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...तो ये है 'मनी पावर' के खेल की असली वजह

Wed, 07 Jan 2015 01:27 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 07 Jan 2015 01:27 AM IST
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Use of money in politics.

बसपा जिस मिशन व विचारों से जुड़ी थी, मायावती उसे बेच रही हैं। पार्टी में हर काम पैसा लेकर हो रहा है। चुनाव में टिकट के रेट तय हैं। एमएलए व पूर्व प्रत्याशियों ने मुझसे शिकायत की थी कि टिकट के लिए पैसा मांगा जा रहा है।....जुगुल किशोर (बसपा सांसद, पार्टी द्वारा पद मुक्त करने के बाद)

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जुगुल किशोर फकीर से करोड़पति कैसे बन गए। उन्हें जब पार्टी ने एमएलसी का टिकट दिया था तो वे साइकिल से चलते थे। नामांकन तक के लिए पैसा नहीं था। पार्टी ने पैसा दिया तो नामांकन कर पाए। पूर्वांचल के कई मंडलों में प्रभारी रहने के दौरान उम्मीदवार तय करने में खूब धांधली की। आर्थिक फायदे के लिए एक-एक सीट पर कई बार उम्मीदवार बदले।.....स्वामी प्रसाद मौर्य (राष्ट्रीय महासचिव बसपा, जुगुल किशोर के मायावती पर आरोपों के बाद)
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ये आरोप भले ही किसी वजह से लगाए जा रहे हों लेकिन सियासी साख के लिए बड़ा सवाल बनते जा रहे हैं। सार्वजनिक होते इन आरोपों ने सियासत को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
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सवाल उठ रहे हैं कि नेताओं को टिकट बेचने की याद तब क्यों आती है जब अपने ही टिकट पर या भविष्य पर संकट खड़ा हो जाता है। जो भी हो इन आरोपों-प्रत्यारोपों ने साफ कर दिया है कि तमाम कोशिशों के बावजूद राजनीति में ‘मनी पावर’ का प्रभाव रुक नहीं पा रहा है।

नीतियां नहीं, असल वजह कुछ और...

Use of money in politics.

किसी दल की ताकत घटती है तो पैसे वाले सियासी चेहरे सुरक्षित भविष्य के लिए लेन-देन का आरोप लगाकर अलग हो जाते हैं। कभी पैसा कमाने वाले चेहरों से भविष्य में संकट की आशंका के चलते पार्टी नेतृत्व उनसे दूरी बना लेता है तो कभी भविष्य संकट में पड़ता देख टिकट बेचने की याद आ जाती है।

अभी कुछ दिन पहले ही बसपा से निकाले गए अखिलेश दास की जुबान पर यह सच तब आया जब मायावती ने उनका राज्यसभा का टिकट काट दिया। दरअसल, विधानसभा में बसपा के पास आज इतनी ताकत नहीं बची है कि वह हर आदमी को राज्यसभा में भेजकर उपकृत कर सके।

अपने 80 विधायकों की बदौलत बसपा सिर्फ दो लोगों को राज्यसभा भेज सकती थी। मायावती ने अखिलेश दास के बजाय पार्टी के पुराने व अपने विश्वसनीय लोगों को चुना। स्वार्थ टकराए तो धन के लेनदेन, टिकटों की बिक्री और पार्टी के सिद्धांतों से खिलवाड़ के आरोप उछल गए।

राजनीतिक दल पैसे के आधार पर टिकट देते हैं या नहीं, यह तो जांच का विषय है। पर, इस तरह के आरोपों ने पूरे सियासी जगत को सवालों के कठघरे में जरूर खड़ा कर दिया है। यह भी साफ हो गया कि इसकी वजह नीतियों का नहीं, स्वार्र्थों का टकराव है।

कहीं यह तो नहीं असली वजह

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जहां तक जुगुल किशोर का मामला है तो उन्हें भी अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता कहीं न कहीं सता रही है। सूत्रों की मानें तो उनके दूसरे दलों से तार जोड़ने की भनक मायावती को लग गई। उन्हें लगा कि जुगुल के सहारे विरोधी उन पर कोई बड़ा हमला बोलकर बखेड़ा न खड़ा कर दें इसलिए, उन्होंने उन्हें पदों से हटाकर पेशबंदी कर ली।

जुगुल किशोर हों या अखिलेश दास अथवा इनसे पहले दूसरे लोग, टिकट बेचने और खरीद-फरोख्त के आरोप तभी लगे जब नेता या पार्टी में किसी एक को सुरक्षित भविष्य के लिए विकल्प तलाशना जरूरी दिखने लगा। तब स्वार्थ टकराए।

नए नहीं हैं ये आरोप: 2012 के विधानसभा चुनाव में बादशाह सिंह और बाबू सिंह कुशवाहा को यह सच तब याद आया जब उन्होंने भाजपा का दामन थामा। विभिन्न मामलों में दोनों पर कानून का शिकंजा कसने लगा। बसपा ने अपनी गरदन बचाने के लिए इन दोनों को बाहर का रास्ता दिखाने का मन बना लिया। शाहजहांपुर के अवधेश वर्मा का किस्सा सभी को याद होगा।

बसपा से टिकट कटने पर वह न्यूज चैनलों पर मायावती से रहम की भीख मांग रहे थे। पर, अगले दिन जैसे ही उनका नाम भाजपा प्रत्याशियों की सूची में आया, उनकी बोली बदल गई। मायावती पर पैसा लेकर दूसरे को टिकट देने का आरोप जड़ दिया। श्रावस्ती से भाजपा के मौजूदा सांसद दद्दन मिश्र ने भी 2012 में माया पर इसी तरह के आरोप लगाए थे।

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि इसकी मूल वजह चुनाव में धन का बढ़ता प्रभाव और एक-दूसरे की कमियों के सहारे राजनीति करने की नई परंपरा है। दलों को प्रभावपूर्ण तरीके से चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए। इंतजाम वही लोग करेंगे जिनके पास पैसा है या जो इसकी व्यवस्था कराने का कौशल रखते हैं। इसके लिए ऐसे लोग कभी खुद पद चाहेंगे तो कभी सत्ता से अपने अनुकूल फैसले।

दूसरे दल भी अलग नहीं

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अन्य दलों में भी इस तरह के आरोप तभी सार्वजनिक हुए जब हित प्रभावित हुए। 2012 में ही जब भगवा चोला ओढ़ने वाले बसपा नेता मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगा रहे थे तो देवरिया के भाजपा कार्यकर्ता डब्लू मणि त्रिपाठी और बलिया के अनिल जैसे कइयों ने भाजपा नेतृत्व पर टिकट बेचने का आरोप लगाया था।

रालोद के समरपाल सिंह को सिवालखास से उम्मीदवार बनाने से नाराज कार्यकर्ताओं ने नेतृत्व पर पैसे के लेनदेन का आरोप मढ़ा। लोकसभा चुनाव में भी दूसरे दलों से आए लोगों को टिकट देने पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाए। 2012 में बाराबंकी में कई कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने बेनी वर्मा पर ऐसे ही आरोप लगाए।

लाभ व लोभ के कारण हुआ यह हाल
इस पर दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के  राजनीतिशास्‍त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी कहते हैं कि प्रतिबद्धता पर तात्कालिक लाभ की आकांक्षा और स्वार्थ भारी पड़ने के कारण नेता और कार्यकर्ता दोनों बदले हैं। नेता अपने दल की साख की पूरी कीमत वसूलना चाहता है तो कार्यकर्ता अपनी मेहनत की पूरी कीमत।

जो लोग जीत जाते हैं या जिनकी पार्टी सत्ता में होती है, उन्हें यह कीमत मंत्री के रूप में चाहिए होती है। जो नहीं जीत पाते वे भी सत्ता का लाभ उठाना चाहते हैं। जो पार्टी सत्ता में नहीं आती उसके लोग आगे का गुणाभाग करने लगते हैं। कुल मिलाकर सुविधा की राजनीति ने ही यह स्थिति बनाई है। लगाव सिद्धांतों से नहीं, सत्ता से हो गया है।

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