हिंदी हैं हम: अंग्रेजी में शिक्षा, हिंदी में परीक्षा, पूरी हुई आईएएस बनने की इच्छा
जानें, उन आईएएस अफसरों के बारे में जिन्होंने हिंदी के जरिए प्रशासनिक सेवाओं में सफलता प्राप्त की और आज भी हिंदी के जरिए अपना योगदान दे रहे हैं।
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प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे जिन छात्र-छात्राओं को यह लगता है कि बिना अंग्रेजी माध्यम के प्रशासनिक सेवाओं या अन्य परीक्षाओं में सफलता नहीं हासिल कर सकते तो यह खबर उनके लिए एक मिसाल है। आज हम ऐसे आईएएस अफसरों के बारे में आपको बता रहे हैं जिन्होंने अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई के बावजूद हिंदी माध्यम से परीक्षा दी और देश की सर्वोच्च परीक्षा आईएएस में सफलता हासिल की।
ये अफसर न सिर्फ अपनी प्रशासनिक दक्षता के लिए जाने जाते हैं बल्कि अपने लेखन से भी देश-दुनिया में नाम रोशन कर रहे हैं। इन अफसरों का कहना है कि एक भाषा कभी दूसरी भाषा की शत्रु नहीं हो सकती लेकिन अपनी मातृभाषा का ज्ञान और उसमें लेखन व वाचन खुद को गौरवान्वित करता है।
अपनी भाषा में ही आप आत्मीय हो सकते हैं : डॉ. हरिओम
1997 बैच के यूपी काडर के आईएएस अधिकारी डॉ. हरिओम की शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी अंग्रेजी पुस्तकों को पढ़ा, राजनीति विज्ञान के नोट्स भी अंग्रेजी में तैयार किए लेकिन हिंदी से उन्हें इस कदर लगाव था कि उन्होंने परीक्षा हिंदी में ही दी और अपने विषय में पूरे देश में अव्वल रहे।
वर्तमान में डॉ. हरिओम, सचिव सामान्य प्रशासन, उत्तर प्रदेश के पद पर कार्यरत हैं। कानपुर, गोरखपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, इलाहाबाद समेत 11 जिलों में जिलाधिकारी के पद पर काम करने के साथ ही शासन में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके डॉ. हरिओम लेखन में भी बराबर सक्रिय हैं।
एक कवि के साथ ही, गज़लकार, कहानीकार और मशहूर गायक के रूप में भी उन्हें देश-दुनिया में पहचाना जाता है। अब तक उनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो गजल संग्रह, दो कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह, एक चुनिंदा गजलों का संग्रह और एक यात्रा वृतांत है। डॉ. हरिओम बताते हैं कि शुरुआती शिक्षा सरकारी विद्यालय में हुई, इसलिए बुनियाद हिंदी थी और अमेठी का होने की वजह से अवधी से भी बहुत प्यार था। वे कहते हैं कि कोई भी भाषा, दूसरी भाषा की शत्रु नहीं होती लेकिन अपनी मातृभाषा को सीखना और उसमें काम करना बेहद जरूरी होता है। कहा कि अपनी भाषा में ही आप आत्मीय हो सकते हैं और नौकरी की दृष्टि से भाषा को नहीं देखना चाहिए।
सिकंदर हूं मगर हारा हुआ हूं... गायकी से जीता दिल
मखमली आवाज में डॉ. हरिओम की गायिकी उनके लेखन को और भी ज्यादा निखारती है। सिकंदर हूं मगर हारा हुआ हूं... ने उन्हें शिखर पर पहुंचाया। उनकी लिखी गजलों का एल्बम रोशनी के पंख और रंग का दरिया आ चुके हैं। देश-विदेश में वे सैकड़ों मंचों पर अपनी प्रतिभा दिखा चुके हैं। साहित्यिक अवदान केलिए उन्हें फिराक सम्मान, राजभाषा पुरस्कार, तुलसी श्री सम्मान, उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान, अंतरराष्ट्रीय वातायन पुरस्कार (लंदन) और कुवैत हिंदी-उर्दू सोसायटी की ओर से साहित्यश्री समेत बहुत से पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
अपनी मातृभाषा में बोलना सुखद अनुभूति : पवन कुमार
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक, विशेष सचिव भाषा और संस्कृत संस्थान के निदेशक के पद पर आसीन आईएएस पवन कुमार का नाम साहित्य की दुनिया में भी अलग स्थान रखता है। चंदौली, फर्रुखाबाद, संभल, सहारनपुर और बदायूं में पवन कुमार जिला कलेक्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। अपनी हिंदी-उर्दू गजलों के लिए पवन कुमार पूरे देश और विदेशों तक में प्रसिद्ध हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
उनका गजल संग्रह वाबस्ता 2012 में प्रकाशित हुआ तो वहीं दस्तक और पराग पलकों पर, नामक गजल संग्रहों का उन्होंने संपादन और संकलन किया। इसके बाद उनका एक और गजल संग्रह आहटें 2017 में प्रकाशित हुआ जो काफी लोकप्रिय हुआ। खास बात ये है कि पवन कुमार की शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई लेकिन उन्होंने आईएएस की परीक्षा हिंदी माध्यम से देकर सफलता हासिल की।
पवन कुमार बताते हैं कि अपनी भाषा में लिखना ज्यादा मौलिक होता है, इसीलिए उन्होंने परीक्षा का माध्यम हिंदी चुना। मूलत: मैनपुरी के निवासी पवन कुमार बताते हैं कि उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी के साथ ही बाद में उर्दू और तमिल भी सीखी। उनका मानना है कि भाषा संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम है और भाषाएं सीखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन अपनी मातृभाषा की जानकारी और उसमें बोलना अलग ही सुखद अनुभूति दिलाती है।
उसी की याद के बर्तन बनाये जाता हूं...
तीन-तीन महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाल रहे पवन कुमार की हिंदी-उर्दू शायरी की लोकप्रियता इस कदर है कि उनके एलबम वाबस्ता को सुप्रसिद्ध गायक रूपकुमार राठौर ने अपनी आवाज से संवारा है। पवन कुमार को 2013 में जयशंकर प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो वहीं 2016 में जीशान मकबूल अवॉर्ड और कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी गजलों में आम आदमी की बात इतनी सहजता से कही जाती है कि वह सभी को अपनी बात नजर आती है। अपनी पुस्तक आहटें में वे लिखते हैं कि -
उसी की याद के बर्तन बनाये जाता हूं
वही जो छोड़ गया चाक पर घुमा के मुझे।
संस्कृत से मिला हिंदी भाषा का संस्कार : राकेश मिश्रा
उत्तर प्रदेश शासन में विशेष सचिव खाद्य एवं रसद, राकेश मिश्रा की साहित्य जगत में उनकी हिंदी कविताओं से अलग ही पहचान है। उनके चार काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उनकी कविताओं पर शोध कार्य भी हो चुका है। 1993 बैच के पीसीएस और 2012 में आईएएस हुए राकेश मिश्रा बताते हैं कि उन्होंने पीसीएस की परीक्षा संस्कृत विषय से दी थी।
वे बताते हैं कि उन्हें हिंदी भाषा का संस्कार संस्कृत से ही मिला। कहते हैं कि हिंदी में कविताएं लिखना उन्हें शुरू से ही पसंद था और ये कविताएं उन्हें आत्मसंतुष्टि प्रदान करती हैं। उनके काव्य संग्रह ‘जिंदगी एक कण है’, ‘अटक गई नींद’ और ‘चलते रहे रात भर’ प्रकाशित हो चुके हैं जो काफी चर्चित रहे।
वहीं उनका नवीनतम काव्य संग्रह ‘शब्दों का देश’ भी छप चुका है और जल्द आने वाला है। राकेश मिश्रा बताते हैं कि हिंदी न सिर्फ हमारी भाषा है बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता, परंपराओं की द्योतक भी है।