टिकट बंटवारे पर BJP में घमासान, फिर बड़ा बवाल!
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भाजपा में टिकट बंटवारे को लेकर सतह पर आई घमासान ने संघ को असहज कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने भी इस पर चुप्पी साध ली है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी की टिकट वितरण में गड़बड़ी की स्वीकारोक्ति के बाद भाजपा में गुटबाजी एक बार फिर सतह पर आ गई है।
पार्टी का कोई प्रमुख नेता खुलकर भले ही कुछ न बोल रहा है, पर निजी बातचीत में इसे अनावश्यक विवाद खड़ा करना मान रहे हैं।
साथ ही कुछ ऐसे सवाल उठाते हैं जिन्होंने तूल पकड़ा तो बवाल और बढ़ सकता है। संघ भी इस बयान से असहज है। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने में संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, लेकिन फिर विवाद खड़ा होने से संघ असहज हो गया है।
भाजपा प्रवक्ता ने लगाया आरोप
दरअसल, सुधांशु के हवाले से सामने आई यह बात कि राज्य नेतृत्व की अदूरदर्शिता व अपरिपक्वता के कारण प्रदेश में एक भी कायस्थ को टिकट नहीं मिल पाया।
टिकट वितरण में गड़बड़ी हुई। इससे भाजपा की प्रदेश इकाई के कई नेता असहज से हो गए हैं।
हालांकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी सिर्फ ‘नो कमेंट’ ही कहते हैं, लेकिन पार्टी के अन्य पदाधिकारी निजी बातचीत में कुछ ऐसे सवाल उठाते हैं जिनसे केंद्रीय नेतृत्व पर सवालिया निशान लगते हैं।
टिकट देना दिल्ली में तय हुआ
पदाधिकारियों का कहना है कि सितंबर 2013 के बाद तो यूपी चुनाव समिति की बैठक बुलाने तक की औपचारिकता पूरी करने की भी जरूरत नहीं समझी गई।
सारा कुछ दिल्ली से हुआ है, वहीं से सूची जारी हुई। जगदंबिका पाल दिल्ली में पार्टी में शामिल हुए।
कंवर सिंह तंवर को भी दिल्ली में पार्टी की सदस्यता देकर उम्मीदवार बनाया गया। यह तो सिर्फ दो उदाहरण हैं, कई लोग दिल्ली में पार्टी के सदस्य बने और सीधे उम्मीदवार बन गए।
ऐसे में प्रदेश नेतृत्व बीच में कहां से आ गया।
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से हैरानी
एक पदाधिकारी तो यह सवाल उठाते हैं कि संसदीय बोर्ड की इतनी महत्वपूर्ण जानकारी त्रिवेदी को पता कैसे चली? निश्चित रूप से किसी ने उन्हें यह बताया है।
यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर यूपी ने गलत नाम भेज दिए थे अथवा किसी प्रकार का असंतुलन था तो केंद्रीय नेतृत्व, संसदीय बोर्ड अथवा प्रदेश प्रभारी अमित शाह ने इन्हें हरी झंडी कैसे दे दी।
गौरतलब है कि पार्टी पहले भी टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी में असंतोष होने की बातें सुनाई पड़ रही थीं, अब सुधांशु त्रिवेदी को स्वीकार कर लेने के बाद भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।