यूपी के कैबिनेट मंत्री आजम खां के खिलाफ वारंट जारी
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यूपी के कैबिनेट मंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेता आजम खां के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जमानती वारंट जारी किया है।
यूपी जल निगम के एक सहायक अभियंता को भ्रष्टाचार के आरोपों में दी गई सेंसर एंट्री के मामले में हाईकोर्ट ने आजम खां को निगम के चेयरमैन के तौर पर दो अन्य अधिकारियों के साथ तलब किया था।
जस्टिस सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष बुधवार को निवर्तमान एमडी पीके आसुदानी (28 फरवरी 2017 को रिटायर हो गए) और चीफ इंजीनियर आरपी सिन्हा तो उपस्थित हुए, लेकिन चेयरमैन आजम खां नहीं आए।
उनकी ओर से हाजिरी माफी की अर्जी दी गई, लेकिन इसे हाईकोर्ट ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि इसमें गैर-हाजिरी की कोई वजह नहीं दी गई है। साथ ही अगली तारीख छह मार्च तय करते हुए इस दिन उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी किया।
ये था पूरा मामला
यह मामला यूपी जल निगम की ही वर्ष 2013 की याचिका का है, जिसमें निगम ने उप्र राज्य लोकसेवा अभिकरण के एक निर्णय को चुनौती दी थी। जल निगम ने अपने तत्कालीन सहायक अभियंता धीरेंद्र कुमार सिंह को वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों में जांच करने के बाद सेंसर एंट्री दी थी।
सिंह ने इसके खिलाफ अभिकरण में शिकायत की। उनका कहना था उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
साथ ही जो आरोप उन पर लगाए गए, उसकी चार्जशीट पर जांच करने वाले अधिकारी के दस्तख्त थे।
इसके विपरीत जो मूल चार्जशीट है, उसमें चार्जशीट जारी करने वाले अधिकारी ने हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने दस्तावेजों की जालसाजी का आरोप लगाया। अभिकरण ने उनकी शिकायत स्वीकार कर ली।
इसलिए कोर्ट ने उठाए सवाल
अभिकरण के इस निर्णय के खिलाफ जल निगम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका चेयरमैन की ओर से थी, जो आजम खां हैं। इसकी सुनवाई के दौरान जल निगम ने करीब तीन वर्ष बाद चार्जशीट की एक और कॉपी हाईकोर्ट में प्रस्तुत की और बताया कि इस पर जांच अधिकारी और चार्जशीट जारी करने वाले दोनों अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए हैं।
17 फरवरी को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस दस्तावेज को फर्जी और मनमर्जी से तैयार किए जाने का संदेह जताया। अदालत ने कहा कि अगर यह दस्तावेज जल निगम के पास उपलब्ध था तो इसे पहले ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए था।
ऐसा नहीं किया गया, बल्कि अभिकरण ने चार्जशीट में इसे जारी करने वाले अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं पाए तभी शिकायत को स्वीकार किया। मौजूदा दस्तावेज इशारा करता है कि याचिकाकर्ता जल निगम के अधिकारी मिलकर चार्जशीट की कमी को दूर करके अभिकरण के निर्णय को चुनौती देना चाहते हैं।