सियासी फुटबॉल बना गांव का विकास, ये है मेगा योजनाओं की हकीकत
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उजरवारा में नहीं उजियारा
वित्तीय वर्ष 2016-17 में बाराबंकी जिले के फतेहपुर ब्लॉक के उजरवारा गांव का चयन जनेश्वर मिश्र ग्राम योजना में हुआ था, पर हालात नहीं बदले। मंडी परिषद से कई लाख रुपये की लागत से बनवाए गए सीसी रोड का काम सरकार बदलने के साथ रुक गया है। गांव में लगाई गई सोलर लाइटें गायब हो गई हैं। जगह-जगह गंदगी का अंबार है।
लोहिया ग्राम का सच, पोखन्नी की सड़कें पस्त
बाराबंकी के ही निंदूरा ब्लॉक के लोहिया ग्राम पोखन्नी में मजरों को जोड़ने वाले मार्ग आज भी जर्जर हैं, जबकि तत्कालीन प्रमुख सचिव सिंचाई सुरेश चंद्रा ने खुद वहां भ्रमण कर मजरों को मानक के अनुसार मार्ग बनाकर जोड़ने को कहा था। शौचालयों की स्थिति भी बहुत खराब है।
बजबजाती नालियां सरकारी मशीनरी के कामकाज की पोल खोल रही हैं। सीसी रोड का निर्माण भी नहीं हो पाया है।
बाराबंकी जिले के सिर्फ यही दो गांव नहीं, बल्कि हर जिले में कई गांवों की यही तस्वीर है। अलग-अलग योजनाओं में इन गांवों का चयन हुआ है, पर इनका विकास सियासी फुटबॉल बनकर रह गया। राजनीतिक दल इन योजनाओं की आड़ में बस वोट का खेल खेलते रहे।
किसी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर योजना शुरू करके यह जताने की कोशिश की कि उसे अमुक वर्ग की कितनी चिंता है तो किसी ने राम मनोहर लोहिया व जनेश्वर मिश्र के नाम पर गांव के विकास की योजना शुरू कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि उसे पहले वाली सरकार से ज्यादा अपने सरोकारों की चिंता है, पर योजनाओं के नाम ही चर्चा में रहे।
साफ है कि सांसद आदर्श ग्राम योजना ही सियासी खींचतान में नहीं उलझी है, बल्कि पहले भी कई योजनाएं इसी खींचतान का शिकार बन चुकी हैं। राजनेता भले ही विकास के नाम पर सियासत चमका रहे हों लेकिन गांवों का चमकना तो दूर, उल्टे आबादी बढ़ने और जीवन शैली बदलने से वहां के हालात पहले से भी बदतर हो गए हैं। यही वजह है कि अब तक अलग-अलग योजना में प्रदेश के लगभग 50 हजार गांव चयनित हो चुके हैं, फिर भी इन गांवों की तस्वीर नहीं बदल पाई है।
ऐसे हुई गांवों के लिए अलग योजनाओं की शुरूआत
1991 में डॉ. भीमराव अंबेडकर के शताब्दी वर्ष पर ‘डॉ. अंबेडकर ग्राम विकास योजना’ नाम से प्रदेश में पहली बार गांव के विकास की खातिर अलग से योजना की शुरुआत हुई। तत्कालीन सरकार ने कहा कि हर वर्ष कुछ गांवों को इस योजना के तहत चयन करके उन्हें स्वच्छ, सुविधायुक्त और साक्षर बनाया जाएगा।
गांव का विकास ऐसा होगा कि बाहर से आने वालों को भी लगे कि गांवों की शक्ल-सूरत बदल रही है, पर बीते 26 वर्षों में गांवों के विकास का सपना सियासत के भंवर से बाहर नहीं निकल पाया है।
सियासी खींचतान व विवाद से पीछे रह रहे हैं गांव
जैसा कि अंबेडकर ग्राम विकास योजना से ही स्पष्ट है कि इसे शुरू करने के पीछे मकसद यह था कि अनुसूचित जाति आबादी बहुल गांव का विकास कराकर उपेक्षित इलाकों तक विकास की किरण पहुंचाई जाए। पर, सरकार बदली तो योजना का नाम बदल दिया गया।
मानकों में संशोधन करके या सुविधाओं में कुछ बढ़ोतरी करके पहले की सरकार से ज्यादा गांव की चिंता करने का संदेश देने की कोशिश की गई। पर, सब कुछ सियासी रंग में रंगा रहा।
जनप्रतिनिधियों पर आरोप लगे कि वोट देने या न देने के आधार पर गांवों का चयन किया गया। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मायावती, मुलायम और अखिलेश यादव बैठे तो ‘मेरा गांव-तेरा गांव’, ‘मेरे समर्थकों के गांव बनाम तुम्हारे समर्थकों के गांव’ जैसे झगड़े भी उजागर हुए। विधानसभा व विधान परिषद में भी इन योजनाओं को लेकर सियासी आरोप-प्रत्यारोप लगे, पर गांव का विकास मॉडल नहीं बन पाया।
सुविधाएं पहुंचीं भी तो आधी-अधूरी
जिन गांवों में इन योजनाओं के तहत सुविधाएं पहुंचीं भी तो आधी-अधूरी। कभी नियमों की तकनीक का हवाला देकर गांव का पूरा विकास कर देने का दावा कर दिया गया तो कभी मानकों का हवाला देकर सरकारी मशीनरी ने गांव के विकास में रोड़े अटकाए।
ग्रामसभा के मूल गांव में बिजली के खंभे और तार पहुंचाकर ग्रामसभा के विद्युतीकरण का सच सामने आया तो कहीं सिर्फ टंकी बनाकर ग्रामसभा को शुद्ध पेयजल की सुविधा से युक्त कर देने के दावे भी जांच के दायरे में आए।
पेंशन और छात्रवृत्ति के विवाद भी उजागर हुए तो यह भी सच सामने आया कि कई जगह सिर्फ मुख्य मार्ग की नालियों को पक्की बनाकर पूरी ग्रामसभा में पक्की नालियों के निर्माण की कागजी खानापूरी करके गांव को सभी सुविधाओं से संपन्न दिखा दिया गया।
अब तक शुरू की गईं ये योजनाएं
-डॉ. भीमराव अंबेडकर शताब्दी वर्ष पर 1991 में अंबेडकर ग्राम विकास योजना शुरू हुई। शुरुआत में ग्राम विकास विभाग से संचालित।
-प्रतिवर्ष प्रत्येक जिले के अनुसूचित जाति बहुल (जहां की कुल आबादी के 50 प्रतिशत से ज्यादा अनुसूचित जाति के लोग हों) 5 गांवों का चयन करके उनका समग्र विकास कराना था।
ये काम होने थे
चयनित गांव में अनुसूचित जाति/ जनजाति के परिवारों को मुफ्त बोरिंग एवं पंपसेट। गांवों को सड़क, गलियों में खड़ंजा, पक्की नालियां, गरीबों को इंदिरा आवास एवं निर्बल वर्ग आवास की सुविधा, प्रत्येक 40 परिवारों के बीच एक इंडिया मार्क टू हैंडपंप, प्राइमरी स्कूल भवन सहित, गांव का विद्युतीकरण, लोगों को चिकित्सा सुविधा, पशुओं की चिकित्सा की सुविधा, शौचालयों का निर्माण।
मायावती ने पहली बार बदला नाम
-1995 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने अंबेडकर ग्राम विकास विभाग नाम से नया विभाग बनाकर यह योजना उसके अधीन कर दी।
-दिसंबर 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने योजना का नाम बदलकर समग्र ग्राम विकास योजना कर दिया।
चयन की प्रक्रिया
विधानसभा व विधान परिषद के प्रत्येक सदस्य को 10 गांव चयन करने का अधिकार दिया गया। इसके अलावा फैसला किया गया कि किसी गांव का कोई सैनिक शहीद होता है तो वह गांव स्वत: इस योजना में शामिल हो जाएगा।
नक्सल प्रभावित समग्र ग्राम विकास योजना
जनवरी 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यह योजना शुरू की। इसके तहत मऊ, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, सोनभद्र व गाजीपुर के गांवों के समग्र विकास का फैसला किया गया।
काम जो होने थे
समग्र ग्राम विकास योजना के तहत होने वाले सभी काम होने थे। साथ ही इन गांवों के लोगों को रोजगार मुहैया कराने के लिए अलग-अलग योजनाओं से सहायता देने की व्यवस्था की गई थी।
मायावती ने फिर बदला नाम
-2007 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने समग्र ग्राम विकास योजना का नाम डॉ. अंबेडकर ग्रामीण समग्र विकास योजना कर दिया।
-जून 2008 में मायावती ने फिर योजना का नाम बदलकर डॉ. अंबेडकर ग्रामसभा विकास योजना कर दिया।
-प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से 5 ऐसी ग्राम सभाओं को चयनित कर विकास कराने की योजना बनी, जिनका कोई मजरा उस समय तक किसी योजना के तहत विकास के लिए चयनित नहीं किया गया था। साथ ही उस गांव सभा की आबादी में आधे से अधिक अनुसूचित जाति के लोग थे।
अखिलेश ने शुरू की डॉ. राममनोहर लोहिया और जनेश्वर मिश्र योजना
2012 में सपा की सरकार बनी। अखिलेश यादव ने गांव के विकास की योजना का नाम फिर बदला। डॉ. अंबेडकर ग्राम सभा विकास योजना के स्थान पर डॉ. राममनोहर लोहिया समग्र ग्राम विकास योजना लाई गई। सपा सरकार ही मंडी परिषद के जरिए भी गांवों के विकास के लिए जनेश्वर मिश्र ग्राम योजना लाई।
ये रही है गांवों के चयन की प्रक्रिया
-राम मनोहर लोहिया ग्राम चयन के लिए जिलाधिकारियों को कुछ बिंदु तय करके दिए गए। कहा गया कि इनके आधार पर विकास में सर्वाधिक पिछड़े गांव की सूची तैयार कराई जाए। फिर उनमें से गांव का चयन कर उन्हें मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएं।
-जनेश्वर मिश्र योजना के गांव का चयन विधायकों व विधान परिषद सदस्यों की सिफारिश पर करने का फैसला किया गया। साथ ही तय हुआ कि प्रत्येक ग्राम में 40 लाख रुपये के विकास कार्य कराए जाएंगे।
लोहिया गांव में जो काम होने थे
इन गांवों में 36 काम कराने का फैसला हुआ। इनमें अंबेडकर व समग्र ग्राम विकास योजना वाले कामों के अलावा रोजगार, छात्रवृत्ति, छात्र-छात्राओं को लैपटॉप व टैबलेट, सभी को किसान क्रेडिट कार्ड, कौशल विकास व मनरेगा के तहत लोगों को रोजगार मुहैया कराने की सुविधाएं भी मुहैया कराने की बात तय हुई।
जनेश्वर मिश्र गांव में जो काम होने थे
गलियों-नालियों का निर्माण, पीने के पानी के लिए हैंडपंप, सोलर लाइटों से गलियों में प्रकाश की व्यवस्था और लोहिया गांव वाले कुछ अन्य काम।
इन योजनाओं के तहत किया गया गांवों का चयन
1995 से 2002-03 तक अंबेडकर ग्राम विकास योजना के तहत 19,206 गांवों का चयन हुआ। इन गांवों का चयन तभी हुआ जब प्रदेश में बसपा-सपा और भाजपा-बसपा गठबंधन की सरकार रही। पर, इन सभी गांव में मानक के अनुसार, विकास कार्य नहीं हो पाए। गठबंधन टूटा और इस योजना का काम भी रोक दिया गया।
-मायावती के नेतृत्व में 2007 में प्रदेश में पूर्ण बहुमत की बसपा सरकार बनी तो पहले चयनित गांव में काम शुरू हुए।
-मायावती ने डॉ. अंबेडकर ग्रामीण समग्र विकास योजना के तहत भी 17,100 गांव चयनित किए गए। पर, बसपा सरकार जाने के बाद जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो फिर इन गांवों का विकास रुक गया।
-अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार के पांच साल के कार्यकाल में डॉ. राममनोहर लोहिया समग्र ग्राम विकास योजना के अंतर्गत 9998 गांवों का चयन किया गया।
-जनेश्वर मिश्र योजना के तहत लगभग 4000 गांवों का चयन हुआ।