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यूपी: अखिलेश के साथ जोड़ा आंबेडकर का चेहरा, होर्डिंग के पीछे दिख रही है सपा की ये रणनीति; दलित वोटों पर नजर

Mon, 28 Apr 2025 08:36 PM IST
रोहित मिश्र अजीत बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
अजीत बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Mon, 28 Apr 2025 08:36 PM IST
सार

Dalit politics in UP: लखनऊ के सपा मुख्यालय के बाहर लगा एक पोस्टर आज चर्चाओं में रहा। राजधानी में लगा यह होर्डिंग सपा के सम-सामायिक दांव-पेच समझने और समझाने के लिए काफी है। 

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UP: Ambedkar's face added with Akhilesh, this is SP's strategy behind the hoardings; this is the plan to woo D
सपा कार्यालय के बाहर यह होर्डिंग रहा चर्चाओं में। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

 डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ अखिलेश यादव का चेहरा। राजधानी में लगा यह होर्डिंग सपा के सम-सामायिक दांव-पेच समझने और समझाने के लिए काफी है। यह कि उसकी राजनीतिक चाल की दिशा क्या है। और, यह भी कि अबू आसिम आजमी के मुद्दे पर एक तरह की रणनीतिक चुप्पी साध लेने वाला सपा नेतृत्व रामजी लाल सुमन पर इतना मुखर क्यों है?

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याद होगा कि महाराष्ट्र के सपा अध्यक्ष अबू आसिम आजमी के औरंगजेब को लेकर दिए गए बयान पर भाजपा ने काफी तूल दिया था। खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि उसे यूपी भेजो, सबक हम सिखा देंगे। लेकिन, सपा ने पूरे प्रकरण को कोई खास तूल नहीं दिया। कुछ ही दिनों में मुद्दे की गर्माहट शांत हो गई। वजह, सपा ऐसे किसी मुद्दे की पिच पर नहीं खेलना चाहती, जिससे हिंदू-मुस्लिम के आधार पर चुनावी बंटवारा हो। पिछले कई चुनाव बताते हैं कि ऐसा होने पर यूपी में सपा के हाथ पराजय ही लगेगी।
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सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने राणा सांगा को लेकर सदन में जो कुछ बोला, उस पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आधिकारिक रूप से सिर्फ इतना ही कहा है कि अब वो बयान राज्यसभा की कार्रवाई का हिस्सा नहीं रहा। इतिहास को इतिहास ही रहने दिया जाए तो बेहतर है। वहीं, रामजी लाल सुमन का विरोध कर रही करणी सेना पर अखिलेश न सिर्फ लगातार हमलावर हैं, बल्कि उसे सीएम योगी और पुलिस महानिदेशक का समर्थन भी बता रहे हैं।

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सोची समझी रणनीति का हिस्सा

करणी सेना को लेकर यूपी के मुख्य विपक्षी दल का रुख उसकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। समाजवादी सार्वजनिक रूप से भले ही यह स्वीकार न करें कि अखिलेश सरकार के जाने में आमजन के बीच पैदा हुई उस धारणा का बड़ा हाथ था कि तत्कालीन सपा सरकार खास जाति और धर्म के लोगों को तरजीह देती है। पर, हार के आत्म विश्लेषण में इसे बखूबी स्वीकार करते हैं। समाजवादियों का मानना है कि करणी सेना के रूप में वैसा ही हथियार अब सत्ता पक्ष ने भी उन्हें मुहैया करा दिया है। वे आमजन के बीच इस बात को प्रमुखता से उठा रहे हैं कि आखिर करणी सेना के लोगों को फंडिंग कहां से हो रही है। उनकी पूरी कोशिश है कि करणी सेना के बहाने वे जाति विशेष बनाम पीडीए (पिछड़े, दलित व अल्पसंख्यक) के मुद्दे को हवा दे सकें।

जाटव वोटबैंक पर भी नजर

रामजी लाल सुमन जाटव बिरादरी से हैं, यह जाति अब भी बसपा का मजबूत जनाधार मानी जाती है। इसके लिए डॉ. आंबेडकर ईश्वर से कम नहीं हैं। इस पूरे संघर्ष के जरिये सपा की नजर मायावती के बचे वोटबैंक पर भी है। एक-दूसरे में समाया हुआ डॉ. आंबेडकर और अखिलेश का चित्र सपा की यही रणनीति स्पष्ट कर रहा है। लोकसभा चुनाव के परिणाम इस रणनीति की झलक दे चुके हैं। अब यह तो सत्ताधारी भाजपा को देखना है कि वो करणी सेना और रामजीलाल सुमन के मामले को कैसे हैंडल करती है और सपा के इस प्रयोग का क्या जवाब ढूंढती है।
 

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