेशन किया गया। सर्जरी के दौरान मरीज को बायपास मशीन पर रखा गया। फेफड़ों की खून की नस से ट्यूमर को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए डॉक्टरों ने टोटल सर्कुलेटरी अरेस्ट की दुर्लभ और जोखिम भरी प्रक्रिया का सहारा लिया। इस तकनीक के तहत मरीज के शरीर का तापमान घटाकर लगभग 18 डिग्री सेल्सियस तक लाया गया और लगभग 20 मिनट के लिए पूरे शरीर में रक्त का प्रवाह रोक दिया गया, ताकि बिना किसी रक्तस्राव के ट्यूमर को निकाला जा सके।
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एनेस्थीसिया और शरीर के तापमान की लगातार मॉनिटरिंग रही बेहद अहम
इस संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. विजय महाजन और उनकी टीम का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। डॉक्टरों के अनुसार जब शरीर का तापमान 18 डिग्री तक गिराया जाता है और रक्त प्रवाह बंद किया जाता है, तब मरीज के ऑक्सीजन स्तर, मस्तिष्क और हृदय की गतिविधियों तथा शरीर के तापमान की प्रति सेकंड मॉनिटरिंग करना अनिवार्य होता है। इस दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती थी, लेकिन मेडिकल टीम ने सभी मानकों का पूरी सटीकता के साथ पालन किया।
8 घंटे चली मैराथन सर्जरी के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ, एक सप्ताह में डिस्चार्ज
यह बेहद कठिन ऑपरेशन लगभग 8 घंटे तक चला। बायपास और सर्कुलेटरी अरेस्ट जैसी प्रक्रियाओं के बाद मरीज में ब्रेन स्ट्रोक या हार्ट फेलियर जैसी जटिलताओं का जोखिम काफी अधिक रहता है। इसलिए सर्जरी के बाद मरीज को आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। डॉक्टरों की गहन देखभाल के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ और उन्हें एक सप्ताह के भीतर अस्पताल से सकुशल डिस्चार्ज कर दिया गया।
मल्टी-स्पेशलिटी टीम के तालमेल से मिली सफलता, सेंट्रल इंडिया का पहला मामला होने का दावा
डॉक्टरों के मुताबिक कुल कैंसर मामलों में किडनी कैंसर लगभग 4 प्रतिशत पाया जाता है, लेकिन किडनी के ट्यूमर का खून की नसों से होते हुए फेफड़ों की पल्मोनरी आर्टरी तक पहुंचना अत्यंत दुर्लभ स्थिति है। इस सफल ऑपरेशन में यूरोलॉजी, कार्डियक सर्जरी और एनेस्थीसिया टीम के बीच का तालमेल निर्णायक रहा। सर्जिकल टीम में डॉ. सौरभ जुल्का, डॉ. मनीष पोरवाल, डॉ. विजय महाजन, डॉ. आशीष जैन, डॉ. राजेश कुकरेजा और डॉ. करण पोरवाल सहित नर्सिंग स्टाफ शामिल रहा। अस्पताल प्रशासन ने इसे मध्य भारत (सेंट्रल इंडिया) में इस तरह का पहला सफल ऑपरेशन होने का दावा किया है।
