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MP Cheetah Project: लॉरी मार्कर का दावा- बाड़े के बाहर घूम रहे चीतल पर है चीतों की नजर, प्रोजेक्ट सफल होगा
Fri, 23 Sep 2022 05:22 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्योपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्योपुर
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Fri, 23 Sep 2022 05:22 PM IST
सार
चीता कंजर्वेशन फंड यानी CCF, जिसने भारत को चीते दिए हैं, का दावा है कि प्रोजेक्ट चीता एक सक्सेस स्टोरी होगा। इसके लिए थोड़ा सब्र रखना होगा और इंतजार करना होगा।
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केंद्रीय मंत्री सिंधिया के साथ लॉरी मार्कर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नामीबिया से चीतों के ट्रांसलोकेशन का समन्वय चीता कंजर्वेशन फंड की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर लॉरी मार्कर ने किया। वह अब भी कूनो नेशनल पार्क में हैं और उन्होंने दावा किया है कि भारत का प्रोजेक्ट चीता एक बड़ी सक्सेस स्टोरी बनने जा रहा है। इसके परिणामों के लिए सब्र रखना होगा और इंतजार करना होगा। चीतों की नजर उनके बाड़ों के बाहर घूम रहे चीतल पर है। यह एक अच्छी बात है और प्रोजेक्ट की सफलता निश्चित तौर पर मिल रही है।
एक इंटरव्य में लॉरी मार्कर ने दावा किया कि 70 साल बाद चीते भारत आए हैं और यह अद्भुत हैं। हम उत्साहित हैं। अगर हम चीतों को बचा सके तो हम दुनिया बदल सकते हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि प्रोजेक्ट चीता भारत के लिए एक बड़ी सक्सेस स्टोरी होगी। इसके लिए सब्र रखना होगा। दस साल तक लग सकते हैं। एक बार जब कोई जानवर विलुप्त हो जाता है तो बहुत कुछ करना होता है और उसे फिर से लाने में बहुत वक्त लग जाता है।
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क्या चीते सिर्फ बड़ी घास वाले मैदानी इलाकों में ही रहते हैं?
नहीं। ऐसा नहीं है। दरअसल, समस्या यह है कि वीडियोग्राफर हमेशा ऐसे इलाकों में चीतों को शूट करते हैं, जो मैदानी और बड़ी घास वाले होते हैं। इस वजह से यह गलत धारणा बन गई है। चीते कई तरह से शिकार करते हैं। इनमें बड़ी घास वाले इलाकों में घात लगाकर हमला करना शामिल है। इसका मतलब यह नहीं है कि कूनो में वह शिकार नहीं कर सकेंगे। यहां भी उतने ही बड़े जानवर हैं जितने बड़े जानवर नामीबिया में थे, जिनका वे शिकार करते रहे हैं। क्वारंटाइन बाड़ों में से चीतों की नजर अभी से बाहर घूम रहे चीतलों पर है। निश्चित तौर पर वे भी शिकार के लिए तैयार हो रहे होंगे।
अब चीतों का क्या होगा?
फिलहाल चीतों को एक महीने के लिए क्वारंटाइन बाड़ों में रखा गया है। इसके बाद उन्हें बड़े इलाकों में छोड़ा जाएगा। उनकी आजादी धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी। कूनो में चीतल, हिरण और सांभर का शिकार वे बड़ी आसानी से कर सकते हैं।
क्या चीतों को शिकार में प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा?
हां। निश्चित तौर पर। यह चीते पिंजरे में नहीं रहे हैं। जंगलों में ही जन्मे हैं। इस वजह से उन्हें जंगली माहौल की जानकारी है। कूनो के तेंदुओं से प्रतिस्पर्धा इन चीतों के लिए नई नहीं होगी। हालांकि, यहां के तेंदुओं के लिए यह नई प्रतिस्पर्धा होगी। इस वजह से खतरा उनकी ओर से पैदा हो सकता है।
इन चीतों के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
यह चीते नए इलाके में हैं। उन्हें खाना-पानी की तलाश करने का तरीका बदलना होगा। उनके लिए पूरी तरह से नई जिंदगी होगी। यह आसान नहीं होता। हमें उम्मीद है कि यह चीते यहां के माहौल में घुल-मिल रहे हैं। यह एक लंबी प्रक्रिया है और सैटेलाइट और रेडियो कॉलर्स की मदद से उनकी निगरानी की जा रही है।
क्या इन चीतों के आसपास के गांवों में जाने का खतरा है?
नहीं। अन्य जानवरों की तरह चीते भी बस्तियों से दूर रहना ही पसंद करते हैं। उन्हें जंगल में रहना पसंद है। हम उनके कॉलर्स (जियोफेंस) का इस्तेमाल करते हुए अलर्ट सिस्टम बनाएंगे। इससे उनके गांवों के पास जाने पर उसकी सूचना हमें मिलती रहेगी।
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एक इंटरव्य में लॉरी मार्कर ने दावा किया कि 70 साल बाद चीते भारत आए हैं और यह अद्भुत हैं। हम उत्साहित हैं। अगर हम चीतों को बचा सके तो हम दुनिया बदल सकते हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि प्रोजेक्ट चीता भारत के लिए एक बड़ी सक्सेस स्टोरी होगी। इसके लिए सब्र रखना होगा। दस साल तक लग सकते हैं। एक बार जब कोई जानवर विलुप्त हो जाता है तो बहुत कुछ करना होता है और उसे फिर से लाने में बहुत वक्त लग जाता है।
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क्या चीते सिर्फ बड़ी घास वाले मैदानी इलाकों में ही रहते हैं?
नहीं। ऐसा नहीं है। दरअसल, समस्या यह है कि वीडियोग्राफर हमेशा ऐसे इलाकों में चीतों को शूट करते हैं, जो मैदानी और बड़ी घास वाले होते हैं। इस वजह से यह गलत धारणा बन गई है। चीते कई तरह से शिकार करते हैं। इनमें बड़ी घास वाले इलाकों में घात लगाकर हमला करना शामिल है। इसका मतलब यह नहीं है कि कूनो में वह शिकार नहीं कर सकेंगे। यहां भी उतने ही बड़े जानवर हैं जितने बड़े जानवर नामीबिया में थे, जिनका वे शिकार करते रहे हैं। क्वारंटाइन बाड़ों में से चीतों की नजर अभी से बाहर घूम रहे चीतलों पर है। निश्चित तौर पर वे भी शिकार के लिए तैयार हो रहे होंगे।
अब चीतों का क्या होगा?
फिलहाल चीतों को एक महीने के लिए क्वारंटाइन बाड़ों में रखा गया है। इसके बाद उन्हें बड़े इलाकों में छोड़ा जाएगा। उनकी आजादी धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी। कूनो में चीतल, हिरण और सांभर का शिकार वे बड़ी आसानी से कर सकते हैं।
क्या चीतों को शिकार में प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा?
हां। निश्चित तौर पर। यह चीते पिंजरे में नहीं रहे हैं। जंगलों में ही जन्मे हैं। इस वजह से उन्हें जंगली माहौल की जानकारी है। कूनो के तेंदुओं से प्रतिस्पर्धा इन चीतों के लिए नई नहीं होगी। हालांकि, यहां के तेंदुओं के लिए यह नई प्रतिस्पर्धा होगी। इस वजह से खतरा उनकी ओर से पैदा हो सकता है।
इन चीतों के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
यह चीते नए इलाके में हैं। उन्हें खाना-पानी की तलाश करने का तरीका बदलना होगा। उनके लिए पूरी तरह से नई जिंदगी होगी। यह आसान नहीं होता। हमें उम्मीद है कि यह चीते यहां के माहौल में घुल-मिल रहे हैं। यह एक लंबी प्रक्रिया है और सैटेलाइट और रेडियो कॉलर्स की मदद से उनकी निगरानी की जा रही है।
क्या इन चीतों के आसपास के गांवों में जाने का खतरा है?
नहीं। अन्य जानवरों की तरह चीते भी बस्तियों से दूर रहना ही पसंद करते हैं। उन्हें जंगल में रहना पसंद है। हम उनके कॉलर्स (जियोफेंस) का इस्तेमाल करते हुए अलर्ट सिस्टम बनाएंगे। इससे उनके गांवों के पास जाने पर उसकी सूचना हमें मिलती रहेगी।
