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सुनने में असमर्थ बच्चों को तीन नई डिवाइस देंगी राहत, दो का एसजीपीजीई में प्रत्यारोपण शुरू
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अब उन बच्चों की भी न सुनने की तकलीफ दूर होगी, जिनके कान नहीं हैं। ऐसा नई तरह की तीन डिवाइस से संभव होगा। एसजीपीजीआई ने इनमें से दो का प्रत्यारोपण शुरू भी कर दिया है। जल्द ही इसे उन बच्चों में प्रत्यारोपित किया जाएगा, जिनके न तो कान का आंतरिक हिस्सा बना है और न ही सुनने के लिए संदेश देने वाली नसें विकसित हुई हैं। इसके बाद अन्य मेडिकल कॉलेजों के ईएनटी विशेषज्ञों को प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि सभी जगह न सुनने की बीमारी लेकर आने वाले बच्चों का प्रत्यारोपण के लिए चयन करने में आसानी हो।
जन्म से ना सुनने वाले बच्चों को कॅाक्लियर इंप्लांट किया जाता है। हालांकि, जिनके कान का आंतरिक हिस्सा विकसित नहीं होता है, अब उनके लिए तीन नई डिवाइस आ गई हैं। इनमें से बोन एंकर्ड हियरिंग एड (बीएएचए) और वायब्रेंट साउंड ब्रिज का प्रत्यारोपण शुरू कर दिया गया है। मरीजों पर इसका असर बेहतर पाया गया। इन्हें कान के अंदर का हिस्सा विकसित नहीं होने पर लगाया जाता है। तीसरी डिवाइस ब्रेन स्टेम इंप्लांट का आकार काफी छोटा है। कान का बाहरी और आंतरिक हिस्सा विकसित न होने, सुनने के लिए जिम्मेदार नसों के मस्तिष्क में विकसित नहीं होने पर इसे लगाया जाता है। इस डिवाइस की कीमत 10 से 12 लाख है। इसका कोई भी हिस्सा बाहर नहीं दिखता है।
विदेशों में प्रयोग के बाद एसजीपीजीआई में भी इसके प्रत्यारोपण की तैयारी चल रही है। यहां के प्रोफेसर डॉ. अमित केसरी ने बताया कि नए इंप्लांट से उन बच्चों को सुनने योग्य बनाया जा सकेगा, जिनके कान का आंतरिक और बाह्य हिस्सा विकसित नहीं हुआ है। जिनमें मस्तिष्क की नसें विकसित नहीं र्हुइं या कम विकसित हैं, उनके लिए भी यह फायदेमंद है। कॉक्लियर उन्हें लगाया जाता है, जिनका कान का हिस्सा तो होता है, पर सुनने की क्षमता कमजोर होती है।
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एक हजार में दो से पांच बच्चों में समस्या
केजीएमयू के ईएनटी विभाग के प्रो. डॉ. एचपी सिंह ने बताया कि जन्म लेने वाले एक हजार बच्चों में से दो से पांच में बधिरता की समस्या होती है। कुछ लोगों में इसकी वजह आनुवांशिक मिली है। इसके अलावा नशीली दवा, धूम्रपान और कई तरह की नियमित दवाओं का सेवन करने वाली मां के गर्भ में पल रहे बच्चे को समस्या होती है।
एक से तीन साल के अंदर लगे तभी फायदा
प्रो. अमित केसरी ने बताया कि जन्म के एक साल बाद बच्चा आवाज देने पर नहीं सुन रहा है तो सावधान हो जाएं। एक से तीन साल के अंदर डिवाइस लगने पर शत प्रतिशत फायदा मिलता है। पांच साल के बाद वाले बच्चे में इसका असर कम होता है।
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जन्म से ना सुनने वाले बच्चों को कॅाक्लियर इंप्लांट किया जाता है। हालांकि, जिनके कान का आंतरिक हिस्सा विकसित नहीं होता है, अब उनके लिए तीन नई डिवाइस आ गई हैं। इनमें से बोन एंकर्ड हियरिंग एड (बीएएचए) और वायब्रेंट साउंड ब्रिज का प्रत्यारोपण शुरू कर दिया गया है। मरीजों पर इसका असर बेहतर पाया गया। इन्हें कान के अंदर का हिस्सा विकसित नहीं होने पर लगाया जाता है। तीसरी डिवाइस ब्रेन स्टेम इंप्लांट का आकार काफी छोटा है। कान का बाहरी और आंतरिक हिस्सा विकसित न होने, सुनने के लिए जिम्मेदार नसों के मस्तिष्क में विकसित नहीं होने पर इसे लगाया जाता है। इस डिवाइस की कीमत 10 से 12 लाख है। इसका कोई भी हिस्सा बाहर नहीं दिखता है।
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विदेशों में प्रयोग के बाद एसजीपीजीआई में भी इसके प्रत्यारोपण की तैयारी चल रही है। यहां के प्रोफेसर डॉ. अमित केसरी ने बताया कि नए इंप्लांट से उन बच्चों को सुनने योग्य बनाया जा सकेगा, जिनके कान का आंतरिक और बाह्य हिस्सा विकसित नहीं हुआ है। जिनमें मस्तिष्क की नसें विकसित नहीं र्हुइं या कम विकसित हैं, उनके लिए भी यह फायदेमंद है। कॉक्लियर उन्हें लगाया जाता है, जिनका कान का हिस्सा तो होता है, पर सुनने की क्षमता कमजोर होती है।
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एक हजार में दो से पांच बच्चों में समस्या
केजीएमयू के ईएनटी विभाग के प्रो. डॉ. एचपी सिंह ने बताया कि जन्म लेने वाले एक हजार बच्चों में से दो से पांच में बधिरता की समस्या होती है। कुछ लोगों में इसकी वजह आनुवांशिक मिली है। इसके अलावा नशीली दवा, धूम्रपान और कई तरह की नियमित दवाओं का सेवन करने वाली मां के गर्भ में पल रहे बच्चे को समस्या होती है।
एक से तीन साल के अंदर लगे तभी फायदा
प्रो. अमित केसरी ने बताया कि जन्म के एक साल बाद बच्चा आवाज देने पर नहीं सुन रहा है तो सावधान हो जाएं। एक से तीन साल के अंदर डिवाइस लगने पर शत प्रतिशत फायदा मिलता है। पांच साल के बाद वाले बच्चे में इसका असर कम होता है।