किसके कहने पर वापस ली गई थी सोनभद्र में कब्जा करवाने वाले अफसर के खिलाफ अर्जी
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उत्तर प्रदेश के वन विभाग के इतिहास में 19 सितंबर, 2012 काले दिन के तौर पर याद रखा जाएगा, क्योंकि उसी दिन सोनभद्र में ओबरा के वन बंदोबस्त अधिकारी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दी गई अर्जी वापस ले ली गई थी।
इसी अधिकारी पर वन भूमि को खुर्द-बुर्द करने के आरोप में प्रदेश सरकार ने शीर्ष कोर्ट में अर्जी लगाई थी, लेकिन बिना किसी लिखित आदेश के विभागीय अधिवक्ता ने याचिका वापस ले ली थी। तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने इस पर सवाल उठाते हुए अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन सचिव, वन पर शक जाहिर किया था। हालांकि सपा शासन में इसका संज्ञान ही नहीं लिया गया।
29 दिसंबर, 2014 को उच्चाधिकारियों को भेजे पत्र में एके जैन ने लिखा था प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन ‘वनवासी सेवा आश्रम बनाम यूपी सरकार’ रिट याचिका में एक प्रार्थना पत्र दिया था। इसमें वन बंदोबस्त अधिकारी, ओबरा द्वारा वन भूमि से संबंधित अनियमितताओं को शीर्ष कोर्ट की जानकारी में लाने की बात कही गई थी।
एके जैन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ऐसा प्रतीत होता है कि विभागीय अधिवक्ता ने यह अर्जी उच्चतम न्यायालय में शासन का पक्ष रखने में सहायता करने वाले किसी अधिकारी के मौखिक आदेश पर ही वापस ले ली थी।
मौखिक आदेश पर ही ले लिया इतना बड़ा निर्णय
जैन ने लिखा कि एक अन्य रिट में तत्कालीन सचिव, वन ने शपथ पत्र दिया था, जिसमें एफएसओ द्वारा वन बंदोबस्त प्रक्रिया में प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए वन अधिनियम की धारा-4 की भूमि के बड़े क्षेत्रफल को वन क्षेत्र से बाहर करने की कार्यवाही को अनुमोदित करने की प्रार्थना की गई थी। आशंका है कि तत्कालीन सचिव वन के निर्देशों पर ही इस पिटीशन को वापस लिया गया।