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योगी 2.0 का मंत्रिमंडल: लगभग 15 दिन मंथन... कई बड़े चेहरे हुए बाहर, संघ और भाजपा के साथ '24' को देखकर लिया गया निर्णय

Sat, 26 Mar 2022 01:43 PM IST
ishwar ashish अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 26 Mar 2022 01:43 PM IST
सार

योगी सरकार के मंत्रिमंडल के निर्माण में संघ व भाजपा संगठन के साथ ‘24’ की भी खूब चली। मंत्रिमंडल किरदारों की भविष्य की भूमिका भी समझा रहा है।

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yogi adityanath's cabinet prepared according to BJP and RSS and need of 2024 election.
शपथ ग्रहण समारोह का एक दृश्य। - फोटो : amar ujala

विस्तार

लगभग 15 दिन मंथन। मंथन के निष्कर्षों पर शपथ ग्रहण से दो घंटे पहले तक परदा। तमाम मिथकों को तोड़ते और तीन दशक बाद लगातार दूसरी बार सरकार बनाने और आजादी के बाद पहली बार बतौर मुख्यमंत्री फिर सत्ता में वापसी जैसे कई कमाल कर दिखाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंत्रियों के चयन पर लखनऊ से दिल्ली तक कई बार बैठकें हुईं। सूची बनी और छटनी हुई।

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मंत्रिमंडल को लेकर कई चर्चा भी चलीं, लेकिन आखिर में कई चौंकाने वाले नामों के साथ योगी सरकार-2 के मंत्रिमंडल ने शपथ ली। तमाम पुराने और पार्टी के असरदार डॉ. दिनेश शर्मा जैसे बड़े चेहरे बाहर हो गए। सवाल यह है कि मंत्रिमंडल को अंतिम रूप देने में किसकी चली? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की या सरकार की?  लखनऊ में लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका में रहे संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक इसका जवाब कुछ यूं देते है, ‘संघ की भी चली, भाजपा संगठन की भी चली, लेकिन सबसे ज्यादा 24 की चली।’
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वरिष्ठ प्रचारक की बात सही लग रही है। सिर्फ 2024 की जरूरतों की ही चली। इस जरूरत को जातियों ने पूरी की तो उस जाति से भविष्य की जरूरतों को पूरा करने वाले किरदार तलाशे गए। कोई संघर्ष क्षमता से इस जरूरत को पूरी करता दिखा, कोई व्यवहार से संगठन की अपेक्षाओं को पूरी करने की उम्मीद जगाते दिखा तो उसके नाम पर मुहर लग गई। बिना यह सोचे कि उसकी पीठ पर किसी बड़े का हाथ है या नहीं। इसीलिए मंत्रिमंडल में बड़ी कुर्सियों पर बैठे कुछ वे चेहरे भी बाहर हो गए जिनके पीछे आरएसएस के बड़े पदाधिकारियों की ताकत मानी जाती थी या वे जिनके बारे में भाजपा के किसी बड़े नेता के नजदीकी होने की चर्चा थी। इससे पता चलता है कि संघ या भाजपा हाईकमान अब सिर्फ इसलिए किसी निर्णय का समर्थन नहीं करेगा कि उसके साथ किसी अपने की सहानुभूति है। निर्णय अब भविष्य की चुनौतियों व जरूरतों को ध्यान में रखकर होंगे।
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ये है प्रमाण: नए मंत्रिमंडल के ज्यादातर चेहरों को देखकर यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि उस पर हाईकमान की कृपा रही है या सिर्फ संघ के किसी बड़े व्यक्ति से जुड़ाव का लाभ मिला है। शायद यही वह वजह है कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी से दूसरी बार निर्वाचित होने के बावजूद नीलकंठ तिवारी को बाहर जाना पड़ा और दूसरे दल से आए दयालु मिश्र को काम करने का मौका दिया गया।

दरअसल, नीलकंठ भी संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी के कृपापात्र माने जाते रहे हैं और यह भी कहा जाता था कि वे भाजपा हाईकमान के भी प्रिय हैं। पर, चुनाव के दौरान जिस तरह की स्थिति बनी शायद उसी को ध्यान में रखते हुए नीलकंठ को बाहर करने का फैसला किया गया। शायद संघ व भाजपा नेतृत्व ने इस फैसले से यह भी बता दिया है कि जन अपेक्षाओं पर खरा न उतरने वालों के साथ पार्टी की कोई सहानुभूति नहीं है।

नेताओं की नजदीकी नहीं आई काम

सिद्धार्थनाथ सिंह, श्रीकांत शर्मा, सतीश महाना, आशुतोष टंडन सहित नए व पुराने कई ऐसे नाम हैं जिनकी दिल्ली में पहुंच एवं पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ नजदीकी की चर्चाओं के साथ मंत्रिमंडल में जगह पक्की मानी जा रही थी। पर, ऐसा नहीं हुआ। इनमें कुछ नामों को लेकर चर्चा है कि उन्हें दूसरी भूमिका सौंपी जाएगी। बावजूद इसके मंत्रिमंडल के गठन से यह संदेश तो साफ ही हो गया है कि नेताओं की नजदीकी से पार्टी में किरदारों की मजबूती का दौर बीत गया।

मौजूदा भाजपा की जरूरत सिर्फ परिणाम देने वाले, चुनौतियों की कसौटी पर खरे उतरने वाले चेहरे हैं । जिस तरह इस बार 2024 की जरूरतों की चली है उसी तरह आगे भी भावी चुनौतियों की चलेगी। इन चुनौतियों से पार पाने का भरोसा दिलाने वालों को पद भी मिलेगा और कद भी बढ़ेगा।

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