यूपी : बुन रहे सियासी तानाबाना, अखिलेश और मायावती साध रहे एक दूसरे पर निशाना
बसपा और सपा दोनों ही अब लोकसभा चुनाव 2024 पर फोकस कर रहे हैं। मायावती दलित मुस्लिम समीकरण के साथ फिर से उम्मीदवार आधारित जाति को जोड़कर सोशल इंजीनियरिंग करना चाहती हैं। उधर अखिलेश अपने गठबंधन के दम पर ही अभी आगे बढ़ने की तैयारी में हैं।
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विधानसभा चुनाव में यूपी की सत्ता से दूर ही रह गई समाजवादी पार्टी और बुरी तरह से पस्त हुई बसपा के रणनीतिकारों ने एक बार फिर से सियासी तानाबाना बुनना शुरू कर दिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक दूसरे के खिलाफ जैसे मोर्चा खोल दिया है। मायावती तीखे अंदाज में वार कर रही हैं लेकिन जुबानी गुगली फेंकने से अखिलेश भी पीछे नहीं हैं।
अखिलेश यादव के मायावती को राष्ट्रपति बनाने केबयान पर मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कहा कि वह सीएम, पीएम तो बन सकती हैं पर राष्ट्रपति नहीं। ऐसा कहकर मायावती ने स्पष्ट कर दिया कि वह यूपी का रण छोड़ने वाली नहीं हैं। उन्हाेंने अखिलेश को यह भी कहा कि वे ऐसी बचकानी बात और अफवाह फैलाना बंद करें।
उधर तत्काल अखिलेश ने इस पर फिर से प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी। कहा कि वे तो चाहते थे कि बसपा से गठबंधन बना रहे। इशारा किया कि इससे आगे चलकर मायावती का पीएम बनने का सपना भी पूरा हो सकता था पर इस पर मायावती ने फिर से पलटवार करते हुए उन्हें लोकसभा चुनाव 2019 की याद दिला दी। कहा कि गठबंधन करने के बाद सपा को बस पांच सीटें मिली थीं। विदित हो कि इस चुनाव में बसपा ने दस सीटें जीती थीं। हालांकि विधानसभा चुनाव में बसपा का बुरा हाल हो गया। वह बस एक ही सीट जीत पाई जबकि सपा सवा सौ का आंकड़ा छू गई।
नहीं चल पाई थी बसपा की सोशल इंजीनियरिंग
विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक 87 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। उसके बाद कांग्रेस ने 75 और सपा ने 64 उम्मीदवार उतारे थे। इनमे सें कुल 34 मुस्लिम विधायक जीते हैं जो पिछली बार की संख्या से नौ ज्यादा है। इनमें से 31 समाजवादी पार्टी के हैं। बाकी तीन में दो सहयोगी रालोद और एक विधायक सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के हैं। मायावती का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीत पाया क्योंकि अधिकतर मुस्लिमों का वोट सपा को गया। इस चुनाव में बसपा को 12.9 प्रतिशत वोट मिले। बसपा थिंक टैंक का मानना है कि ये सारे वोट दलितों के ही हैं। यदि मुस्लिम इनमें जुड़ जाते तो स्थिति अलग हो सकती थी। सपा को इस चुनाव में 32.5 जबकि भाजपा को 41.3 प्रतिशत वोट मिले हैं।
मायावती का गणित, बस मुस्लिम साथ आ जाएं
हालांकि मायावती ने कहा है कि सभी समाज के लोग यदि बसपा के साथ आ जाएं तो उन्हें सीएम बनने से कोई नहीं रोक सकता पर वास्तव में बसपा की निगाह मुस्लिमों पर है। दरअसल मुस्लिमों ने सपा को इस चुनाव में एकतरफा वोट दिया। यादव भी साथ आए पर बहुमत से सपा काफी दूर रह गई। मायावती बार बार इसी को अपने बयान में दोहरा रही हैं। वह मुसलमानों को यह समझाना चाह रही हैं कि जब तक मुस्लिमों के साथ बड़ा वोट बैंक नहीं आएगा तब तक भाजपा की राह रुकने वाली नहीं है। यह बड़ा वोट बैंक दलितों के रूप में मायावती केपास है। बस अब लगातार मायावती इस पर फोकस कर रही हैं। जिस तरह से आजम खां की सपा से नाराजगी चल रही है उससे भी बसपा थिंक टैंक को यह लग रहा है कि मुस्लिम अपने इरादे बदलकर बसपा के साथ आ सकते हैं। उन्हें यह बात बस समझानी होगी।
अखिलेश भांप रहे आगे का रुख
भले ही अखिलेश मायावती की तरह तीखे अंदाज में बसपा पर हमला न बोल रहे हो पर वह इससे आगे का रुख भांपकर बयान जारी कर रहे हैं। दरअसल इस समय अखिलेश पार्टी में ही चल रही उठापटक में उलझे हैं। आजम खां की नाराजगी जाहिर हो चुकी है तो चाचा शिवपाल यादव से तकरार आम हो चुकी है। ऐसे में अखिलेश भी खास तौर पर मुस्लिमों को पार्टी से जोड़कर रखना चाहते हैं। साथ ही वह इस कलह को भी समाप्त करना चाहते हैं। डर यह है कि कहीं आजम खां ने सपा का दामन छोड़ दिया क्या होगा? इससे कहीं बड़ा नुकसान न हो जाए।
2024 लोकसभा चुनाव की है तैयारी
दरअसल बसपा और सपा दोनों ही अब लोकसभा चुनाव 2024 पर फोकस कर रहे हैं। मायावती दलित मुस्लिम समीकरण के साथ फिर से उम्मीदवार आधारित जाति को जोड़कर सोशल इंजीनियरिंग करना चाहती हैं। उधर अखिलेश अपने गठबंधन के दम पर ही अभी आगे बढ़ने की तैयारी में हैं।