{"_id":"68de37a1747794154704a2cc","slug":"once-a-year-the-scindia-family-sets-out-in-royal-style-worshipping-the-family-deity-and-royal-weapons-gwalior-news-c-1-1-noi1227-3472615-2025-10-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"Gwalior News: दशहरे पर शाही अंदाज में निकला सिंधिया परिवार, कुलदेवता की पूजा और राजशाही शस्त्रों का किया पूजन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Gwalior News: दशहरे पर शाही अंदाज में निकला सिंधिया परिवार, कुलदेवता की पूजा और राजशाही शस्त्रों का किया पूजन
Thu, 02 Oct 2025 02:30 PM IST
ग्वालियर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: ग्वालियर ब्यूरो
Updated Thu, 02 Oct 2025 02:30 PM IST
सार
इस परंपरा की शुरुआत महाराजा दौलत राव सिंधिया ने ग्वालियर को राजधानी बनाने के बाद की थी। पहले स्वतंत्रता पूर्व तक इस अवसर पर महाराज को 21 तोपों की सलामी भी दी जाती थी।
विज्ञापन
राजशाही अंदाज में सिंधिया।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सिंधिया रियासत काल से से चली आ रही परंपरा को सिंधिया परिवार आज भी निर्वहन कर रहा है। मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत उनमें से एक है। यहां दशहरे के दिन एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें आज भी पूरा शहर शामिल होता है। यह पूजा सिंधिया राजघराने के महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया करते हैं। आम तौर पर सफेद कुर्ते में दिखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया अलग ही अंदाज में दिखाई देते हैं। हाथों में तलवार, शाही अंदाज और पगड़ी पहनकर ज्योतिरादित्य सिंधिया इस पूजा में शामिल होते हैं। विजयादशमी के पर्व पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने परिवार की शाही दशहरा परंपराओं का निर्वहन किया।
ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने बेटे महाआर्यमन सिंधिया के साथ शाही लिबास में ग्वालियर के गोरखी स्थित देवघर पहुंचे। यहां उन्होंने सबसे पहले अपने कुलदेवता की पूजा की। सिंधिया ने अपने कुल देवी, देवता दक्षिण केदार, दुर्गा मैय्या, राजशाही शस्त्र, मुहर, प्रतीक चिह्नों की पूजा अर्चना की। पूजा के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया राजपरिवार के प्रतीक ध्वज और शस्त्रों का पूजन किया। साथ ही राजशाही गद्दी पर बैठकर दरबार भी लगाया। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उनके बेटे महाआर्यमन सिंधिया भी मौजूद थे। वहीं, उनके पुराने राजशाही काल के सरदार, सेनपतियों की वर्तमान पीढ़ी के लोग भी शाही अंदाज की ड्रेस पहनकर दरबार में शामिल हुए।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें- फोन पर बच्चे ने की ऐसी शिकायत, पिघल गया प्रधान आरक्षक का दिल, कुरकुरे लेकर पहुंचे घर, देखें वीडियो
सिंधिया राज परिवार के नजदीक रहे विधायक तथा अनेक पदों पर रहे ब्रिगेडियर नरसिंह राव पंवार (अब स्वर्गीय) के अनुसार सिंधिया राजवंश की यह परम्परा लगभग 300 साल पुरानी है। पहले इनकी राजधानी उज्जैन में थी तब वहां यह परम्परा शुरू हुई। लेकिन महादजी सिंधिया ने पानीपत युद्ध में जीत के बाद ग्वालियर को अपना केंद्र बनाया, लेकिन मुगलों के बढ़ते प्रभाव को रोकने और देशी राजाओं के नित नए होने वाले विद्रोहों को ख़त्म करने की दृष्टि से महाराजा दौलत राव सिंधिया ने लश्कर शहर बसाकर ग्वालियर को राजधानी के रूप में स्थापित किया। शाही दशहरे के आयोजन की परम्परा भी उन्होंने ही शुरू की। स्वतंत्रता पूर्व तक यहां महाराज को इक्कीस तोपों की सलामी भी दी जाती थी।
विज्ञापन
विज्ञापन
ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने बेटे महाआर्यमन सिंधिया के साथ शाही लिबास में ग्वालियर के गोरखी स्थित देवघर पहुंचे। यहां उन्होंने सबसे पहले अपने कुलदेवता की पूजा की। सिंधिया ने अपने कुल देवी, देवता दक्षिण केदार, दुर्गा मैय्या, राजशाही शस्त्र, मुहर, प्रतीक चिह्नों की पूजा अर्चना की। पूजा के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया राजपरिवार के प्रतीक ध्वज और शस्त्रों का पूजन किया। साथ ही राजशाही गद्दी पर बैठकर दरबार भी लगाया। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उनके बेटे महाआर्यमन सिंधिया भी मौजूद थे। वहीं, उनके पुराने राजशाही काल के सरदार, सेनपतियों की वर्तमान पीढ़ी के लोग भी शाही अंदाज की ड्रेस पहनकर दरबार में शामिल हुए।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें- फोन पर बच्चे ने की ऐसी शिकायत, पिघल गया प्रधान आरक्षक का दिल, कुरकुरे लेकर पहुंचे घर, देखें वीडियो
सिंधिया राज परिवार के नजदीक रहे विधायक तथा अनेक पदों पर रहे ब्रिगेडियर नरसिंह राव पंवार (अब स्वर्गीय) के अनुसार सिंधिया राजवंश की यह परम्परा लगभग 300 साल पुरानी है। पहले इनकी राजधानी उज्जैन में थी तब वहां यह परम्परा शुरू हुई। लेकिन महादजी सिंधिया ने पानीपत युद्ध में जीत के बाद ग्वालियर को अपना केंद्र बनाया, लेकिन मुगलों के बढ़ते प्रभाव को रोकने और देशी राजाओं के नित नए होने वाले विद्रोहों को ख़त्म करने की दृष्टि से महाराजा दौलत राव सिंधिया ने लश्कर शहर बसाकर ग्वालियर को राजधानी के रूप में स्थापित किया। शाही दशहरे के आयोजन की परम्परा भी उन्होंने ही शुरू की। स्वतंत्रता पूर्व तक यहां महाराज को इक्कीस तोपों की सलामी भी दी जाती थी।
