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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Damoh: The challenge of saving the ancestral art in front of the dynasty society, it is difficult to survive

Damoh: वंशकार समाज के आगे पुश्तैनी कला को बचाने की चुनौती, महंगाई के दौर में मुश्किल से हो रहा गुजारा

Thu, 22 Jun 2023 03:59 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Thu, 22 Jun 2023 03:59 PM IST
सार

आधुनिकता के दौर में भी लोग इन बांस के बर्तनों का महत्व समझते हैं, लेकिन यह कला धीरे-धीरे कहीं विलुप्त न हो जाए। बांस महंगा होता जा रहा है, जबकि उस हिसाब से यह बर्तन उतने महंगे नहीं बिक पाते, जिससे लोग अपना गुजर बसर मुश्किल से कर पाते हैं।

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Damoh: The challenge of saving the ancestral art in front of the dynasty society, it is difficult to survive
वंशकार समाज के आगे रोजी रोटी का संकट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बुंदेलखंड क्षेत्र में हर घर में बांस के बने बर्तनों एवं सामग्री का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। शादी-विवाह के सीजन के चलते बड़ी मात्रा में बांस के बर्तन उपयोग में आते हैं और इन्हें बड़ा शुभ माना जाता है। दमोह में वंशकार समाज के द्वारा एक से बढ़कर एक आकृतियों के बांस के बर्तनों बनाए जाते हैं और शादी विवाह में इन्हीं बर्तनों का उपयोग किया जाता है। इन बर्तनों के बिना विवाह की तैयारियां अधूरी मानी जाती हैं।
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वंशकार समाज के सामने इस कला को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि सरकार के द्वारा इनकी कला को अभी तक वह जगह नहीं दी गई, जहां से इनके काम को एक पहचान मिल सके। आधुनिकता के दौर में भी लोग इन बांस के बर्तनों का महत्व समझते हैं, लेकिन यह कला धीरे-धीरे कहीं विलुप्त न हो जाए। दिन प्रतिदिन बांस महंगा होता जा रहा है, जबकि उस हिसाब से यह बर्तन उतने महंगे नहीं बिक पाते, जिससे मुश्किल से वंशकार समाज के लोग अपना गुजर बसर कर पाते हैं।
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एक से बढ़कर एक सामग्री का होता है निर्माण
महिलाएं बांस की कारीगरी करके एक से बढ़कर एक कलात्मक वस्तुओं का निर्माण करती हैं। जिन्हें लोग अपने घरों में शोपीस के तौर पर सजाते हैं। वहीं, शादी में उपयोग होने वाली टोकनी, सूपा, दूल्हे के लिए बिजना और भी कई प्रकार की सामग्री का निर्माण किया जाता है। बांस के बर्तन बेचने वाले राजू और लखन वंशकार का कहना है कि बांस के बर्तन का व्यापार विवाह के सीजन में चलता है, उसके बाद उनका यह व्यापार बंद हो जाता है। यदि सरकार हमारे लिए कोई योजना बना दे तो परिवार का भरण पोषण अच्छे से हो सकेगा। इस काम में काफी मेहनत लगती है तब जाकर यह बर्तन तैयार होते हैं। बर्तन बनाने के लिए क्षेत्र में बांस नहीं मिलता। उन्हें बांस बाहर से खरीदकर लाना पड़ता है। वहीं, जिले के बाहर बांस के रेट अधिक हैं। इसलिए जब हम खुद महंगे दामों पर बांस लेकर आ रहे हैं, तो मजदूरी मिलाकर मजबूरन हमें अधिक दामों में बांस के बर्तनों को बेचना पड़ रहा है। 29 जून को देवशयनी एकादशी से विवाह बंद हो जाएंगे उसके बाद देव उठनी एकादशी से जब विवाह शुरू होंगे, तब उनके यह बांस के बर्तन फिर से बिकेंगे।
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बारिश के चार महीने परिवार का गुजर, बसर करना मुश्किल होता है। अभिषेक बंसल ने बताया की पीढ़ी दर पीढ़ी यह काम उनके परिवार में होता आ रहा है। इसलिए इस कला के अलावा वह और दूसरी कला भी नहीं जानते।
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