Ramadan Special: पाक महीने में मासूम बच्चों ने रखा रोजा, सुबह जागकर की सेहरी, मांगी दुआएं
Ramadan Special: माह ए रमजान में माता पिता और घर के अन्य बड़े लोगों को देखकर इन बच्चों में भी नमाज पढ़ने की ललक जागती है, जबकि सेहरी इफ्तार का आकर्षण उन्हें रोजा रखने के लिए भी प्रेरित करता है। इस्लामी मान्यता के मुताबिक 7 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों के लिए मजहबी शर्तें लागू हो जाती हैं। इस लिहाज से उन्हें इस्लाम के पांच अहम अरकान तोहीद (एक ईश्वर पर यकीन), नमाज, रोजा, हज और जकात का पालन करना अनिवार्य हो जाता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सालाना परीक्षाओं से फारिग होकर बच्चे इन दिनों अपने घर के रमजानी माहौल में तैर रहे हैं। अल सुबह सेहरी में अधखुली आंखों से वे इबादतों के नजारे निहारते रहते हैं। जबकि हर शाम अफ्तार दस्तरख्वान पर भी इनकी धमा चौकड़ी लगी रहती है। इब्राहिम इमरान हों या फातिमा जुनैद अफ्तार के वक्त इस नए नजारे को अपनी नजरों में समाते दिखते हैं। ईबाद जफर भी अपनी अम्मी एमन का हाथ बंटाते हुए इफ्तार दस्तरख्वान को सजाने में मदद करते नजर आते हैं। उमर फारुख का हर रोज का आलम यह होता है कि वे देर शाम से खुद को रोजादार घोषित कर इफ्तार का वक्त होने तक अपनी पसंदीदा चीजों को खाने से गुरेज करते दिखाई देते हैं। अलिजा अपनी नन्हीं और तुतलाती जुबान से दुआओं को दोहराती हैं। जबकि अजिया को हर शाम इफ्तार दस्तरख्वान सजाने में अम्मा की मदद करना और पड़ोसियों के घर इफ्तार पहुंचाना बहुत पसंद है।
जिद के साथ रखा रोजा
हुनर सानी अपनी उम्र के छोटे पड़ाव पर ही हैं। लेकिन जिद के साथ उन्होंने अपना पहला रोजा रखा। मां ताबीर और अब्बू मोहसिन अपनी बिटिया की इस पहली शरई अदायगी पर निहाल हुए जा रहे हैं। उन्होंने कालोनी के बच्चों, आसपास के लोगों, रिश्तेदारों को जमा कर रोजा इफ्तार दावत के साथ इस बात का ऐलान किया कि उनकी सानी ने भी इस साल रोजा रखा है। मिनहा जिया भी कई दिनों से रोजा रखने की जिद थीं। आधा दिन तक खाना नहीं खाना, सारा दिन पानी पिये बिना रहकर दिखा देना और इसके बाद भी खुद को फिट दिखाने की कोशिश में जुटे रहना, के प्रयोगों से जिया ने घर वालों को राजी किया कि वह भी रोजा रखेंगी। पहला रोजा रखने की खुशी वह सारे मुहल्ले के लोगों को खुद जाकर बता आईं।
ऐसे बहलावे भी
मां का दिल अपने छोटे और मासूम बच्चों की भूख प्यास देखकर तड़प उठता है। जिसके चलते वे रोजा रखने की जिद पर अड़कर खड़े हो गए बच्चों को बहलाती रहती हैं। बच्चों का रोजा सिर्फ सेहरी इफ्तार करने का होता है, तुम सिर्फ दोपहर तक रोजा रखकर कुछ खा लो रोजा हो जाएगा, बच्चों को रोजा रखने का अल्लाह ने मना किया है, तुम सिर्फ नीयत कर लो अल्लाह कुबूल कर लेंगे, जैसे दर्जनों बहाने अम्मा अपनी झोली में समेटकर रखती हैं और इनसे बच्चों को बहलाती रहती हैं।
गले फूल माला, चेहरे पर मुस्कान, हाथ में इफ्तारी का थाल
अपना पहला रोजा बच्चों के लिए बड़े इनाम पाने का दिन होता है। मुश्किल और कई बातों में मन बहलाने के बाद जब शाम का वक्त होता है तो इनके बदन पर नए कपड़े, गले में फूल माला होती है। विजय मुस्कान के साथ इफ्तार के पकवान का थाल लिए ये घर घर पहुंचते हैं और अपने पहले रोजे की कामयाबी फख्र से सुनाते हैं। मस्जिद तक जाकर भी इफ्तार पहुंचाई जाती है। पास पड़ोस के लोग, रिश्तेदार, घर के बुजुर्ग इन नन्हें रोजेदारों की हौसला अफजाई नगद राशि, गिफ्ट और दुआओं से करते हैं।
खान आशु
