Damoh: जटाशंकर में चार दिवसीय मेला शुरू; ब्रिटिश काल में हाथी-घोड़े थे मेले का आकर्षण, जानें अब किसलिए है खास
ब्रिटिश शासन काल से लगता चला आ रहा हैं दमोह का जटाशंकर मेला। कभी बिकते थे हाथी, घोड़े और बैल। अब समय और बदलते परिवेश के साथ मेले का स्वरूप भी बदल गया है। आज यहां हाथी, घोड़े तो नहीं दिखाई देते।
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मकर संक्रांति पर्व पर दमोह शहर के जटाशंकरधाम में चार दिवसीय मेला ब्रिटिश शासनकाल से लगता आ रहा है। 2024 मेले की शुरुआत सोमवार से हो गई है। जिसमें जिले भर से लोग मेला घूमने पहुंचे। पहले यह मेला एक दिन के लिए भरता था और इसमें हाथी, घोड़े, गाय, बैल भी बिकने के लिए आते थे। अंग्रेजों के समय में इन जानवरों का काफी महत्व रहता था, क्योंकि हाथी, घोड़े जहां राजा, महाराजाओं की शान की झलक प्रदर्शित करते थे। वहीं, गाय और बैल दूध और खेती के लिए होता था। इनको खरीदने दूर-दूर से लोग जटाशंकर के मेले में पहुंचते थे। अब समय के बदलते परिवेश के साथ मेले का स्वरूप भी बदल गया है। आज यहां हाथी, घोड़े तो नहीं दिखाई देते, लेकिन बुंदेलखंडी मिठाई और खिलौने जरूर देखने को मिलते हैं।
200 वर्ष से चली आ रही मेले की परंपरा
जटाशंकर मंदिर के पुजारी पंडित मोनू पाठक ने बताया कि ब्रिटिश शासन काल से उनके पूर्वज यह मेला भरवाते आ रहे हैं। उनके दादा स्व सुंदरलाल पाठक के समय से जटाशंकर में मेला भरता आ रहा है। उन्होंने बताया कि पहले यहां एक दिन का मेला भरने की परंपरा थी, जिसमें दमोह के साथ अन्य जिलों के लोग हाथी, घोड़े और गाय, बैल का व्यापार करने आते थे। एक दिन भरने वाले मेले में कई प्रकार की नश्लों के जानवर यहां मिलते थे जिन्हें अंग्रेज ही ज्यादा खरीदते थे। धीरे-धीरे मेले का स्वरूप बदला और यह जीजें यहां से गायब हो गईं।
पूरे जिले में सबसे बड़ा मेला जटाशंकर धाम में ही भरता है, जो चार दिनों तक आयोजित होता है। मकर संक्रांति के दिन से मेले की शुरुआत होती है। इसमें जिले भर के सैकड़ों दुकानदार कई प्रकार की दुकानें और झूले यहां लगाते हैं। इसके साथ ही प्रतिदिन सुबह से रात तक हजारों लोग यहां मेला घूमने आते हैं।
ये है मेले की पहचान
पाठक ने बताया कि मेले में वैसे तो खाने, पीने और जरूरत के हिसाब से सभी प्रकार की दुकानें लगती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा महत्व बुंदेलखंड की मिठाई गड़ियाघुल्ला का रहता है। जिसे लोग खरीदकर अपने घर ले जाते हैं। इसके साथ ही तिल के लड्डू, मिट्टी के खजाने, मिट्टी से बने खिलौने लोग खरीदते हैं।
18 फीट की गणेश प्रतिमा है विराजमान
जटाशंकर धाम में सभी देवी, देवताओं के मंदिर बने हैं, लेकिन यहां सबसे बड़ी प्रतिमा प्रथम पूज्य भगवान गणेश की है। मंदिर के पुजारी मोनू पाठक ने बताया कि तकरीबन 45 साल पहले मंदिर के प्रथम अध्यक्ष कलेक्ट्रेट में पदस्थ स्व रामबाबू श्रीवास्तव के द्वारा 18 फीट की भगवान गणेश की प्रतिमा मंदिर में स्थापित करवाई थी। इसके साथ भगवान जटाशंकर शिवलिंग के रुप में विराजमान हैं।
