यादव सिंह को बेकुसूर बताकर बंद करा दी थी जांच
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सपा सरकार बनने के कुछ समय बाद ही यादव सिंह पर नोएडा आथॉरिटी में 954 करोड़ रुपये की विभिन्न परियोजनाओं में अनियमितता का प्रकरण उछला, लेकिन जिस तेजी से जांच आगे बढ़ती उससे अधिक तेजी से उस पर मिट्टी डालने की कार्रवाई भी शुरू हो गई।
प्रदेश सरकार ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी थी लेकिन इस एजेंसी ने यादव सिंह को बेकसूर बताकर जांच ही बंद कर दी। यादव सिंह के खिलाफ कई जांचें हुईं लेकिन लगभग हर बार सरकार खुद ही पैरवी में खड़ी हो गई।
पहले यादव सिंह पर नोएडा थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया और फिर सीबीसीआईडी की जांच हुई। उसे निलंबित कर किनारे कर दिया और विभागीय जांच शुरू की गई। फिर इसी सरकार ने निलंबन भी वापस ले लिया और आरोपी अभियंता को बहाल कर ताजपोशी भी कर दी।
यादव सिंह का प्रकरण सामने आने पर उसे निलंबित करते हुए नोएडा के सेक्टर-39 थाने में भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज कराया गया था। कार्रवाई इतनी तेज की गई कि मुकदमा लिखने के फौरन बाद नोएडा पुलिस ने यादव सिंह के घर पर दबिश भी दे दी पर यादव सिंह नहीं मिला।
पूर्व डीजीपी जगमोहन यादव ने दी थी क्लीनचिट
ऐसे ही नोएडा विकास प्राधिकरण ने भी यादव सिंह के घर पर उन्हें निलंबित किए जाने का नोटिस तक चस्पा करा दिया था।
कुछ ही दिनों में यादव सिंह ने सपा सरकार में भी अपना समीकरण बिठा लिया। नतीजा यह हुआ कि यादव सिंह के खिलाफ सीबीसीआईडी को जांच दे दी गई।
सीबीसीआईडी ने जब मामले की जांच की तब जगमोहन यादव उसके मुखिया थे। बाद में जगमोहन यादव को प्रदेश का डीजीपी बनाया गया। यह चर्चा आम रही कि यादव सिंह को क्लीनचिट देना काम आया।
जांच भी कुल दो बिंदुओं पर करने के आदेश दिए गए। यह बात और है कि जब जांच शुरू हुई तो विभाग के अधिकारी इस बात पर चुप्पी साधे रहे थे कि किन बिंदुओं पर जांच हो रही है। बाद में खुलासा हुआ कि जांच सड़क निर्माण और भूमिगत केबल डालने में हुई अनियमितता के आरोप में की गई।
नियमानुसार जांच सीबी-सीआईडी के मेरठ सेक्टर से कराई जानी चाहिए थी, पर ऐसा नहीं किया गया। सपा सरकार के खासे नजदीकी रहे तत्कालीन एडीजी सीबी-सीआईडी जगमोहन ने जांच की जिम्मेदारी लखनऊ सेक्टर को दी। जानकार बताते हैं कि लखनऊ सेक्टर की टीम सिर्फ एक बार मौके पर गई और सतही निरीक्षण कर वापस लौट आई।
टीम ने जो रिपोर्ट लगाई उसमें कहा गया कि कुछ स्थानों पर सड़क के निर्माण की जांच की गई, तो उसकी गुणवत्ता सही पाई गई। तफ्तीश से जुड़े अफसरों का कहना है सड़क निर्माण का भौतिक परीक्षण कर लिया गया।
लेकिन भूमिगत केबल का निरीक्षण करने के लिए सड़क खोदनी पड़ती। आखिर कितनी सड़क खोदी जाती। इसलिए नोएडा अथॉरिटी द्वारा कराए कार्य में जो टेक्निकल कमेटी की रिपोर्ट थी, उसका अध्ययन किया गया।
सपा सरकार ने यादव सिंह का निलंबन किया था बहाल
बसपा शासनकाल में सरकार के खासमखास माने जाने वाले यादव सिंह को मौजूदा सपा सरकार ने न सिर्फ निलंबन के बाद बहाल किया बल्कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे, तीनों प्राधिकरणों का मुख्य अभियंता भी बना दिया। केंद्रीय एजेंसियों की छापामारी के 12वें दिन बाद उसे तब दोबारा निलंबित किया गया जब सरकार की खासा किरकिरी हो चुकी थी।
27 नवंबर 2014 को यादव सिंह के ठिकानों पर आयकर विभाग के छापों के बाद सरकार ने उसे तीनों प्राधिकरणों के मुख्य अभियंता पद से तो हटा दिया लेकिन अन्य किसी कार्रवाई पर चुप्पी साधे रही। इधर प्रदेश सरकार ने चुप्पी साधी, उधर केंद्रीय एजेंसियों की सख्ती बढ़ गई।
बाद में मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कालेधन पर गठित एसआईटी ने अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद यादव सिंह के खिलाफ जांच-पड़ताल में जुटी सभी एजेंसियां एसआईटी की निगरानी में आ गईं।
सिंह के कारनामों के तमाम राज खुलने लगे। जांच की आंच चौतरफा नजर आने लगी।प्रदेश सरकार की चुप्पी पर सवाल उठने शुरू हुए तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने केंद्रीय एजेंसियों की जांच का इंतजार करने का हवाला देकर कार्रवाई न करने का बचाव किया। मगर, सवाल बंद नहीं हुए। तब आठ दिसंबर 2014 को यादव सिंह को निलंबित किया गया।