कभी जनरल बोगी में जमीन पर होते थे जाकिर और गोद में तबला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उस्ताद जाकिर हुसैन की बातें भी उनके तबले की तरह मधुर हैं। रविवार को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में उनका तबला बोल रहा था लेकिन सोमवार को वह खुद बोल रहे थे।
उस्ताद जाकिर हुसैन कहते हैं कि मेरे पिता जी हमेशा कहते थे कि ये सरस्वती है, इसकी इज्जत करो, इसे रास्ते की कोई चीज न समझो। कभी तबले के पास जूता न रखो, तबले पर कभी अपने कपड़े न रखो, उसको एक पूजा की चीज समझो।
हर वाद्य में एक रूह है, एक आत्मा है। अगर आपको एक अच्छा कलाकार बनना है तो आपको उस वाद्य से इजाजत लेनी है कि वह वाद्य आपको स्वीकार करे। ये बहुत जरूरी चीज है। अगर उस वाद्य ने आपको स्वीकार कर लिया तो समझिए कि दरवाजा खुल गया।
जैसे उस्ताद विलायत खान साहब थे तो सितार जैसे उनसे पूछता कि आप हुक्म करिए कि मुझे करना है। तभी उनके दिमाग में जो आता वह उस पर निकलने लग जाता। ऐसा तब होता है जब साज कलाकार से सहमत होता है जो आप चाहेंगे वह बजेगा।
ट्रेन में ऐसे ध्यान रखते थे तबले का
यह तब होता है जब कलाकार का साज से विशेष रिश्ता बनता है, उसकी रूह से रिश्ता बनता है। मैं 12 साल का था तब से मैंने सफर शुरू किया था तबला बजाने के लिए। मुंबई से जा रहे हैं, मुगलसराय में उतरकर ट्रेन बदल रहे हैं, पटना या कोलकाता जा रहे हैं। हम छोटे थे और इतने पैसे नहीं होते थे कि आरक्षण वगैरह करा सकें।
उस समय बस यह था कि ट्रेन में घुसना है, लेकिन दिमाग में यह भी होता था कि पिता का आदेश है, ये सरस्वती है, तो तबला को कोई धक्का भी नहीं पहुंचना चाहिए। तो सीट तो मिलती नहीं, अखबार बिछाकर नीचे बैठ जाता और गोद में तबला ले लेता, जिससे इसे धक्का न लगे, किसी का पैर न लगे, किसी का जूता न लगे।
फिर छह घंटे की यात्रा हो, आठ घंटे की या फिर 12 घंटे की, तबला गोद में ही रहता था। ये एक रिश्ता, एक प्यार जो हमने अपने वाद्य को दिया तो उसका सिला हमें वाद्य से मिला। यही रिश्ता वाद्य से बना तो थिरकवा साहब थिरकवा साहब हुए, किशन महाराज, गुदई महाराज ने अपनी खास जगह बनाई।