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यूपी चुनाव परिणाम: अगर नहीं मिला किसी को बहुमत तो ऐसे बनेगी सरकार

Thu, 09 Mar 2017 06:58 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 09 Mar 2017 06:58 PM IST
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 what will happen if no one get the mejority in Uttar Pradesh.
- फोटो : amar ujala

यूपी विधानसभा का चुनावी रण निपट गया। पार्टियों और प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला ईवीएम मशीनों में बंद हो गया। सपा-कॉंग्रेस गठबंधन नेता अखिलेश यादव व राहुल गांधी चुनाव में 300 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती भी बहुमत मिलने का दावा कर रही हैं। भाजपा भी पीछे नहीं है। इस पार्टी के नेता भी 265 प्लस का दावा कर रहे हैं।

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मतलब सभी दलों का दावा बहुमत मिलने का ही नहीं बल्कि दो तिहाई सीटें जीतने का है। पर, यह सवाल अपनी जगह है कि अगर ऐसा न हुआ तो फिर क्या होगा? क्या नए समीकरण बनेंगे? मौजूदा दोस्त किसी नए के साथ जाएगा तो दुश्मन, दोस्त बन जाएगा? इनका उत्तर नतीजों के बाद ही मिल पाएगा।
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लोगों के दिल व दिमाग में यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि चुनावी रण सात चरण में पूरा हुआ है। हर चरण का ट्रेंड अलग-अलग तरह का देखा गया है। इसलिए भले ही सभी प्रमुख राजनीतिक दल चुनाव बाद अपनी-अपनी पार्टियों की सरकार बनने का दावा कर रहे हों लेकिन एक संभावना यह भी जताई जा रही हैं कि पार्टियां बहुमत के लिए तय 202 सीटों का आंकड़ा हासिल करने से कुछ पीछे रह जाएं।
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जाहिर है कि उस स्थिति में सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए किसी न किसी नए साथी को साथ लेना पड़ेगा। इससे मौजूदा समीकरणों में कुछ न कुछ बदलाव जरूर होगा। वैसे अतीत में भी कई ऐसे प्रसंग सामने आ चुके हैं जब चुनाव पूर्व गठबंधन नतीजों के बाद नए समीकरणों के चलते टूटे हैं या फिर नए गठबंधन सामने आए हैं। अखिलेश वाजपेयी की एक रिपोर्ट-

सपा-कॉंग्रेस गठबंधन के पास ये हैं विकल्प

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अखिलेश यादव व राहुल गांधी - फोटो : amar ujala

सपा-कॉंग्रेस गठबंधन को अगर बहुमत न मिला लेकिन सबसे ज्यादा सीटें मिलीं। तब उसके सामने पहला विकल्प रालोद और निर्दल होंगे। भले ही रालोद और सपा में चुनाव से पहले गठबंधन पर बात न बन पाई हो लेकिन सरकार बनाने की स्थिति बनी तो सपा-कॉंग्रेस गठबंधन के साथ रालोद धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मजूबती देने के तर्क के साथ हाथ मिला सकता है। सरकार में शामिल हो सकता है।

निषाद पार्टी या अन्य छोटे दल जीतते हैं तो विधायकों का भी समर्थन सरकार बनाने के लिए इस गठबंधन को मिल सकता है। वैसे तो सपा और बसपा को दो धुर विरोधी दल माना जाता है। पर, बसपा की सीटों का आंकड़ा गठबंधन और भाजपा दोनों से पीछे रहा तो जंग व सियासत में कुछ भी असंभव नहीं की कहावत भी चरितार्थ हो सकती है।

ऐसी स्थिति में एक संभावना यह हो सकती है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए बसपा तटस्थ भूमिका अपनाकर सपा-कॉंग्रेस गठबंधन के लिए सरकार बनाने व विश्वासमत हासिल करने का रास्ता आसान कर दे।

वैसे भी ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि सपा की कमान अब उन मुलायम सिंह यादव के हाथ में नहीं है जिनके मुख्यमंत्रित्व काल में गेस्ट हाउस कांड हुआ था। यही नहीं, मायावती की तरफ से शिवपाल को लेकर लगातार नरम रुख भी किसी नए समीकरण का सूत्रधार बन सकता है।

सपा-कॉंग्रेस के पास ये भी होंगे विकल्प
- सपा-कांग्रेस गठबंधन को रालोद, अन्य छोटे दल  व निर्दलीय दे सकते हैं समर्थन।
- सुनने में अटपटा लग सकता है लेकिन धुर विरोधी सपा-बसपा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हाथ मिला सकते हैं।

बसपा के सामने मौजूद रास्ते

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बसपा सुप्रीमो मायावती

अगर बसपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी लेकिन उसकी सीटों का आंकड़ा बहुमत तक न पहुंचा। उस स्थिति में बसपा के सामने एक विकल्प तो सपा जैसा ही होगा। जिसमें वह रालोद, निर्दलीयों या अन्य छोटे दलों को सरकार में शामिल कर सरकार बना लें।

रालोद पहले भी विधानपरिषद चुनाव में बसपा का समर्थन कर चुका है। दूसरा रास्ता कॉंग्रेस का साथ है। भले ही कॉंग्रेस का आज सपा के साथ गठबंधन है लेकिन यहां भी सियासत में सब जायज वाली कहावत लागू होती है।

बसपा केंद्र की यूपीए सरकार को भी समर्थन देती रही है। इस चुनाव प्रचार में भी खास बात यह ध्यान में रखने वाली है कि मायावती या राहुल गांधी ने एक-दूसरे पर प्रहार नहीं किए हैं। रही बात भाजपा से साथ की तो बसपा के साथ गठबंधन या समर्थन से प्रदेश में तीन बार सरकारें बनी हैं।

पर, इस बार दोनों के एक साथ होने की संभावना काफी क्षीण है। मायावती खुद कह चुकी हैं कि बहुमत न भी मिला तो वह भाजपा से हाथ मिलाकर मुसलमानों को धोखा नहीं देंगी। सरकार बनाने के बजाय विपक्ष में बैठना पसंद करेंगी।

बसपा के पास ये भी विकल्प मौजूद
- बसपा को सपा की तरह रालोद, छोटे दलों, निर्दलीयों का समर्थन मिल सकता है।
- सरकार बनाने के लिए सपा के साथ गठबंधन में शामिल कॉंग्रेस की मदद ली जा जा सकती है।

भाजपा के पास सीमित समीकरण

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भाजपा की बात करें तो बहुमत न मिलने पर उसके सामने समीकरण काफी सीमित दिखाई दे रहे हैं। सपा या कॉंग्रेस की तरफ से भाजपा को कोई समर्थन या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहयोग मिलने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। रालोद से भी भाजपा के रिश्ते बहुत मधुर नहीं है।

चुनाव पूर्व दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की चर्चा फैली जरूर थी लेकिन दोनों तरफ से इससे इन्कार कर दिया गया था। फिर भी संभव है कि सरकार में भागीदारी की शर्त पर दोनों पार्टियों के बीच दोस्ती हो जाए।

इसके अलावा भाजपा के सामने भी निर्दलीयों व निषाद पार्टी जैसे छोटे दलों को साथ लेकर सरकार बनाने का विकल्प है। जहां तक दूसरे दलों में तोड़फोड़ का विकल्प है तो भाजपा ऐसा करने की कोशिश भी करेगी, इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती।

ये विकल्प आजमा सकती है भाजपा
- भाजपा, रालोद, निषाद पार्टी, छोटे दल व निर्दलीय के समर्थन से सरकार बना सकती है।
- राजनीति संभावनाओं का खेल है, इसमें बसपा व भाजपा एक दूसरे को समर्थन दे या ले सकते हैं।

ये भी हैं दिलचस्प सवाल

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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala

सपा-कॉंग्रेस गठबंधन बहुमत में आया तब तो यह साफ है कि अखिलेश यादव ही मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेंगे। सपा और कॉंग्रेस दोनों सरकार में रहेंगे। बसपा आई तो भी तय है कि मायावती मुख्यमंत्री होंगी। पर, मायावती इस समय राज्यसभा की सदस्य हैं।

जाहिर है कि बसपा को बहुमत मिलने पर मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्हें राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देना होगा। साथ ही छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता लेनी होगी।

देखने वाली होगी कि इसके लिए वह विधान परिषद का रास्ता तलाशेंगी या पार्टी के किसी नवनिर्वाचित विधायक से त्यागपत्र दिलाकर उसकी सीट से उपचुनाव लड़कर विधानसभा सदस्य के रास्ते से सूबे की सरकार की बागडोर संभालना पसंद करेंगी।

वैसे मायावती ने 2007 में विधान परिषद की सदस्यता का ही विकल्प चुना था। भाजपा गठबंधन की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा? यह अभी स्पष्ट नहीं है। पर, जैसा कि केशव प्रसाद मौर्य या मनोज सिन्हा के नाम चर्चा में हैं तो ऐसा होने पर इन्हें भी लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देना होगा।

भाजपा के पास ये हैं विकल्प

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह

ऐसी स्थिति में भी यह देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश व मायावती की तरह भाजपा के ये नेता भी विधान परिषद का रास्ता चुनते हैं या पार्टी के किसी विधायक का त्यागपत्र दिलाकर उसकी सीट से चुनाव लड़कर सदन में आते हैं। या फिर भाजपा, विधायकों में से ही किसी को मुख्यमंत्री बनाती है।

अगर भाजपा गठबंधन की सरकार बनती है और सपा-कॉंग्रेस गठबंधन मुख्य विपक्षी दल होता है तो यह देखना भी दिलचस्प होगा कि मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव क्या भूमिका पसंद करते हैं।

वह विधान परिषद सदस्य ही बने रहते हैं या फिर पार्टी के किसी सदस्य त्यागपत्र दिलाकर उसकी सीट से चुनाव लड़कर विधानसभा में भाजपा सरकार से मोर्चा लेना पसंद करते हैं।

रही बात बसपा की तो उसके मुख्य विपक्षी दल बनने पर लगभग यह तय माना जा रहा है कि वह राज्यसभा में ही रहेंगी। यहां पार्टी का कोई दूसरा नेता विपक्ष के नेता की भूमिका निभाएगा।

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