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Gangaur Puja: खंडवा में अनोखी परंपरा, भंडारे में जूठी पत्तल उठाने के लिए लगती है बोली

Tue, 28 Mar 2023 01:56 PM IST
रवींद्र भजनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा Published by: रवींद्र भजनी Updated Tue, 28 Mar 2023 01:56 PM IST
सार

खंडवा में गणगौर पर्व के दौरान भंडारा होता है और इसमें सामान के लिए नहीं बल्कि जूठी पत्तल उठाने के लिए बोली लगती है। यह अनोखी परंपरा गुरुवा और कहार समाज के पूजन में आज भी होती है। 
 

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Gangaur Puja: Unique tradition in Khandwa, bidding takes place to pick up used plates in Bhandara
गणगौर पूजन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अक्सर आपने देखा होगा किसी भंडारे या सार्वजानिक भोज के आयोजन में लोग अपनी ही जूठी पत्तल या बर्तन उठाने से कतराते हैं। मध्यप्रदेश के खंडवा में गणगौर पर्व के दौरान होने वाले भंडारे में जूठी पत्तल उठाने के लिए बाकायदा बोली लगाई जाती है। जिसकी सबसे अधिक बोली होती है उसी को जूठी पत्तल उठाने का मौका मिलता है। गुरुवा और कहार समाज के लोग इसे पुण्य का कार्य समझते हैं। जूठी पत्तल के लिए लगाई जाने वाली बोली का पैसा अगले वर्ष माता के भंडारे के लिए उपयोग में लिया जाता है। यह अनूठी परम्परा सिर्फ निमाड़ के खंडवा में ही निभाई जाती है।  

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इन दिनों निमाड़ और मालवा का प्रसिद्ध गणगौर पर्व चल रहा है। गणगौर पर्व पर रणु और धनियर राजा को शिव-पार्वती मानकर पूजा जाता है। आयोजन बाकायदा किसी विवाह समारोह की तरह ही सम्पन्न होता है। इसमें मेहंदी की रस्म के साथ साथ झालरिया गीत गाये जाते हैं। रणु बाई को बेटी की तरह मानकर यहां खूब मान-मनुहार की जाती है। नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व होली के बाद से ही शुरू हो जाता है। इस पर्व में होली की राख और गेहूं मिलकर माता की मूठ यानी घटस्थापना की जाती है। इसके बाद बांस की टोकरी में मिटटी डालकर गेंहू बोये जाते हैं। इस कार्य को बाड़ी कहते हैं जिसे आठ दिनों तक सींचा जाता है। आठवें दिन दर्शन के लिए इस स्थान को खोला जाता है। इसके बाद लोग इन्हें लेकर अपने घर जाते हैं और नेवैद्य लगाने और भंडारा करने के बाद माता को पानी पिलाने और झालरिये देने बाग-बगीचे में ले जाया जाता है। इस तरह गणगौर पर्व मनाया जाता है। मानो जैसे किसी के घर में शादी का उत्साह चल रहा हो। इस वर्ष गुरुवा और कहार समाज ने गणगौर माता को बंगाली संस्कृति के रंग में रंगा है। जिस तरह से बंगाली दूल्हा और दुल्हन वेशभूषा धारण करते हैं, वैसी ही वेशभूषा गणगौर माता को पहनाई जाती है। गणगौर माता बिठाने वाली साधना सोमनाथ ने बताया कि हम प्रतिवर्ष भारतीय संस्कृति के अनुसार अलग-अलग जगहों की वेशभूषा में माता का शृंगार करते हैं। इस बार हमने बंगाली वेशभुषा में माता का शृंगार किया है। 
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जूठी पत्तल उठाने की परंपरा 80 साल पुरानी 
गुरुवा और कहार समाज के लोगों का मानना है कि जूठी पत्तल उठाना पुण्य कार्य है। समाज के सोमनाथ काले ने बताया की जूठी पत्तल उठाने की परम्परा लगभग 80 वर्ष पुरानी है। इसे उनके बुजुर्गों ने शुरू किया था। जूठी पत्तल उठाने की यह परम्परा समाज में सामाजिक समरसता लाती है। इससे समाज का एक धनी व्यक्ति भी जूठी पत्तल उठाने की बोली लगाकर समाज के गरीब व्यक्ति की जूठी पत्तल सहर्ष उठाता है। अब हर पंगत पर बोली लगती है। इस बार से आने वाले वर्ष के लिए होने वाले माता के भंडारे के लिए अनाज और अन्य वस्तुओं के लिए भी बोली लगाई गई है। बोली की राशि का उपयोग आगामी वर्ष में होने वाले भंडारे में किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माताजी की पूजा में जो लोग भोजन करने आते हैं, उनकी जूठी पत्तलें उठाने पर उन्हें माता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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