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वैलेंटाइन डे स्पेशल: ये हैं 'स्पेशल कपल्स', कहते हैं अलग-अलग दौर की कहानी

Tue, 14 Feb 2017 01:55 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 14 Feb 2017 01:55 AM IST
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valentine special couple of different decades.
- फोटो : amar ujala

वैलेंटाइन डे को प्रेम के विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। लखनऊ के बाशिंदों के लिए यह विजय प्रेम विवाह में भी है। अमर उजाला ने ऐसे कुछ कपल्स से बात की, जिन्होंने बीते साठ वर्षों के अलग-अलग दशकों में प्रेम विवाह किए।

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इस दौरान उन्होंने जो कुछ देखा और महसूस किया, उसके आधार पर प्रेम विवाहों को लेकर लखनऊ के समाज के नजरिए को समझा जा सकता है। यह भी देखा जा सकता है कि पहले जहां प्रेम विवाह करना एक चुनौती था, लेकिन आज परिवारों में इसे लेकर स्वीकार्यता बढ़ी है।

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स्वयंवर की संस्कृति रही है, अब बंदिशें किसलिए

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प्रो. रवि कांत और डॉ. बीना - फोटो : amar ujala

कब मिले, विवाह की राह कैसे बनाई : किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर के तौर पर काम करते हुए प्रो. रविकांत और डॉ. बीना मिले और एक दूसरे को दिल दे बैठे। जल्द ही विवाह करना तय किया, लेकिन इससे पहले परिवारों की सहमति को दोनों ने महत्वपूर्ण माना। घरों में बात की, अपने निर्णय के बारे में बताया और मर्जी से शादी का मतलब भी समझाया। परिवारों ने उनकी बातों को स्वीकार किया और 1982 में दोनों का विवाह हुआ।

आज : प्रो. रविकांत और डॉ. बीना चिकित्सा के क्षेत्र में देश-दुनिया में पहचाने जाते हैं। केजीएमयू के वीसी प्रो. रविकांत कहते हैं कि दोनों को 35 साल पुराने अपने निर्णय को सफल साबित करने के लिए अलग से कुछ नहीं करना पड़ा, यह सही निर्णय था और आज भी वे इस पर गर्व करते हैं।

कितना बदला समाज : समाज में प्रेम विवाहों को लेकर दोनों का मानना है कि देश की संस्कृति में काफी बदलाव आया है, ऐसे देश की संस्कृति से जहां स्वयंवर की परंपरा रही है। डॉ. रविकांत कहते हैं कि स्वयंवर यानी लड़की को यह स्वतंत्रता की वह अपने लिए योग्य वर का स्वयं चुनाव करे। उस समय से आज के समय में हमें प्रगति करनी थी, लेकिन सामाजिक तौर पर अवनति ही देखने को मिल रही है। वे कहते हैं कि अगर लड़कियों में शिक्षा का स्तर सुधरे तो वे बेहतर ढंग से अपने प्रेम के काबिल व्यक्ति को समझ सकेगी।

प्रेम समाज को मजबूत करे, विवाह संस्था की बदनामी नहीं

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जगदीश और भारती गांधी - फोटो : amar ujala

कब मिले, कैसे निकाली विवाह की राह : देश के प्रमुख स्कूली शृंखला के संस्थापक जगदीश गांधी साठ के दशक में लखनऊ यूनिवर्सिटी प्रेजीडेंट थे। लाइब्रेरी में एक लड़की नजर आई जो लाइब्रेरियन के न होने से किताब इश्यू नहीं करवा पा रही थी। जगदीश गांधी ने अपने अध्यक्ष होने के रसूख से उसे किताब दिलवाई। अगले दिन वे बेगम हजरत महल पार्क में एक सत्संग आयोजन से जुड़े थे, जहां वो ही लड़की फिर नजर आई, सत्संग सुनते हुए। वे प्रभावित हुए कि यूनिवर्सिटी की लड़की सत्संग में आती है। उससे और उसके पिता से मिले, अपने घर आमंत्रित किया। लड़की का नाम था भारती और जगदीश ने उससे विवाह करने की इच्छा उनके पिता से जता दी। आर्थिक रूप से स्थापित नहीं थे, लेकिन अपने जज्बे से भारती को प्रभावित किया, जो विवाह के लिए राजी हो गईं। जगदीश बताते हैं कि 64 रुपये महीने किराये पर वे रहते थे, 10 रुपये में नजीराबाद के रामचरण दास प्रकाशक से शादी के कार्ड के बजाय पर्चे छपवाए और अखबारों में डलवा कर शहर में बंटवा दिए। जगदीश गांधी बताते हैं कि तत्कालीन गवर्नर वीवी गिरी भी इस शादी का हिस्सा बने।

आज : जगदीश और भारती गांधी आज लखनऊ में प्रमुख शिक्षाविद् और स्कूलों के संचालक के रूप में पहचाने जाते हैं। जगदीश कहते हैं कि विवाह आयोजनों को सादगी से मनाने का संदेश वे आज भी देते हैं।

कितना बदला समाज : प्रेम विवाहों पर समाज के रवैए में बदलाव को जगदीश गांधी सार्थक मानते हैं, लेकिन यह भी कहते हैं कि इसके जरिये बजाय नुकसान पहुंचाने के सांस्कृतिक रूप से समाज को मजबूत किया जाना चाहिए। आज प्रेम नहीं होने पर भी आकर्षण में बंध कर किए जा रहे प्रेम विवाह ही वजह हैं कि विवाह जैसी दैवीय संस्था का अंत बढ़ते तलाक के मामलों में दिख रहा है। उनसे कई मांएं संपर्क करती हैं जो अकेले बच्चों को पाल रही हैं तो कई पिता भी हैं जो बच्चे की कस्टडी के लिए उनसे दरख्वास्त करते हैं।

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अपना मुकाम तो बनाइए, प्रेम का मुकाम खुद बन जाएगा

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डॉ. रवि और डॉ. नेहा निगम सूर्यवंशी - फोटो : amar ujala

कब मिले, विवाह की राह कैसे बनाई : हाल में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त हुए डॉ. रवि सूर्यवंशी और डॉ. नेहा निगम 2007 में लखनऊ यूनिवर्सिटी में मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के दौरान मिले। रवि ने बताया कि दोनों साथ पढ़ते थे तो ज्यादा समय एक दूसरे को दे पाते थे। यहीं से प्रेम की शुरुआत हुई। साथ-साथ मास्टर्स और पीएचडी किया। दूसरी ओर अपने कॅरिअर पर भी ध्यान दिया। यही वजह है कि जहां डॉ. रवि असिस्टेंट प्रोफेसर बने तो वहीं डॉ. नेहा अब पोस्ट डॉक्टरल फैलोशिप प्राप्त हैं।

आज : डॉ. रवि कहते हैं कि 2016 में उनका विवाह हुआ तो परिवार को राजी करना कोई मुश्किल नहीं था। हालांकि कुछ रिश्तेदारों को इस पर एतराज था, लेकिन परिवार का साथ दोनों को मिला, ऐसे में आज वे खुशी हैं क्योंकि परिवार साथ है।

कितना बदला समाज : डॉ. रवि कहते हैं कि अपने विवाह के परिप्रेक्ष्य में जब से प्रेम विवाहों को देखते हैं तो महसूस करते हैं कि विवाह करने जा रहे युवाओं को आत्मनिर्भर होना और अपनी जिम्मेदारी उठाने लायक बनना चाहिए। ऐसा होने पर परिवारों की रजामंदी पाना मुश्किल काम नहीं होता। बाकी समाज से आज भी सहयोग नहीं मिलता, लेकिन परिवार साथ है तो चिंताएं दूर हो जाती हैं।

दो संस्कृतियों का रच दिया प्रेम ने

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फारुख और हर्षिता खान - फोटो : amar ujala

कब मिले, विवाह की राह कैसे बनाई : हर्षिता और फारुख गोरखपुर में ग्रेजुएशन के दौरान 1989 में एक दूसरे से मिले। यहीं से दोस्ती हुई, जिसे प्रेम में बदलने में कुछ वर्ष लगे। 1994 में दोनों ने शादी करने का निर्णय लिया। हर्षिता बताती हैं कि यह सब आसान नहीं था, पूर्वांचल में दो अलग-अलग धर्म के युवाओं के इस निर्णय पर पूरा समाज अपनी राय रखता है। इनका दबाव परिवार पर भी होता है। यही वजह रही कि तमाम मुश्किलों के बाद दोनों का विवाह हुआ तो उसके करीब छह वर्ष तक हर्षिता अपने परिवार से बातचीत नहीं कर सकीं। बाद में हालांकि स्थितियां सामान्य हो गईं।

आज : हर्षित और फारुख के लिए आज स्थितियां अलग हैं। वे कहते हैं कि पहले चुनौतियां थीं, लेकिन आज उस निर्णय पर खुशी होती है। विवाह के बाद मानसिक और आर्थिक तौर पर कई संकट उन्होंने देखे, लेकिन यह प्रेम ही था, जो उनकी प्रेरणा शक्ति बना।

कितना बदला समाज : हर्षिता कहती हैं कि पूरे समाज का वह नहीं कह सकतीं, लेकिन उनका परिवार दो संस्कृतियों का संगम है, जहां कुरानख्वानी भी होती है तो आरती भी। ईद पर कार्यक्रम होता है तो दोस्तों रिश्तेदारों का आमंत्रण हर्षिता देती हैं और होली स्नेह मिलने के आमंत्रण फारुख देते हैं।

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