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ग्वालियर: सिंधिया के बिना भी हो रहा दमदार मुकाबला
भूपेंद्र कुमार/ग्वालियर
Updated Sat, 12 Apr 2014 12:05 PM IST
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शहर में घुसते ही सबसे पहले सिंधिया का भव्य जय विलास पैलेस नजर आता है। यहां एक कहावत चलती है कि चुनाव में कोई भी पार्टी जीते, असली विजय महल की होती है। महल यानी सिंधिया परिवार। इस परिवार के लोग भले ही अलग-अलग राजनीतिक दलों में हों पर कभी एक-दूसरे से मुकाबला नहीं करते।
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देखा जाए तो यह सीट राजनीति के कद्दावरों की कर्मभूमि भी रही है। वर्ष 1984 में इस सीट पर कांग्रेस के माधव राव सिंधिया ने भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को करारी शिकस्त दी थी। वाजपेयी 1971 में इस सीट पर जनसंघ के टिकट से जीते थे। राजमाता विजयराजे सिंधिया एक बार, माधवराव सिंधिया पांच बार और यशोधरा राजे दो बार इस सीट से जीत चुकी हैं।
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लेकिन सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि इस बार यहां सिंधिया परिवार का कोई नुमाइंदा मैदान में नहीं है। पिछली दो बार से यह सीट माधवराव की बहन और भाजपा नेता यशोधरा राजे के पास थी, लेकिन दिसंबर 2013 में शिवपुरी से विधायक बनने के बाद उन्होंने यह सीट छोड़ दी। बहरहाल इस बार मुकाबला भले ही हाई प्रोफाइल नहीं हो फिर भी दांव पर बहुत कुछ है।
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भाजपा ने इस बार प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को मैदान में उतारा है। तोमर पिछली बार पड़ोस की मुरैना सीट से जीते थे। वहीं भाजपा के जयभान सिंह पवैया 1999 में ग्वालियर से सांसद रह चुके हैं इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ गुना से ताल ठोक रहे हैं।
नरेंद्र सिंह तोमर की राह में दो बड़ी अड़चनें हैं। पहली बात तो यह कि उन्हें पार्टी की अंतर्कलह से खतरा है। बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी के भानजे अनूप मिश्रा और स्थानीय नेताओं से उनके अच्छे संबंध नहीं हैं। अनूप इस बार मुरैना से किस्मत आजमा रहे हैं।
दूसरी बात कांग्रेस प्रत्याशी अशोक सिंह दो बार भले ही हार चुके हों पर इस बार पूरे दमखम से मैदान में हैं। उनका सरल स्वभाव ही कांग्रेस को मुकाबले में खड़ा करता है। उनका परिवार पूर्व में सिंधिया वंश का विरोधी रहा है लेकिन अब यह बातें चुनावी मुद्दा नहीं हैं, ज्योतिरादित्य से उनके अच्छे संबंध बताए जाते हैं।
हालांकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि महल कभी नहीं चाहेगा कि कोई गैर सिंधिया इस सीट से जीते। एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले रिंकू ठाकुर कहते हैं कि भले ही भाजपा और मोदी की लहर हो पर हम तो प्रत्याशी को वोट देंगे। तोमर जीत भी गए तो ग्वालियर को पूरा टाइम नहीं दे पाएंगे। अशोक लोकल हैं और किसी के काम को भी इनकार नहीं करते।
होटल संचालक 26 वर्षीय अभिषेक के कहना है कि हम चाहते हैं मोदी पीएम बनें पर अशोक सिंह के अच्छे व्यवहार की अनदेखी नहीं कर सकते। नगर निगम म्यूजियम में मौजूद पूर्व फौजी राधेश्याम कहते हैं कि हम तो कमल के साथ हैं। दौलतगंज के सराफा बाजार में साड़ी खरीदने आईं सरिता कहती हैं कि मोदी ने महिलाओं के मुद्दे उठाएं हैं हम उन्हें वोट देंगे। ग्वालियर शिवपुरी रोड पर खेत में गेहूं की फसल काट रहे शिवप्रसाद कहते हैं कि मामला 50-50 है।
रामसेवक ने किया था शर्मसार
ग्वालियर के लोग रामसेवक सिंह उर्फ बाबूजी को शायद कभी माफ नहीं करेंगे। वर्ष 2004 में कांग्रेस से जीते रामसेवक सिंह 12 दिसंबर 2005 में कोबरपोस्ट के स्टिंग आपरेशन दुर्योधन में फंस गए। उन पर पैसा लेकर लोकसभा में सवाल पूछने का आरोप लगा। 23 दिसंबर 2005 को लोकसभा की विशेष कमेटी ने उन्हें दोषी माना और इस मामले में सभी 11 सांसदों को निष्कासित कर दिया।
