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यूपी एमएलसी चुनाव: लचर प्रबंधन व भितरघात से लखनऊ-वाराणसी में हारी भाजपा, कार्यकर्ताओं की रही उपेक्षा
Fri, 30 Oct 2026 06:51 AM IST
रोहित मिश्र
सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला लखनऊ
सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला लखनऊ
Published by: रोहित मिश्र
Updated Fri, 30 Oct 2026 06:51 AM IST
सार
UP MLC elections: इस परिणाम के बाद पार्टी में जमीनी और कॉडर के कार्यकर्ताओं के बीच समीक्षा का दौर भी शुरू हो गया है। कहा जा रहा है कि प्रत्याशी खुद के बजाय पार्टी संगठन के भरोसे चुनाव जीतने का सपना देख रहे थे।
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चुनाव परिणाम को लेकर होगी भाजपा में समीक्षा।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
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शिक्षक-स्नातक विधान परिषद चुनाव में छह सीटें जीतकर भाजपा ने भले ही पिछली बार का आंकड़ा छू लिया हो, लेकिन लखनऊ और वाराणसी में मिली हार ने संगठन के चुनाव प्रबंधन और जमीनी पकड़ पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दो से तीन सीटों पर प्रत्याशियों के कमजोर प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और संभावित भितरघात को हार की वजह माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले आए इन नतीजों ने प्रदेश नेतृत्व को संगठन की वास्तविक स्थिति पर नए सिरे से विचार करने का संकेत दिया है।
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शिक्षक-स्नातक चुनाव के नतीजों का असर सरकार की स्थिरता पर नहीं पड़ने वाला है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और राजधानी से जुड़े क्षेत्र में पार्टी के मौजूदा विधान परिषद सदस्य की हार संगठन की ताकत की जमीनी पड़ताल पर जोर दे रही है।
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पार्टी में जमीनी और कॉडर के कार्यकर्ताओं के बीच समीक्षा का दौर भी शुरू हो गया है। कहा जा रहा है कि प्रत्याशी खुद के बजाय पार्टी संगठन के भरोसे चुनाव जीतने का सपना देख रहे थे। वहीं, मतदाता सूची में नाम शामिल कराने को लेकर न तो प्रत्याशियों ने दिलचस्पी दिखाई और न ही संगठन ने ही प्रयास किया।
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दो प्रमुख जगहों पर पराजय को इस बात का भी संकेत माना जा रहा है कि जमीन पर संगठन उतना मजबूत नहीं है जितना कागजों में दिख रहा है। प्रदेश नेतृत्व व पदाधिकारियों का दावों के मुताबिक न तो आम कार्यकर्ताओं से संवाद है और न उन्होंने चुनाव की तैयारियों पर ध्यान दिया। तभी तो अब पार्टी के ही समर्थक वर्गों में कई लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने का प्रयास न करने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह कई गैर राजनीतिक चेहरों को अपना या किसी खास का प्रिय होने के कारण संगठन में स्थान दिया गया है उसके कारण कार्यकर्ताओं में निराशा आई है। उन्हें लगता है कि शीर्ष नेतृत्व दावे चाहे जो कर रहा हो, लेकिन कम से कम उत्तर प्रदेश में संगठन के कर्ता-धर्ता परिश्रम के आधार पर किसी कार्यकर्ता को कुछ नहीं देने वाले।
शीर्ष नेतृत्व को यह सोचना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में पार्टी की पराजय को विपक्ष आने वाले चुनाव में हथियार बनाएगा। अयोध्या की तरह यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश करेगा कि मोदी और भाजपा अजेय नहीं हैं। इसके पक्ष में वह लोकसभा चुनाव में 2019 के मुकाबले जीत के अंतर में आई कमी को भी एक आधार बनाएगा। नतीजों ने बता दिया है कि 2027 के चुनावी समर में भाजपा की जीत के लिए न सिर्फ बूथों की जिम्मेदारी संभाल रहे कार्यकर्ताओं से संवाद और संपर्क कर उनका मनोबल बढ़ाना होगा, बल्कि उनके आक्रोश को समझने का प्रयास करना होगा। पन्ना प्रमुख, बूथ प्रमुख और प्रदेश पदाधिकारियों की भूमिकाओं की कड़ी समीक्षा भी करनी होगी।