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MP: एक तरफ मदरसे बंद करने की कवायद, दूसरी तरफ अल्पसंख्यक नेता बोर्ड अध्यक्ष की दौड़ में जुटे, क्यों बने हालात?

Mon, 26 Aug 2024 02:26 PM IST
उदित दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भाेपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भाेपाल Published by: उदित दीक्षित Updated Mon, 26 Aug 2024 02:26 PM IST
सार

लंबे समय से खाली पड़े मप्र मदरसा बोर्ड में नियुक्ति की सुगबुगाहट शुरू हुई है। प्रदेश में मची वैध और अवैध मदरसों की हलचल के बीच इस गठन की जरूरत मानी जा रही है।

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Amid efforts to close madrassas in MP minority leaders join race for board president
बोर्ड अध्यक्ष बनने के प्रयास कर रहे नेता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लगातार जारी कार्रवाई से मप्र में मदरसों पर तलवार लटकी हुई है। मदरसों से मजहबी तालीम देने की शंका को आधार बनाकर सरकार ने एकमुश्त सैंकड़ों मदरसों पर तालाबंदी के हालात बना दिए हैं। वहीं, दूसरी तरफ इन मदरसों को संचालित करने वाले बोर्ड के गठन की कवायद तेज हो गई है। बोर्ड गठन की सुगनुगाहट ने प्रदेश के अल्पसंख्यक नेताओं के अरमान जगा दिए हैं। ताजपोशी की तमन्ना लिए इन नेताओं ने अपने आकाओं की चौखट बरदारी भी शुरू कर दी है। 

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वर्ष 1998 में कांग्रेस शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मप्र मदरसा बोर्ड की नींव रखी थी। इसके लिए तय किए गए बायलॉज के मुताबिक शिक्षा से जुड़े प्रो हलीम खान को इस बोर्ड का पहला अध्यक्ष बनाया गया था। इसके बाद से लगातार भाजपा सरकार द्वारा इस बोर्ड को अध्यक्ष दिए गए है। एसके मुद्दीन, गनी अंसारी, राशिद खान इसके अध्यक्ष बने। बोर्ड के अंतिम अध्यक्ष की भूमिका बुरहानपुर निवासी प्रो सैयद इमादुद्दीन ने निभाई। वर्ष 2018 में प्रदेश में बनी कांग्रेस सरकार के दौरान प्रो इमाद पहले शख्स रहे, जिन्होंने सरकार बदल के कारण नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा दिया था। तब से अब तक इस बोर्ड में किसी कार्यकारिणी का गठन नहीं हुआ है।
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अब कोशिशें इनकी तेज
मप्र मदरसा बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष प्रो सैयद इमादुद्दीन ने अपने कार्यकाल में संभाग और जिला अध्यक्षों की टीम गठित की थी। हालांकि, बोर्ड संविधान के प्रावधानों में ऐसी नियुक्ति की कोई मान्यता नहीं है। लेकिन, मदरसा बोर्ड की गतिविधियों को जिलों से लेकर छोटे-छोटे गांवों तक पहुंचाने की मंशा से यह प्रक्रिया की गई थी। सूत्रों का कहना है कि उस समय गठित की गई कमेटियों के पदाधिकारी अब बोर्ड अध्यक्ष के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से अधिकांश ओहदेदार अब भाजपा नेताओं के पास अपना दावा लेकर पहुंच रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि लंबे समय से खाली पड़े मप्र मदरसा बोर्ड में नियुक्ति की सुगबुगाहट शुरू हुई है। प्रदेश में मची वैध और अवैध मदरसों की हलचल के बीच इस गठन की जरूरत मानी जा रही है। स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन आने वाले इस बोर्ड के गठन को लेकर शिक्षा से जुड़े किसी अल्पसंख्यक भाजपा नेता की तलाश की जा रही है।
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6000 से ज्यादा मदरसा
जानकारी के मुताबिक मप्र वक्फ बोर्ड से पंजीकृत करीब साढ़े छह हजार मदरसा पूरे प्रदेश में संचालित हैं। इनमें पढ़ने वालों की तादाद 6 लाख से भी ज्यादा बताई जाती है। जानकारी के मुताबिक इनमें से करीब 2 हजार मदरसा शासन से अनुदानित हैं। यह अनुदान केंद्र और राज्य सरकार से संयुक्त रूप से जारी किया जाता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से मदरसों की यह अनुदान राशि रुकी हुई है। इसके चलते बड़ी तादाद में मदरसा बंद भी हो गए हैं। साथ ही पिछले दिनों चली सरकारी मुहिम ने भी बड़ी संख्या में गैर पंजीकृत मदरसों पर तालाबंदी कर दी है। 

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