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वरुण के बहाने बही सियासी शिष्टाचार की बयार

Sun, 16 Mar 2014 10:24 AM IST
शिशिर द्विवेदी/अमर उजाला, लखनऊ
शिशिर द्विवेदी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 16 Mar 2014 10:24 AM IST
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varun gandhi will not organise any rally in amethi

सियासी शिष्टाचार इस बार भाजपा नेता वरुण गांधी के बहाने चर्चा में है।

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दरअसल, सुल्तानपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने पहुंचे वरुण ने राजनीति में शिष्टाचार की दुहाई देते हुए साफ कह दिया है कि वे अमेठी में भाजपा का प्रचार करने नहीं जाएंगे।

दरअसल, अमेठी से उनके चचेरे भाई व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी मैदान में हैं।

फुटबालर बाईचुंग भूटिया टीएमसी के टिकट पर दार्जिलिंग से चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन उन्होंने दिल्ली से कांग्रेस प्रत्याशी अजय माकन के लिए प्रचार कर रहे हैं। उनका कहना हैं, माकन से निजी रिश्तों के चलते वे उन्हें जिताने की अपील कर रहे हैं।

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वैसे वरुण या भूटिया कोई पहले नेता नहीं हैं जो परिवार का लिहाज कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश में राजमाता विजयाराजे सिंधिया जीवन भर जनसंघ व भाजपा तो उनके पुत्र माधवराव सिंधिया कांग्रेस से चुनाव लड़ते व जीतते रहे, पर कभी न तो एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में कूदे और न ही प्रचार करने निकले।
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बदलते वक्त के साथ यह सदाशयता सियासी लेन-देन में तब्दील होती दिख रही है। कोई पार्टी अगर किसी बड़े नेता के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारता है तो उसके पीछे शिष्टाचार कम, भविष्य के सियासी समीकरण ज्यादा होते हैं।


जब नेहरू ने कहा, नरेंद्र देव के खिलाफ नहीं करूंगा सभा
कुछ दशक पहले तक राजनीति में बड़े कद की शख्सियतों के प्रति शिष्टाचार की भावना के पीछे स्वार्थ नहीं होता था। इसकी बड़ी मिसाल तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पेश की थी।

फैजाबाद से आचार्य नरेंद्रदेव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी थे। कांग्रेस ने उनके खिलाफ बाबा राघवदास को उतारा था। नेहरू जब फैजाबाद में आमसभा को संबोधित करने पहुंचे तो यह जानकर कि, यहां नरेंद्रदेव मैदान में हैं, तब उन्होंने सभा में जाने से ही मना कर दिया।

नेहरू ने कांग्रेस नेताओं से कहा कि आपको आचार्य जी के खिलाफ प्रत्याशी उतारना ही नहीं चाहिए था।


सद्भावना के झरोखे से दिखता दिल्ली का तख्त

सपा सुप्रीमो मुलायमसिंह यादव ने पिछले दिनों कहा कि वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ रायबरेली से प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। कुछ ऐसे ही संकेत राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र के बारे में भी दिए।

पिछले चुनाव में भी सपा व कांग्रेस नेतृत्व रायबरेली, अमेठी व मैनपुरी सीटों पर इसी तरह की सदाशयता की नजीर पेश कर चुका है।

हालांकि कांग्रेस ने मुलायमसिंह की बहू डिंपल के खिलाफ फीरोजाबाद में राज बब्बर को उपचुनाव में उतार दिया और वे जीत भी गए।

इसके बावजूद अगर मुलायमसिंह अब भी सोनिया व राहुल के लिए सीट छोड़ने की उदारता दिखा रहे हैं तो उसके पीछे लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाले समीकरण हैं।

सपा प्रमुख को लगता है कि किसी भी दल को साफ बहुमत न मिलने की सूरत में वे धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक बनकर सोनिया के सहारे दिल्ली के तख्त पर काबिज हो सकते हैं।



लेकिन वे अपनी इस मंशा को शिष्टाचार का आवरण ओढ़ाकर पेश करते हैं और कहते हैं कि उन तमाम बड़े नेताओं जिनसे लोकसभा की शोभा बढ़ती है, के खिलाफ प्रत्याशी न उतार जीतने देना चाहिए।

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