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इंदौर: नगर निगम चुनावों के लिए 85 वार्डों में की गई आरक्षण प्रक्रिया को कोर्ट ने किया रद्द, अब नए सिरे से होगा इन वार्डों का आरक्षण
Mon, 10 Jan 2022 07:10 PM IST
चंद्रप्रकाश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: चंद्रप्रकाश शर्मा
Updated Mon, 10 Jan 2022 07:10 PM IST
सार
नगर निगम चुनावों के लिए किए गए 85 वार्डों के आरक्षण को इंदौर हाईकोर्ट ने अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। इसके चलते अब इन सभी वार्डों का आरक्षण नए सिरे से होगा।
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उच्च न्यायालय इंदौर।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
नगर निगम चुनावों के लिए किए गए 85 वार्डों के आरक्षण को इंदौर हाईकोर्ट ने अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। इसके चलते अब इन सभी वार्डों का आरक्षण नए सिरे से होगा। सरकार ने इंदौर नगर निगम चुनावों के लिए एससी-एसटी के वार्ड आरक्षण के लिए रोटेशन प्रणाली को नहीं अपनाया था।
जानकारी के मुताबिक हाईकोर्ट की सिंगल बैंच ने सोमवार को याचिकाकर्ता कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता जयेश गुरनानी की याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता गुरनानी के अनुसार सरकार ने नगर निगम के 85 वार्डों में से एससी-एसटी के लिए आरक्षित वार्डों में आरक्षण को लेकर रोटेशन प्रिंसिपल को फॉलो नहीं किया और 2014 के आरक्षण के अनुसार की इस बार भी वार्ड आरक्षण कर दिया, जो कि पूरी तरह गलत है। हालांकि सरकार ने महिला, पुरुष व ओबीसी वर्ग के वार्ड के लिए आरक्षण को अपनाया, लेकिन एससी-एसटी के वार्ड आरक्षण में मनमानी की। हमने इसका विरोध करते हुए याचिका लगाई थी। जिसमें सुप्रीम कोर्ट की उस रूलिंग का भी हवाला दिया था जिसमें शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि आप एक ही सीट को हमेशा के लिए किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षित नहीं कर सकते। इसके बाद हाईकोर्ट की सिंगल बैंच में सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने फैसला सुनाया। इसमें कहा कि सरकार इस तरह से किसी भी वार्ड का वर्ग विशेष के लिए आरक्षण कर सामान्य व अन्य वर्ग के उम्मीदवारों के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल ने पैरवी की।
सरकार ने प्रस्तुत किया था जवाब
वार्ड आरक्षण के खिलाफ लगी याचिका में याचिकाकर्ता जयेश गुरनानी और दिलीप कौशल ने कहा था कि लंबे समय से अजा-अजजा, अन्य पिछड़ा वर्ग और अनारक्षित वर्ग के वार्ड में आरक्षण की स्थिति ही परिवर्तित नहीं की जा रही है। इससे अजा-अजजा के लिए आरक्षित वार्ड में रहने वाले अनारक्षित वर्ग के लोगों को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पाता। वहीं अनारक्षित और अन्य पिछड़ा वर्ग के वार्ड में अजा-अजजा श्रेणी के उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ पाते। इस याचिका पर सरकार ने जवाब प्रस्तुत करते हुए कहा था कि यह सरकार के अधिकार क्षेत्र में है कि वह वार्ड की आरक्षण प्रक्रिया को परिवर्तित करे या न करे। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह समानता के अधिकार का हनन है। इसके बाद कोर्ट ने वार्ड आरक्षण के लिए 6 नवंबर 2020 को जारी अधिसूचना को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्णय एक दूसरे से विपरीत हों तो ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही मान्य होगा।
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जानकारी के मुताबिक हाईकोर्ट की सिंगल बैंच ने सोमवार को याचिकाकर्ता कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता जयेश गुरनानी की याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता गुरनानी के अनुसार सरकार ने नगर निगम के 85 वार्डों में से एससी-एसटी के लिए आरक्षित वार्डों में आरक्षण को लेकर रोटेशन प्रिंसिपल को फॉलो नहीं किया और 2014 के आरक्षण के अनुसार की इस बार भी वार्ड आरक्षण कर दिया, जो कि पूरी तरह गलत है। हालांकि सरकार ने महिला, पुरुष व ओबीसी वर्ग के वार्ड के लिए आरक्षण को अपनाया, लेकिन एससी-एसटी के वार्ड आरक्षण में मनमानी की। हमने इसका विरोध करते हुए याचिका लगाई थी। जिसमें सुप्रीम कोर्ट की उस रूलिंग का भी हवाला दिया था जिसमें शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि आप एक ही सीट को हमेशा के लिए किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षित नहीं कर सकते। इसके बाद हाईकोर्ट की सिंगल बैंच में सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने फैसला सुनाया। इसमें कहा कि सरकार इस तरह से किसी भी वार्ड का वर्ग विशेष के लिए आरक्षण कर सामान्य व अन्य वर्ग के उम्मीदवारों के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल ने पैरवी की।
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सरकार ने प्रस्तुत किया था जवाब
वार्ड आरक्षण के खिलाफ लगी याचिका में याचिकाकर्ता जयेश गुरनानी और दिलीप कौशल ने कहा था कि लंबे समय से अजा-अजजा, अन्य पिछड़ा वर्ग और अनारक्षित वर्ग के वार्ड में आरक्षण की स्थिति ही परिवर्तित नहीं की जा रही है। इससे अजा-अजजा के लिए आरक्षित वार्ड में रहने वाले अनारक्षित वर्ग के लोगों को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पाता। वहीं अनारक्षित और अन्य पिछड़ा वर्ग के वार्ड में अजा-अजजा श्रेणी के उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ पाते। इस याचिका पर सरकार ने जवाब प्रस्तुत करते हुए कहा था कि यह सरकार के अधिकार क्षेत्र में है कि वह वार्ड की आरक्षण प्रक्रिया को परिवर्तित करे या न करे। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह समानता के अधिकार का हनन है। इसके बाद कोर्ट ने वार्ड आरक्षण के लिए 6 नवंबर 2020 को जारी अधिसूचना को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्णय एक दूसरे से विपरीत हों तो ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही मान्य होगा।
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