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हुनर ने ठान ली, तो फिर कौन रोक पाएगा?
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Mon, 05 Aug 2013 12:14 PM IST
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अक्सर ऐसा होता है कि लोग अपनी नाकामी का ठीकरा मुश्किलों के सिर फोड़कर खुद को दिलासा दे लेते हैं। लेकिन ये बच्चे खास हैं। खास इसलिए क्योंकि इन बच्चों ने मुश्किलों से दोस्ती गांठी और कामयाबी की मंजिल की तरफ बढ़ चले।
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पूर्व राष्ट्रपति और देश के जाने-माने वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम कई बार कह चुके हैं कि 'सपने वो नहीं देते, जो हम नींद में देखते हैं, बल्कि सपने वो हैं, जो आपकी नींद लगने नहीं देते।' सूबे के कोने-कोने से अमर उजाला प्रतिभा सम्मान समारोह में शिरकत करने लखनऊ आए कुछ बच्चों की कहानी इसी बात की तस्दीक करती है। और इन्हें साथ मिला अपने परिवार का।
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इंटरमीडिएट में 91.1 फीसदी अंकों के साथ अपने मंडल में पहला स्थान पाने वाली कोरावली की आरती वर्मा के सिर से भले पिता का साया उठ गया हो, लेकिन दुख और निराशा को दरकिनार करते हुए उन्होंने कमाल कर दिया।
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परिवार ने दिया साथ तो मिली कामयाबी
आरती की मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं। पिता के गुजरने के बाद इनकी मां ने अपनी बेटी को पढ़ने से नहीं रोका और खुद काम करते-करते अपनी बेटी को पढ़ाई से जुड़ी हर सहूलियत दी। आरती का सपना है कि वो डॉक्टर बनें और समाज की सेवा में अपना योगदान दें।
आगरा की ललितेश और उनके परिवार ने भी कम दिक्कतों का सामना नहीं किया। इंटरमीडिएट में 91 फीसदी अंकों के साथ भविष्य में आईएएस बनने के सपने संजोने वाली ललितेश के इस ख्वाब को पूरा करने के लिए उनके पिता ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है।
वह दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, लेकिन बिटिया से साफ कहा हुआ है कि वह किसी बात की चिंता न करे। ललितेश का कहना है, 'मेरे पिता मजदूरी करते हैं और कई बार ऐसा होता है कि काम न मिलने पर वह खाली हाथ लौट आते हैं।'
जब भी वह अपने पिता से पूछती हैं कि क्या काम ठीक नहीं चल रहा या वह क्या काम कर रहे हैं, तो पिता प्यार से कहते हैं, 'बेटा तू पढ़ाई में मन लगा और इसकी चिंता बिलकुल न कर कि मैं कैसे इंतजाम कर रहा हूं।'
ललितेश को इस बात का अंदाजा है कि पिता भले कुछ न कहें, लेकिन वह कई चिंताओं से घिरे हैं और इसके बावजूद इस बात का असर उस पर कतई नहीं पड़ने देना चाहते। और वह अपनी मेहनत से अपने पिता का सपना साकार करना चाहती हैं। सीएम अखिलेश से प्रतिभा सम्मान लेने आईं ललितेश आईएएस बनना चाहती हैं।