Sawan 2025: शिव और ब्रह्म के मिलन का अद्भुत संगम है शिव बाबा धाम, 180 साल से बना आस्था का प्रतीक; जानें कहानी
शिव बाबा धाम न सिर्फ आध्यात्मिक श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि ब्रह्म और शिव के मिलन की अनूठी परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है। 180 साल से आस्था का प्रतीक बने इस धाम में सावन महीने के सोमवार को 15 हजार से अधिक कांवड़िए जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बाबा को खड़ाऊ, लंगोट और जनेऊ अर्पित करते हैं।
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विस्तार
यूपी के अंबेडकरनगर जिला स्थित शिव बाबा धाम, शिव और ब्रह्म के अद्भुत मिलन का स्थल माना जाता है। अकबरपुर से महज पांच किमी दूर स्थित इस स्थान का धार्मिक महत्व 180 वर्ष से भी पुराना है। अयोध्या से 55 किमी दूर यह स्थल आजमगढ़, जौनपुर, सुल्तानपुर और अंबेडकरनगर के लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है।
यहां की कथा सन 1869 में देवरिया के संत शिव प्रसाद तिवारी की समाधि से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक तालुकेदार ने उन्हें चुनौती दी थी कि हवा में उछाली गई धोती यदि सूखकर गिरी तो उतनी जमीन उन्हें दे दी जाएगी। बाबा की धोती 154 बीघा से अधिक भूमि कर गिरी। तालुकेदार ने यह भूमि उन्हें दे दी। इसके बाद बाबा ने यहीं कुटिया बनाकर जीवन बिताया। 1869 में उन्होंने समाधि ले ली। बाबा के श्राप से तालुकेदार का परिवार रहस्यमयी तरीके से समाप्त हो गया।
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सावन के हर सोमवार को यहां 15-20 हजार श्रद्धालु, खासकर कांवड़िए अयोध्या से जल लाकर बाबा का जलाभिषेक करते हैं। मन्नत पूरी होने पर खड़ाऊ, जनेऊ और लंगोट चढ़ाते हैं। हर सोमवार और शुक्रवार को भजन, कीर्तन और भंडारा होता है। पुजारी ओमप्रकाश गोस्वामी के अनुसार बाबा की समाधि स्थल पर आज भी वटवृक्ष मौजूद है। इसे श्रद्धालु ब्रह्म और शिव का प्रतीक मानते हैं।
पंचमी तक होते हैं विशेष आयोजन
अमावस्या से पंचमी तक लगातार धार्मिक आयोजन और भंडारे चलते हैं। यहां लगभग पांच हजार श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था है। 16 धर्मशालाएं और कई पूजा हॉल हैं, जहां अनुष्ठान होते हैं।
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मान्यताएं जो आस्था को मजबूत बनाती हैं
मान्यता है कि शिव बाबा धाम के करीब 154 बीघा क्षेत्रफल में कोई निजी निर्माण नहीं किया जा सकता। यहां सिर्फ सार्वजनिक निर्माण संभव है। कृषि इंजीनियरिंग कॉलेज और पॉलीटेक्निक इसी भूमि पर हैं। आज भी कई गांवों में घर के दरवाजों पर पल्ले और चौखट नहीं लगाई जाती है। इसे बाबा का आदेश माना जाता है।