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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   The scene of death is still fresh in front of my eyes

Lucknow News: आंखों के सामने मौत का मंजर अब भी ताजा

Tue, 02 Sep 2025 02:49 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 02 Sep 2025 02:49 AM IST
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The scene of death is still fresh in front of my eyes
दुकान पर काम करते शमीम और उनका घर।
मोहनलालगंज। बीस सितंबर 2014 की वह सुबह मैं आज भी नहीं भूल सकता… घर से निकला ही था कि एक धमाका हुआ और जीवन भर का गम दे गया। यह शब्द नहीं, बल्कि सिसेंडी निवासी शमीम की वेदना है, जो आंसुओं के साथ आज भी छलक पड़ती है। हादसे ने उन्हें ऐसा घाव दिया, जो कोई मरहम नहीं भर सका।
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उस दिन एक साथ परिवार के सात सदस्य और नौ अन्य लोगों के छत-विछत शव शमीम की आंखों के सामने थे। मंजर इतना भयावह था कि उन्हें आज भी नींद नहीं आती। शमीम बताते हैं कि पहले वह पटाखा बनाने का काम करते थे। रुंधे गले से उन्होंने बताया कि हमारे घर में पीढ़ियों से पटाखे बनते थे। 2014 में लाइसेंस छोटे भाई खलील के नाम था। दीपावली नजदीक होने से पूरा परिवार और मजदूर पटाखे बनाने में जुटे थे। सुबह आठ बजे जैसे ही मैं घर से निकला, पीछे के हिस्से से तेज धमाका हुआ और सबकुछ तबाह हो गया।
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शमीम दौड़ते हुए पहुंचे तो चारों तरफ मलबा और लाशें बिखरी पड़ी थीं। नजर अचानक पास के पेड़ पर गई तो मां हाजरा का शव टंगा था। पत्नी मोमिना का शव आम के बाग में पड़ा था। भाई खलील, बेटी शाहजहां, भाई सलीम, भतीजी नगमा और भतीजा सगीर मलबे में दबे थे। मेरी आंखों के सामने पूरा परिवार खत्म हो गया।
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हादसे के बाद शमीम ने पटाखा बनाने का काम हमेशा के लिए छोड़ दिया। आज वह साइकिल मरम्मत कर अपना गुजारा करते हैं।

कभी लखनऊ की पटाखा फैक्टरी था सिसेंडी
सिसेंडी कभी पटाखा उद्योग का गढ़ माना जाता था। यहां 16 लाइसेंस धारक थे और यहां का माल लखनऊ समेत आसपास के जिलों तक थोक में सप्लाई होता था। लेकिन 20 सितंबर 2014 के हादसे ने सबकुछ बदल दिया। उसके बाद मोहनलालगंज क्षेत्र में सभी लाइसेंस रद्द कर दिए गए और अब यहां पटाखा बनाने का कोई अधिकृत लाइसेंसधारक नहीं बचा।

दुकान पर काम करते शमीम और उनका घर।

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