फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   ustad zakir hussain visit in lucknow

कभी जनरल बोगी में जमीन पर होते थे जाकिर और गोद में तबला

Tue, 19 Jul 2016 03:56 PM IST
आलोक पराड़कर/अमर उजाला, लखनऊ
आलोक पराड़कर/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 19 Jul 2016 03:56 PM IST
विज्ञापन
ustad zakir hussain visit in lucknow
लखनऊ में जाक‌िर हुसैन - फोटो : amar ujala

उस्ताद जाकिर हुसैन की बातें भी उनके तबले की तरह मधुर हैं। रविवार को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में उनका तबला बोल रहा था लेकिन सोमवार को वह खुद बोल रहे थे।

विज्ञापन


उस्ताद जाकिर हुसैन कहते हैं कि मेरे पिता जी हमेशा कहते थे कि ये सरस्वती है, इसकी इज्जत करो, इसे रास्ते की कोई चीज न समझो। कभी तबले के पास जूता न रखो, तबले पर कभी अपने कपड़े न रखो, उसको एक पूजा की चीज समझो। 
विज्ञापन


हर वाद्य में एक रूह है, एक आत्मा है। अगर आपको एक अच्छा कलाकार बनना है तो आपको उस वाद्य से इजाजत लेनी है कि वह वाद्य आपको स्वीकार करे। ये बहुत जरूरी चीज है। अगर उस वाद्य ने आपको स्वीकार कर लिया तो समझिए कि दरवाजा खुल गया। 
विज्ञापन
विज्ञापन


जैसे उस्ताद विलायत खान साहब थे तो सितार जैसे उनसे पूछता कि आप हुक्म करिए कि मुझे करना है। तभी उनके दिमाग में जो आता वह उस पर निकलने लग जाता। ऐसा तब होता है जब साज कलाकार से सहमत होता है जो आप चाहेंगे वह बजेगा। 

ट्रेन में ऐसे ध्यान रखते थे तबले का

ustad zakir hussain visit in lucknow
वाद्य यंत्र में बसती है रूह

यह तब होता है जब कलाकार का साज से विशेष रिश्ता बनता है, उसकी रूह से रिश्ता बनता है। मैं 12 साल का था तब से मैंने सफर शुरू किया था तबला बजाने के लिए। मुंबई से जा रहे हैं, मुगलसराय में उतरकर ट्रेन बदल रहे हैं, पटना या कोलकाता जा रहे हैं। हम छोटे थे और इतने पैसे नहीं होते थे कि आरक्षण वगैरह करा सकें। 

उस समय बस यह था कि ट्रेन में घुसना है, लेकिन दिमाग में यह भी होता था कि पिता का आदेश है, ये सरस्वती है, तो तबला को कोई धक्का भी नहीं पहुंचना चाहिए। तो सीट तो मिलती नहीं, अखबार बिछाकर नीचे बैठ जाता और गोद में तबला ले लेता, जिससे इसे धक्का न लगे, किसी का पैर न लगे, किसी का जूता न लगे। 

फिर छह घंटे की यात्रा हो, आठ घंटे की या फिर 12 घंटे की, तबला गोद में ही रहता था। ये एक रिश्ता, एक प्यार जो हमने अपने वाद्य को दिया तो उसका सिला हमें वाद्य से मिला। यही रिश्ता वाद्य से बना तो थिरकवा साहब थिरकवा साहब हुए, किशन महाराज, गुदई महाराज ने अपनी खास जगह बनाई।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed