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MP News: करोड़ों की सरकारी जमीन अपात्रों को बांटी, EOW ने तीन तहसीलदार, दो पटवारी सहित 20 लोगों पर किया केस
Thu, 16 Mar 2023 08:26 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Thu, 16 Mar 2023 08:26 PM IST
सार
ग्वालियर ईओडब्ल्यू ने करोड़ों की सरकारी जमीन अपात्रों को बांटे जाने के मामले में तीन तहसीलदारों, पंजीयक, दो पटवारी, स्टेनो और 13 अपात्र पट्टाधारकों खिलाफ केस दर्ज किया है।
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ग्वालियर ईओडब्ल्यू ने अपात्रों को सरकारी जमीन दिए जाने के मामले में केस दर्ज किया है।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
मध्यप्रदेश के मुरैना से चौंकाने वाला मामला सामने आया है। ईओडब्ल्यू ने करोड़ों की सरकारी जमीन अपात्रों को बांटे जाने के मामले में तीन तहसीलदारों, पंजीयक, दो पटवारी, स्टेनो और 13 अपात्र पट्टाधारकों खिलाफ केस दर्ज किया है।
जानकारी के अनुसार मामला मुरैना जिले के कैलारस तहसील क्षेत्र का है। ईओडब्ल्यू के एसपी बिट्टू सहगल ने बताया कि सुलतान सिंह नामक एक युवक ने शिकायत की थी कि माखन अर्गल नामक पटवारी द्वारा उनकी मुरैना जिले में पदस्थापना के भ्रष्टाचार कर दस्तावेजों में गड़बड़ियां की गईं। इन कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर अपात्र लोगों को शासकीय भूमि के पट्टे वितरित कराए गए। जहां तक कि उनकी पत्नी को भी पट्टा दे दिया गया।
जांच के दौरान ये तथ्य सामने आया कि 2003 में जब पटवारी की ग्राम सेमई में पोस्टिंग थी तब उन्होंने शासकीय प्रतिबंध के बावजूद सरकारी जमीन पर अपात्र लोगों को पट्टे बांटे थे। इसमें प्राथमिक आकलन के अनुसार उन्होंने 2 करोड़ 43 लाख की जमीन अपात्र लोगों को अवैधानिक ढंग से बांट दी थी। इसी तरह ग्राम गुलपुरा में 11 लाख 40 की भूमि बांट दी गई।
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सहगल ने बताया कि जांच के दौरान एक चौंकने वाला तथ्य ये भी प्रकाश में आया कि पटवारी ने अपनी पत्नी के नाम पर भी गुलपुरा में कीमती भूमि का पट्टा कारित करके कब्जा दिला दिया। इसी तरह ग्राम सुरापुरा में भी उनके द्वारा एक वसीयत में कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर अपनी पत्नी का नाम भी शामिल करवाकर उसे हथिया लिया। ये शासकीय सर्वे की भूमि थी जो वितरित होनी थी जिसका एक हिस्सा उन्होंने अपनी पत्नी के नाम कम्प्यूटर पर दर्ज करवा लिया।
एसपी ईओडब्ल्यू बिट्टू सहगल के अनुसार इस मामले में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई हैं। धारा 420, 467, 468, 120-बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत प्रकरण पंजीबद्ध कर लिया गया है। इसकी विवेचना की जा रही है। प्राथमिक तौर पर अभी जो जांच हुई है उससे पता चलता है कि सरकारी जमीन का यह बंदरबांट 2005 से लेकर 2017 तक हुआ है और मजेदार बात ये कि इस दौरान एक तहसीलदार और नायब तहसीलदार बदल गए लेकिन किसी ने भी जांच करने की जहमत नहीं उठाई बल्कि उसी में लिप्त हो गए।
इनके खिलाफ दर्ज हुआ मामला
ईओडब्ल्यू ने मामले में 2010 में पदस्थ रहे तहसीलदार प्रदीप कुमार शर्मा, इनके बाद आए तहसीलदार भरत कुमार, तहसीलदार भूदेव महोबिया, नायब तहसीलदार सर्वेश यादव, उप पंजीयक आरएन शाक्य, तहसीलदार के रीडर रामगोविंद शर्मा, पटवारी माखन अर्गल, हाकिम सिंह के अलावा 2012 से 2015 तक पदस्थ रहे पटवारियों पर केस दर्ज किया है।
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जानकारी के अनुसार मामला मुरैना जिले के कैलारस तहसील क्षेत्र का है। ईओडब्ल्यू के एसपी बिट्टू सहगल ने बताया कि सुलतान सिंह नामक एक युवक ने शिकायत की थी कि माखन अर्गल नामक पटवारी द्वारा उनकी मुरैना जिले में पदस्थापना के भ्रष्टाचार कर दस्तावेजों में गड़बड़ियां की गईं। इन कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर अपात्र लोगों को शासकीय भूमि के पट्टे वितरित कराए गए। जहां तक कि उनकी पत्नी को भी पट्टा दे दिया गया।
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जांच के दौरान ये तथ्य सामने आया कि 2003 में जब पटवारी की ग्राम सेमई में पोस्टिंग थी तब उन्होंने शासकीय प्रतिबंध के बावजूद सरकारी जमीन पर अपात्र लोगों को पट्टे बांटे थे। इसमें प्राथमिक आकलन के अनुसार उन्होंने 2 करोड़ 43 लाख की जमीन अपात्र लोगों को अवैधानिक ढंग से बांट दी थी। इसी तरह ग्राम गुलपुरा में 11 लाख 40 की भूमि बांट दी गई।
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सहगल ने बताया कि जांच के दौरान एक चौंकने वाला तथ्य ये भी प्रकाश में आया कि पटवारी ने अपनी पत्नी के नाम पर भी गुलपुरा में कीमती भूमि का पट्टा कारित करके कब्जा दिला दिया। इसी तरह ग्राम सुरापुरा में भी उनके द्वारा एक वसीयत में कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर अपनी पत्नी का नाम भी शामिल करवाकर उसे हथिया लिया। ये शासकीय सर्वे की भूमि थी जो वितरित होनी थी जिसका एक हिस्सा उन्होंने अपनी पत्नी के नाम कम्प्यूटर पर दर्ज करवा लिया।
एसपी ईओडब्ल्यू बिट्टू सहगल के अनुसार इस मामले में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई हैं। धारा 420, 467, 468, 120-बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत प्रकरण पंजीबद्ध कर लिया गया है। इसकी विवेचना की जा रही है। प्राथमिक तौर पर अभी जो जांच हुई है उससे पता चलता है कि सरकारी जमीन का यह बंदरबांट 2005 से लेकर 2017 तक हुआ है और मजेदार बात ये कि इस दौरान एक तहसीलदार और नायब तहसीलदार बदल गए लेकिन किसी ने भी जांच करने की जहमत नहीं उठाई बल्कि उसी में लिप्त हो गए।
इनके खिलाफ दर्ज हुआ मामला
ईओडब्ल्यू ने मामले में 2010 में पदस्थ रहे तहसीलदार प्रदीप कुमार शर्मा, इनके बाद आए तहसीलदार भरत कुमार, तहसीलदार भूदेव महोबिया, नायब तहसीलदार सर्वेश यादव, उप पंजीयक आरएन शाक्य, तहसीलदार के रीडर रामगोविंद शर्मा, पटवारी माखन अर्गल, हाकिम सिंह के अलावा 2012 से 2015 तक पदस्थ रहे पटवारियों पर केस दर्ज किया है।
