मर्यादा से बंधा न होता तो मैं भी बोलता : राज्यपाल
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राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि वे यदि मर्यादा से बंधे न होते तो वे भी बोलते। उन्होंने कहा, मेरा पद ऐसा है कि जिस तरह का भाषण मंच पर बैठे लोगों ने दिया है, वैसी आजादी मुझे नहीं है। मैं राज्यपाल हूं और इस पद की मर्यादा होती है।
इसलिए मैं इतने खुले ढंग से बोल नहीं सकता। मैं यदि खुलकर बोला तो आपमें से किसी का भी भाषण कल नहीं छपेगा। इसलिए मैं थोड़ा असमंजस में हूं, लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी रास्ता निकाला जा सकता है।
राज्यपाल रविवार को यहां विश्वेश्वरैया प्रेक्षागृह में लोकनायक जयप्रकाश नारायण सेवा समिति की ओर से आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे। इससे पहले वक्ताओं ने सांसदों, विधायकों व बड़े नेताओं को दलाल तक कहा। सांसद व विधायक निधि में खुलेआम कमीशनबाजी की बात कही। बारी जब राज्यपाल की आई तो उन्होंने इशारों में अपनी बात कही।
सांसद निधि एवं विधायक निधि को लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों पर राज्यपाल ने कहा कि जनता को जनप्रतिनिधियों से पाई-पाई का हिसाब लेने का अधिकार है। जागृत जनमत के दबाव एवं पारदर्शिता से भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकता है।
जनता के पैसों से लगाई जाए महापुरूषों की प्रतिमाएं
राज्यपाल ने कहा कि लखनऊ में अनेक महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित हैं, लेकिन संपूर्ण क्रांति के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश की मूर्ति नहीं है। इसलिए उनकी मूर्ति भी लगाई जानी चाहिए। यह मूर्ति सरकार के बजाय जनता के पैसों से लगवाई जाए। मैं भी इसमें सहयोग दूंगा।
जेपी के विचारों से मिलती है ऊर्जा
राज्यपाल ने कहा कि जेपी के विचारों से ऊर्जा प्राप्त होती है। जातीयता, भ्रष्टाचार तथा असमानता को दूर करने में उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनमें अद्भुत संगठनात्मक शक्ति थी। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन तथा आपातकाल में अहम भूमिका निभाई।
जेपी से थे मेरे पुराने संबंध
राज्यपाल ने जेपी से अपने पुराने संबंधों को याद करते हुए बताया कि आपातकाल में भी उनसे बराबर विचार-विमर्श होता था। कई कार्यक्रमों में उनके साथ मंच भी साझा किया। वे विरोधी संगठनों तथा छोटे कार्यकर्ताओं की बात समझकर काम करते थे।