नखलऊवा पंचः जब सुभाष चंद्र बोस के एक आह्वान ने हिंदू-मुसलमानों को बांटने की नीति को फेल कर दिया
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लखनऊ में हिंदू और मुसलमान मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे। आंदोलन काफी तीव्र हो चुका था। अंग्रेजों की कोशिश थी कि दोनों समुदायों में फूट डाल दी जाए। उनको लगता था कि मुसलमान और हिंदू यदि अलग-अलग हो जाएं तो आजादी के खिलाफ चल रहा आंदोलन कमजोर हो जाएगा।
इसका कुछ असर भी दिखने लगा था, जिससे आजादी के लड़ाके चिंतित थे। बात 1940 की है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस लखनऊ आए। अमीनुद्दौला पार्क में उनकी सभा हुई। सभा में मुसलमान भी आए हुए थे। ‘क्रांति आंदोलन : कुछ अधखुले पन्ने’ के प्रसंग से पता चलता है, ‘सुभाष बाबू ने कहा, मुझे पता चला है कि अंग्रेजों ने कुछ गलतफहमी फैलाकर हिंदुओं व मुसलमानों के बीच कुछ मतभेद पैदा कर दिए हैं, पर इसमें अंग्रेजों का अपना स्वार्थ है।
इससे सभी को होशियार रहना है। अंग्रेज कह रहे हैं कि हिंदू-मुसलमान समझौता कर लें। पर, मैं कहता हूं कि अंग्रेज हिंदू व मुसलमानों के बीच न पड़ें। मुसलमान हमारे साथ हैं। इस जंग-ए-आजादी में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे हैं। सुबह तक इसका सबूत भी मिल जाएगा।
दीवार पर चिपकाए लाल स्याही के इश्तिहार
सुभाष बाबू सभा करके चले गए। अगले दिन सुबह जब गोरों ने लखनऊ की दीवारों पर चिपके बरतानिया हुकूमत को चुनौती देते और क्रांतिकारियों का आभार जताते लाल स्याही के इश्तिहार देखे तो वे बौखला गए। इश्तिहारों पर यह भी लिखा था, ‘अंग्रेजों सफल नहीं होगे। हिंदू-मुसलमान एक हैं।
बरतानिया हुकूमत जब तक कुछ समझती और इसे रोकने की कोशिश करती तब तक लखनऊ में जगह-जगह से हिंदू व मुसलमानों के जुलूस अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ नारे लगाते हुए सड़कों पर आ गए। अंग्रेजों ने लाख कोशिश की कि लेकिन यह पता नहीं लगा पाए कि यह सब कैसे हुआ। लखनऊ में अंग्रेजों के खिलाफ जंग तेज होती गई।’