गणतंत्र के गवाह की बदहाली: स्वतंत्रता संग्राम की गवाह आलमबाग कोठी, चंदरनगर गेट का वैभव धूमिल
लखनऊ के आलमबाग में स्थित ऐतिहासिक चंदरनगर गेट बदहाली का शिकार है। वहीं, आलमबाग कोठी का ज्यादातर हिस्सा जर्जर होकर गिर चुका है। कोठी में अब बड़ी-बड़ी घास उग आई है।
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शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...। उन्नाव के कवि जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' की ये मशहूर पंक्तियां लखनऊ के आलमबाग में स्थित ऐतिहासिक चंदरनगर गेट पर पहुंचकर बेमानी लगने लगती हैं। जिस भव्य द्वार से अंग्रेजों को लखनऊ में प्रवेश से रोकने के लिए अनगिनत देशभक्त शहीद हो गए, आज वहां बदहाली और अतिक्रमण का साया है। नवाबों की शान आलमबाग कोठी का यह प्रवेश द्वार हुआ करता था।
इतिहासकार रोशन तकी बताते हैं कि नवाब वाजिद अली शाह ने अपनी बेगम आलमआरा के लिए इस कोठी का निर्माण कराया था जिसका नाम उन्हीं के नाम पर आलमबाग कोठी पड़ा। इसके दो प्रवेश द्वार थे जिसमें से एक तो पहले ही गिर चुका था। एक द्वार अभी मौजूद है जिसका नाम चंदरनगर गेट तब पड़ा जब पाकिस्तान से आए लोगों ने यहां अपनी बस्ती बनाई थी।
अंग्रेजों और अवध के सूरमाओं के बीच 1857 में यहां भीषण युद्ध हुआ था। हजारों लोग कुर्बान हुए और इसी द्वार से अंग्रेज लखनऊ में दाखिल हुए थे। रोशन तकी बताते हैं कि अंग्रेजों ने बाद में इसे सैन्य अस्पताल में तब्दील कर दिया था। जब अंग्रेज अफसर जनरल हेनरी हैवलॉक की मौत हुई तो उनके बेटे ने उन्हें इसी आलमबाग कोठी में दफनाया था जहां उनकी कब्र आज भी मौजूद है। वहीं आलमबाग कोठी का ज्यादातर हिस्सा जर्जर होकर गिर चुका है।
कोठी पर्यटन विभाग के सुपुर्द है। यहां हेरिटेज होटल बनाने की भी योजना है। फिलहाल इसके भीतर बड़ी-बड़ी घास उग आई है। कोठी का ज्यादातर हिस्सा गिर चुका है और इसकी रंगत भी खराब हो चुकी है। कोठी के बाहर और आसपास सब्जी मंडी लगती है जिसकी वजह से आसपास गंदगी रहती है।
चंदरनगर गेट के आसपास अतिक्रमण
आलमबाग गेट जिसे अब चंदरनगर गेट कहा जाता है, के आसपास अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। चारों ओर अस्थायी दुकानें हैं, शाम को गेट के सामने का हिस्सा वाहन स्टैंड बन जाता है। यह ऐतिहासिक द्वार उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। इसकी निदेशक रेनू द्विवेदी ने बताया कि हमारे संरक्षण में केवल गेट आता है जिसकी मरम्मत व सुंदरीकरण का काम समय-समय पर होता रहता है। अतिक्रमण हटा भी लेकिन फिर से पहले जैसी स्थिति हो जाती है।