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UP News : केंद्र से पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश कर चुकी है राज्य सरकार
Sat, 24 Sep 2022 12:21 AM IST
पंकज श्रीवास्तव
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Sat, 24 Sep 2022 12:21 AM IST
सार
खुफिया एजेंसियों की मानें तो यूपी में यह संगठन बीते चार-पांच वर्षों से अपना नेटवर्क फैलाने की कोशिश कर रहा है। 2019 व 2020 में पीएफआई के खिलाफ चले अभियान में इसके सक्रिय सदस्यों के खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद इससे जुड़ने से लोग बचने लगे।
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- फोटो : s
विस्तार
देश भर में पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से जुड़े लोगों की धरपकड़ और कार्रवाई के बाद यह संगठन एक बार फिर सुर्खियों में है। प्रदेश में पीएफआई की सक्रियता की जानकारी पहली बार दिसंबर 2019 में सीएए-एनआरसी के विरोध में हुए प्रदर्शन और हिंसा के दौरान मिली थी। प्रदेश में हुए हिंसक प्रदर्शनों में पीएफआई की भूमिका को देखते हुए प्रदेश सरकार की ओर से इस संगठन पर पाबंदी लगाए जाने का प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को भेजा गया था। पुलिस की ओर से पीएफआई के खिलाफ प्रदेश भर में अभियान चलाया गया था और सवा सौ से अधिक सक्रिय सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था।
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दरअसल पीएफआई खुद को न्याय, आजादी और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। इस संगठन की कई अलग-अलग शाखाएं भी हैं। महिलाओं के लिए नेशनल वीमेंस फ्रंट, छात्रों व युवाओं के लिए कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया जैसे संगठन भी इसी का हिस्सा हैं। खुफिया एजेंसियों की मानें तो यूपी में यह संगठन बीते चार-पांच वर्षों से अपना नेटवर्क फैलाने की कोशिश कर रहा है। 2019 व 2020 में पीएफआई के खिलाफ चले अभियान में इसके सक्रिय सदस्यों के खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद इससे जुड़ने से लोग बचने लगे।
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नागरिकता कानून 2019 के विरोध में लखनऊ समेत पूर्वी से लेकर पश्चिमी यूपी तक इस संगठन की सक्रियता देखने को मिली थी। जिसके बाद पीएफआई के सदस्यों की धरपकड़ के लिए अभियान चलाया गया था। 2019 में लखनऊ में हुई हिंसा में पीएफआई के प्रदेश प्रमुख वसीम अहमद, सक्रिय सदस्य नदीम व अशफाक को गिरफ्तार किया था। अब सुरक्षा एजेंसियां प्रदेश में पीएफआई का नेटवर्क पूरी तरह से खत्म करने की मुहिम में जुटी हैं।
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