{"_id":"67a910b85cc09df88a019108","slug":"urdu-is-the-pride-of-lovers-lucknow-news-c-13-lko1070-1070607-2025-02-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Lucknow News: इश्क वालों की शान है उर्दू...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Lucknow News: इश्क वालों की शान है उर्दू...
विज्ञापन
मुशायरे में पाठ करते कवि।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लखनऊ। मशहूर शायर मरहूम मुनव्वर राना की याद में गांधी भवन में रविवार को कवि सम्मेलन व मुशायरे का आयोजन किया गया। शायरों ने अपने कलाम से महफिल को रोशन किया। वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रताप सिंह को मुनव्वर राना मेमोरियल अवॉर्ड, मलिकजादा परवेज को मलिकजादा मंजूर अहमद अवॉर्ड और नाजिया को नसीम निखत अवॉर्ड से नवाजा गया।
इस मौके पर मशहूर शायरा शबीना अदीब ने सुनाया- बुझाना चाहते हो तो बुझा डालो हवा बनकर, मोहब्बत के चरागों को जलाना हमको आता है। शायर मनीष शुक्ला ने उर्दू ज़बान पर शेर पढ़े। उन्होंने सुनाया- थोड़ी मुश्किल ज़बान है उर्दू, सीधा सादा बयान है उर्दू... सारी दुनिया मुरीद है इसकी, इश्क वालों की शान है उर्दू। इकबाल अशहर ने सुनाया- याद आता है कि मैं खुद से यहीं बिछड़ा था, यही रास्ता है तेरे शहर को जाने वाला। मंजर भोपाली ने सुनाया- बहुत खराब है माहौल इस जमाने का, निकलना घर से तो मां बाप की दुआ लेकर। डॉ. तारिक कमर ने पढ़ा- जिंदगी में बबूल रखे गए, और तुर्बत पे फूल रखे गए। मलिकजादा जावेद ने सुनाया- अपने बच्चों पे क्यूं करूं गुस्सा, हर कमी उनमें खानदानी है।
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने सुनाया- शिशु लोरी के शब्द नहीं संगीत समझता है, बाद में सीखेगा भाषा अभी वह अर्थ समझता है। शकील आजमी ने सुनाया- जब भी मिलते हो मुस्कुराते हो, इतनी खुशियां कहां से लाते हो। कवि संपत सरल ने सुनाया- अच्छे दिन चल रहे हैं, संन्यासी व्यापार कर रहे हैं। रामप्रकाश बेखुद और कासिफ फारूकी ने भी अपने कलाम से महफिल में चार चांद लगाए। सदारत ब्रिगेडियर अहमद अली ने और निजामत अबरार काशिफ ने की। आयोजक मोईद अहमद और आनंद वर्धन सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
इस मौके पर मशहूर शायरा शबीना अदीब ने सुनाया- बुझाना चाहते हो तो बुझा डालो हवा बनकर, मोहब्बत के चरागों को जलाना हमको आता है। शायर मनीष शुक्ला ने उर्दू ज़बान पर शेर पढ़े। उन्होंने सुनाया- थोड़ी मुश्किल ज़बान है उर्दू, सीधा सादा बयान है उर्दू... सारी दुनिया मुरीद है इसकी, इश्क वालों की शान है उर्दू। इकबाल अशहर ने सुनाया- याद आता है कि मैं खुद से यहीं बिछड़ा था, यही रास्ता है तेरे शहर को जाने वाला। मंजर भोपाली ने सुनाया- बहुत खराब है माहौल इस जमाने का, निकलना घर से तो मां बाप की दुआ लेकर। डॉ. तारिक कमर ने पढ़ा- जिंदगी में बबूल रखे गए, और तुर्बत पे फूल रखे गए। मलिकजादा जावेद ने सुनाया- अपने बच्चों पे क्यूं करूं गुस्सा, हर कमी उनमें खानदानी है।
विज्ञापन
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने सुनाया- शिशु लोरी के शब्द नहीं संगीत समझता है, बाद में सीखेगा भाषा अभी वह अर्थ समझता है। शकील आजमी ने सुनाया- जब भी मिलते हो मुस्कुराते हो, इतनी खुशियां कहां से लाते हो। कवि संपत सरल ने सुनाया- अच्छे दिन चल रहे हैं, संन्यासी व्यापार कर रहे हैं। रामप्रकाश बेखुद और कासिफ फारूकी ने भी अपने कलाम से महफिल में चार चांद लगाए। सदारत ब्रिगेडियर अहमद अली ने और निजामत अबरार काशिफ ने की। आयोजक मोईद अहमद और आनंद वर्धन सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया।
विज्ञापन