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MP News: वन प्रबंधन में औपनिवेशिक सोच से मुक्त होना जरूरी, CM बोले- टाइगर की उपस्थिति से इको सिस्टम सुधर रहा

Fri, 18 Apr 2025 08:37 PM IST
आनंद पवार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: आनंद पवार Updated Fri, 18 Apr 2025 08:37 PM IST
सार

दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में वन संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और जनजातीय समुदायों की आजीविका जैसे अहम मुद्दों पर शुक्रवार से मंथन शुरू हुआ। मुख्यमंत्री डॉ. यादव तथा केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री  भूपेंद्र यादव ने दीप प्रज्ज्वलित कर तथा भगवान बिरसा मुंडा और वीरांगना रानी दुर्गावती के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यशाला का शुभारंभ किया।  

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MP News: It is necessary to be free from colonial thinking in forest management, CM said- Eco system is improv
सीएम डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भोपाल में नरोन्हा प्रशासन अकादमी में जनजातीय क्षेत्रों में वन पुनर्स्थापना, जलवायु परिवर्तन और समुदाय आधारित आजीविका पर प्रशासन अकादमी में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रधानमंत्री का धन्यवाद देते हुए कहा कि देश में विलुप्त हो रहे जीवों जैसे चीतों की पुर्नस्थापना हो रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के जंगलों में टाइगर की सक्रिय उपस्थिति के कारण इको सिस्टम सुधर रहा है। अब हमारे यहां चीता भी आ गया है। उन्होंने कहा कि  किंग कोबरा सहित रैप्टाइल्स की प्रजातियों के संरक्षण के लिए भी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि इससे सर्पदंश की घटनाओं में कमी आएगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि वन क्षेत्र में विद्यमान जनजातीय समुदाय के पूजा और आस्था स्थलों के संरक्षण के लिए उचित व्यवस्था की जाएगी। आवश्यकता होने पर केंद्र शासन से भी सहयोग प्राप्त किया जाएगा।
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मुख्यमंत्री ने कहा है कि वन, आजीविका से संबद्ध विषय है। जनजातीय क्षेत्र में अपार वन संपदा उपलब्ध है। इसके प्रबंधन में ध्यान रखना होगा कि विकास से जनजातीय वर्ग के हित प्रभावित न हो। भारतीय जीवन पद्धति वनों पर आधारित रही है। वनों के प्रबंधन में औपनिवेशिक सोच से मुक्त होने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति आधारित जीवन जीने से कई समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो जाता है।  प्रदेश में यद्यपि कोई ग्लेशियर नहीं है, किंतु प्राकृतिक रूप से वनों से निकलने वाली जल राशि से ही प्रदेश से निकलने वाली बड़ी नदियां आकार लेती हैं। मध्य प्रदेश से निकली सोन, केन, बेतवा, नर्मदा नदियां देश के कई राज्यों में जल से जीवन पहुंचा रही हैं। बिहार, गुजरात और उत्तर प्रदेश की प्रगति में प्रदेश के वनों से निकले इस जल का महत्वपूर्ण योगदान है। 
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प्रकृति जो भी बनाएगी वह नेट जीरो होगा : यादव
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि हमें प्रकृति के संरक्षण के लिए समुदाय आधारित योजनाएं तैयार करने की जरूरत है। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि दुनिया में दो तरह के विकास मॉडल है। एक पश्चिम और दूसरा पूर्व। पश्चिम का विकास मॉडल मानव  केंद्रित है, जबकि पूर्व का  प्रकृति आधारित है। पश्चिम के मॉडल से साफ है कि इंसान जो भी बताए वह कचरा होगा, जबकि प्रकृति जो बनाएगी वह नेट जीरो होगा। उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर निवासरत प्रत्येक व्यक्ति को ऊर्जा, अन्न और जल को सुरक्षित रखना होगा। पर्यावरण संरक्षण में सॉलिड वेस्ट और ई-वेस्ट मैनेजमेंट बड़ी चुनौती है। प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और स्वस्थ जीवन शैली अपनाना आवश्यक है। यादव ने कहा कि विकास की इस धारा में वन और प्रकृति के संरक्षण को साथ लेकर चलना होगा। केंद्र सरकार ने कैपेसिटी बिल्डिंग के माध्यम से वनों में रहने वाले लोगों के जीवन में परिवर्तन के लिए कार्य किया है।
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जनजातीय समाज व वनों का अभिन्न संबंध : उइके
केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्यमंत्री दुर्गादास उइके ने कहा कि जनजातीय समाज और वनों का संबंध अभिन्न है। मिश्रित वनों के शरण के कारण जनजातीय समुदाय वन क्षेत्र से पलायन के लिए विवश हो रहा है। इसी का परिणाम है कि वन प्रबंधन और जनजातीय समुदाय के आजीविका के संसाधनों पर विचार-विमर्श की आवश्यकता उत्पन्न हो रही है। भारत में अरण्यक संस्कृति में ही वेद पुराण आदि का लेखन संपन्न हुआ। भारतीय ज्ञान परंपरा और वन्य व जनजातीय समाज एक दूसरे पर आश्रित हैं। इनका समग्रता में महत्व स्वीकारते हुए भविष्य की नीतियां निर्धारित करना आवश्यक है। मुख्य वक्ता, विचारक तथा चिंतक, मुख्य वक्ता गिरीश कुबेर ने कहा कि वन और वनवासियों के परस्पर हित एक दूसरे में निहित हैं। जनजातीय समाज की अजीविका का विषय वर्तमान परिदृश्य में बहुत संवेदनशील है। भारतीय ज्ञान परंपरा, वाचिक स्रोतों और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे ज्ञान को महत्व देना आवश्यक है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अनुसंधान को दी जा रही प्राथमिकता के अनुरूप जनजातीय समुदायों की वनों को लेकर जानकारी पर अध्ययन के लिए विशेष पहल होना चाहिए। वन संसाधनों के समान वितरण की परंपरागत प्रक्रिया को महत्व देने, नैसर्गिक गांव को ग्राम सभा के रूप में मान्य करने, जनजातीय समुदाय के वन अधिकारों की मान्यता को भी उन्होंने आवश्यक बताया।


जलवायु अनुकूल आजीविका जरूरी : शाह
जनजातीय कार्य मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह ने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में समुदाय आधारित वन पुनर्स्थापना, जलवायु अनुकूल आजीविका पर चर्चा आज की महती आवश्यकता है। इससे भविष्य में जनजातीय क्षेत्रों में सुरक्षित आजीविका की गारंटी मिलेगी। उन्होंने कहा कि देश से आये विषय विशेषज्ञों के अनुभवों एवं विचारों से प्राप्त होने वाले निष्कर्ष जनजातीय क्षेत्रों के निवासियों के सुरक्षित भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेगा।
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