फिल्मों में 'महिलाओं की स्थिति' पर हुई गोष्ठी
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पुरानी फिल्मों में औरत जहां अबला थी, वो भूमंडलीकरण के दौर में एक
ये और भी ज्यादा खतरनाक है। प्रगतिशील लोग भी इसके जाल में फंस रहे हैं। देखा जाए तो फिल्मों में औरतों को हमेशा से ही मर्दों के शिकार के रूप में दिखाया गया है। ये बातें फिल्म निर्देशक आनंद पटवर्धन ने कही।
वे शनिवार को ‘भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय सिनेमा में स्त्रियों की भूमिका’ विषयक सेमिनार में बोल रहे थे। एडवा और शिया पीजी कॉलेज के डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन की ओर से बाल्मीकि प्रेक्षागृह में चल रहे दो दिवसीय फिल्मोत्सव ‘कोशिश आधी दुनिया पर पूरी नजर की’ के अंतिम दिन डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी दिखाई गई।
वरिष्ठ
रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने सिनेमा के व्यवसायिक पक्ष पर जोर देते
हुए कहा कि अब सिनेमा एक ऐसी इंडस्ट्री बन चुका है, जिसका पहला और आखिरी
उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना है। अब ये आंदोलन नहीं रहा।
कुछ प्रयासों को
छोड़ दिया जाए तो सिनेमा में कहीं भी सामाजिक सरोकार नहीं दिखते। अभिनेता
भी खुद को अब अभिनेता नहीं कहते, वे भी अपने आप को इंटरटेनर कहने लगे हैं।
सिनेमा में महिलाओं को हमेशा से ही उपभोग की वस्तु समझा जाता रहा है। गाने,
ड्रेस यहां तक कि स्त्री-पुरुष संबंधों को उपभोग की वस्तु समझकर और मजबूत
किया गया है, लेकिन इन दिनों सिनेमा में अभिनेत्री वर्किंग लेडी बनकर उभरी
हैं।
उनकी ममतामयी नारी की छवि बदली है। अब वे सिर्फ प्रेम नहीं करती बल्कि
एक कामकाजी स्त्री बनकर उभरी हैं। महिला फिल्म निर्देशकों की मौजूदगी का
बढ़ना भी अच्छी बात है।
सेमिनार की अध्यक्षता पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ.
चंद्रकला पांडेय ने की। इस मौके पर एडवा की प्रांतीय सचिव मधु गर्ग ने कहा
कि सिनेमा मनोरंजन का साधन नहीं, आंदोलन है जो कि बेहतर समाज भी बनाता है।