हनक दिखाने अखाड़े में उतरेगी आधी आबादी
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सैकड़ों वर्षों से चली आ रही महिला कुश्ती ‘हापा’ की परंपरा आज भी कायम है। नागपंचमी के दूसरे दिन होने वाले इस दंगल में दूरदराज की सैकड़ों महिलाएं जुटती हैं और महिला पहलवान अखाडे़ में उतर कर पैतरे आजमाती है।
महिलाओं का समूह ढोल-मंजीरों के साथ घरों से निकलता है और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हुए अखाड़े तक पहुंचता है। यहां शुरू होती हैं जोर-आजमाइश।
गोसाईगंज के अहिमामऊ में जोश व उत्साह से भरा ‘हापा’ का आयोजन शनिवार को शाम 4 बजे से देखने को मिलेगा, जिसमें महिला पहलवान ताल ठोकेगी तो अखाड़े के बाहर दूसरी महिलाएं इनमें जोश भरेगी।
ऐसे हुई ‘हापा’ की शुरुआत
हापा की शुरुआत रीछ देवी, गूंगे देवी व दुर्गा की पूजा के साथ भुइंया देवी की जय बोलकर की जाती है।
नारी को मजबूत करने व इनके मनोरंजन के लिए करीब दो सौ वर्ष पहले यहां के नवाब की बेगम नूरजहां व कमरजहां ने महिला कुश्ती के अनूठे आयोजन की नींव डाली थी, जिसे ‘हापा’ कहा जाता था।
उस समय अहिमामऊ एक छोटी सी रियासत थी, जिसमें महिलाओं की दबी कुचली स्थिति को संवारने के लिए बेगम ने इस ताकत के खेल का आयोजन शुरू कराया।
श्रृंगार करने से प्रसन्न होती हैं देवी
इस कार्यक्रम की तैयारियां भी महिलाएं करतीं थी। इसमें पुरुषों से कोई मदद नही ली जाती थी। वर्षों पुरानी इस परंपरा को अहिमामऊ की पूर्व प्रधान विनय कुमारी आज भी कायम रखे हैं।
विनय कुमारी बताती हैं कि इनके पूर्वज नवाबों के घर नौकरी किया करते थे, जिसके कारण बेगम से इनकी अजिया सास जनाका को ‘हापा’ की जिम्मेदारी मिली।
इसके बाद इनकी सास विलासा को, जिनसे 18 वर्ष की उम्र में विनय कुमारी को हापा के आयोजन की जिम्मेदारी मिली।
बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि महिलाएं सोलह श्रृंगार कर ‘हापा’ में शामिल होती हैं। उन्होंने बताया कि ऐसी मान्यता है कि महिलाओं के श्रृंगार कर हापा में शामिल होने से देवी प्रसन्न होती है।
पुरुषों के साथ बच्चों का प्रवेश भी वर्जित
हापा में पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। इतना ही नही हापा की आयोजक विनय कुमारी बताती हैं कि दो वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के भी प्रवेश पर रोक है।
वो बच्चे ही हापा में शामिल हो सकते हैं जो महिलाओं की गोद में हैं। हापा में महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला सिपाही होती हैं और बाहर स्थानीय पुलिस पुरुषों को आने से रोकती है।
हापा को लेकर ऐसी मान्यता है कि यहां की धूल माथे पर लगाने से भूत-प्रेत से ग्रस्त इंसान को राहत मिलती है। मान्यता के चलते दूरदराज के सैकड़ों लोग ‘हापा’ की धूल लेने अहिमामऊ आते हैं।