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जो सीमेंट में पौधे रोपेगा, उसे प्लास्टिक के फूल ही मिलेंगे, मुहावरों से व्यंग्य को रोचक बनाते थे उर्मिल थपलियाल
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अभिषेक सहज
लखनऊ। उर्मिल थपलियाल का जाना व्यंग्य, रंगमंच और नौटंकी की दुनिया में एक साथ ऐसा खालीपन आ जाना है जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती है। व्यंग्य को मुहावरों की भाषा में पिरोकर पाठकों को चमत्कृत कर देने में वे माहिर थे। वहीं दूसरी ओर वे नौटंकी केसैद्धांतिक और प्रस्तुति पक्ष दोनों ही विधाओं में सिद्धहस्त थे।
संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और यश भारती जैसे पुरस्कारों से नवाजे जा चुके उर्मिल थपलियाल ने नौटंकी विधा को जो रंग दिया, वह अद्भुत था जिस पर कोई भी दूसरा रंग चढ़ना मुश्किल होगा। सप्ताह की नौटंकी हो या फिर नक्कारखाना, दोनों ही जगह उनके लेखन के पाठक मुरीद रहे हैं। रंगमंच को अपने लेखन और निर्देशन दोनों से समृद्ध करने वाले उर्मिल जी ने व्यंग्य की अपनी अलग शैली विकसित की थी। पद्मश्री केपी सक्सेना के जाने बाद लखनऊ में व्यंग्य लेखन में जो रिक्तता आई थी, उसकी काफी हद तक पूर्ति उर्मिल जी ही करते रहे। उनकेव्यंग्य की खासियत उसमें पिरोए गए मुहावरे होते थे। मसलन, ’अब जो सीमेंट में पौधे रोपेगा, उसे प्लास्टिक केफूल ही तो मिलेंगे’ या फिर कानून व्यवस्था पर व्यंग्य की बात आती है तो उनकी लेखनी कहती है कि ’कानून केहाथ लंबे हों, यह तो ठीक है, मगर लोग-बाग यह भी चाहते हैं कि उसकी पकड़ कमजोर हो’। उनकी लेखनी का एक और उदाहरण देखिए कि ’सरकार तो एक ऐसी हथिनी है जो जनता रूपी चिड़िया केबच्चे केऊपर इसलिए बैठती है, ताकि बच्चे को गरमाहट मिलती रहे।’ कई बार उनकी लेखन शैली पढ़ने वाले को न सिर्फ हंसाती थी बल्कि गंभीर चिंतन पर भी मजबूर करती थी। एक जगह उन्होंने लिखा कि ’अगर आपका घर नरक है, तो समझ लीजिए कि स्वर्ग आपके पड़ोस में है।’
व्यंग्य तो नेताओं के वादों की तरह नश्वर है
उर्मिल थपलियाल एक जगह लिखते हैं कि ’व्यंग्य तो जीवन की तरह क्षणभंगुर और नेताओं के वादों की तरह नश्वर है।’ वे कहते हैं कि ’जिस सर्कस में जोकर न हो, वह नहीं चलता।’ वहीं एक व्यंग्य में वे कहते हैं कि ’हर अकबर को एक अदद बीरबल तो चाहिए ही’ या फिर ’व्यंग्य तो साहित्य की लटकन है।’ उनका कहना था कि ’सभी व्यंग्य लेखक चाहते हैं कि लोग उन्हें गंभीरता से लें। सच तो यह भी है कि जैसे बीरबल कभी बादशाह नहीं हो सकता, वैसे ही व्यंग्य भी कभी विज्ञापन नहीं हो सकता’
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उर्मिल जी के व्यंग्य का मुरीद था : पंकज प्रसून
राजधानी के हास्य-व्यंग्य कवि पंकज प्रसून कहते हैं कि मैं बचपन से ही उर्मिल जी को पढ़ता आया हूं और उनकेव्यंग्य का मैं हमेशा से मुरीद रहा हूं। पंकज प्रसून बताते हैं कि उर्मिल जी को 2013 में अट्टहास शिखर सम्मान से नवाजा गया था। इसके एक दिन बाद एक गोष्ठी में उन्होंने मजे लेते हुए कहा था कि विद्वान बड़ी देर तक चुप रहे तो मूर्ख लगता है और इसी तरह अगर मूर्ख बड़ी देर तक चुप रहे तो उसे लोग विद्वान समझने लगते हैं। प्रसून कहते हैं कि उर्मिल थपलियाल जी केनाटक तो तमाम मिल जाएंगे लेकिन व्यंग्य की उनकी कोई मुकम्मल किताब नहीं आ सकी।
लखनऊ के इस हीरे की भरपाई मुश्किल : राजेश अरोरा ’शलभ’
हास्य-व्यंग्य कवि राजेश अरोरा ’शलभ’ ने कहा कि लखनऊ का नायाब हीरा थे उर्मिल थपलियाल जिनकी भरपाई मुश्किल है। वे दर्पण संस्था केअटूट स्तंभ थे जहां उन्होंने बहुत सारे नाटकों का निर्देशन किया।
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लखनऊ। उर्मिल थपलियाल का जाना व्यंग्य, रंगमंच और नौटंकी की दुनिया में एक साथ ऐसा खालीपन आ जाना है जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती है। व्यंग्य को मुहावरों की भाषा में पिरोकर पाठकों को चमत्कृत कर देने में वे माहिर थे। वहीं दूसरी ओर वे नौटंकी केसैद्धांतिक और प्रस्तुति पक्ष दोनों ही विधाओं में सिद्धहस्त थे।
संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और यश भारती जैसे पुरस्कारों से नवाजे जा चुके उर्मिल थपलियाल ने नौटंकी विधा को जो रंग दिया, वह अद्भुत था जिस पर कोई भी दूसरा रंग चढ़ना मुश्किल होगा। सप्ताह की नौटंकी हो या फिर नक्कारखाना, दोनों ही जगह उनके लेखन के पाठक मुरीद रहे हैं। रंगमंच को अपने लेखन और निर्देशन दोनों से समृद्ध करने वाले उर्मिल जी ने व्यंग्य की अपनी अलग शैली विकसित की थी। पद्मश्री केपी सक्सेना के जाने बाद लखनऊ में व्यंग्य लेखन में जो रिक्तता आई थी, उसकी काफी हद तक पूर्ति उर्मिल जी ही करते रहे। उनकेव्यंग्य की खासियत उसमें पिरोए गए मुहावरे होते थे। मसलन, ’अब जो सीमेंट में पौधे रोपेगा, उसे प्लास्टिक केफूल ही तो मिलेंगे’ या फिर कानून व्यवस्था पर व्यंग्य की बात आती है तो उनकी लेखनी कहती है कि ’कानून केहाथ लंबे हों, यह तो ठीक है, मगर लोग-बाग यह भी चाहते हैं कि उसकी पकड़ कमजोर हो’। उनकी लेखनी का एक और उदाहरण देखिए कि ’सरकार तो एक ऐसी हथिनी है जो जनता रूपी चिड़िया केबच्चे केऊपर इसलिए बैठती है, ताकि बच्चे को गरमाहट मिलती रहे।’ कई बार उनकी लेखन शैली पढ़ने वाले को न सिर्फ हंसाती थी बल्कि गंभीर चिंतन पर भी मजबूर करती थी। एक जगह उन्होंने लिखा कि ’अगर आपका घर नरक है, तो समझ लीजिए कि स्वर्ग आपके पड़ोस में है।’
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व्यंग्य तो नेताओं के वादों की तरह नश्वर है
उर्मिल थपलियाल एक जगह लिखते हैं कि ’व्यंग्य तो जीवन की तरह क्षणभंगुर और नेताओं के वादों की तरह नश्वर है।’ वे कहते हैं कि ’जिस सर्कस में जोकर न हो, वह नहीं चलता।’ वहीं एक व्यंग्य में वे कहते हैं कि ’हर अकबर को एक अदद बीरबल तो चाहिए ही’ या फिर ’व्यंग्य तो साहित्य की लटकन है।’ उनका कहना था कि ’सभी व्यंग्य लेखक चाहते हैं कि लोग उन्हें गंभीरता से लें। सच तो यह भी है कि जैसे बीरबल कभी बादशाह नहीं हो सकता, वैसे ही व्यंग्य भी कभी विज्ञापन नहीं हो सकता’
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उर्मिल जी के व्यंग्य का मुरीद था : पंकज प्रसून
राजधानी के हास्य-व्यंग्य कवि पंकज प्रसून कहते हैं कि मैं बचपन से ही उर्मिल जी को पढ़ता आया हूं और उनकेव्यंग्य का मैं हमेशा से मुरीद रहा हूं। पंकज प्रसून बताते हैं कि उर्मिल जी को 2013 में अट्टहास शिखर सम्मान से नवाजा गया था। इसके एक दिन बाद एक गोष्ठी में उन्होंने मजे लेते हुए कहा था कि विद्वान बड़ी देर तक चुप रहे तो मूर्ख लगता है और इसी तरह अगर मूर्ख बड़ी देर तक चुप रहे तो उसे लोग विद्वान समझने लगते हैं। प्रसून कहते हैं कि उर्मिल थपलियाल जी केनाटक तो तमाम मिल जाएंगे लेकिन व्यंग्य की उनकी कोई मुकम्मल किताब नहीं आ सकी।
लखनऊ के इस हीरे की भरपाई मुश्किल : राजेश अरोरा ’शलभ’
हास्य-व्यंग्य कवि राजेश अरोरा ’शलभ’ ने कहा कि लखनऊ का नायाब हीरा थे उर्मिल थपलियाल जिनकी भरपाई मुश्किल है। वे दर्पण संस्था केअटूट स्तंभ थे जहां उन्होंने बहुत सारे नाटकों का निर्देशन किया।