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वह तलवार जिसने अशफाक को बना दिया क्रांतिकारी, पढें पूरा मामला
Thu, 09 May 2019 04:15 PM IST
Amulya Rastogi
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Thu, 09 May 2019 04:15 PM IST
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अशफाक उल्लाह खां
अशफाक बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज थे। उन्होंने राजा-महाराजाओं के बीच लड़ाई की कहानियां खूब पढ़ीं। हमेशा ऐसी कल्पनाओं में डूबे रहते कि अन्याय करने वालों को कैसे मुंहतोड़ सबक सिखाया जाए। इन कहानियों को पढ़ने के बाद विद्यार्थी जीवन से ही अशफाक उल्ला खां के दिल और दिमाग में अंग्रेजों के खिलाफ काफी आक्रोश भर गया।
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वह मानने लगे थे कि देश की सारी समस्याओं की जड़ अंग्रेजों की हुकूमत है। अगर अंग्रेजी हुकूमत को खत्म कर दिया जाए तो देश को समस्याओं से भी मुक्त किया जा सकता है। सुधीर विद्यार्थी ने संस्मरण में लिखा है, ‘अशफाक उल्ला स्कूल में थे। तभी यह खबर आई कि दिल्ली में वायसराय पर किसी ने बम फेंक दिया है।
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स्कूल बंद कर दिया गया। जब स्कूल बंद करने की घोषणा हुई तो अशफाक को काफी खुशी महसूस हुई। वह सोचने लगे कि देश को आजाद कराने का तरीका सशस्त्र क्रांति ही है। अंग्रेजों को इसी से डराया जा सकता है। वे घटना के बारे में जितना सोचते उनके मन में क्रांतिकारी बनकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का संकल्प दृढ़ होता जा रहा था। उन्हें लगा कि वह हाथ में तलवार लेकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे हैं।
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पिता से मंगाई लोहे की तलवार
तलवार ही उनके दिमाग में इसलिए आई क्योंकि अशफाक को बचपन से ही मेलों से यदि कोई चीज लाने का शौक था तो वह तलवार थी। अशफाक ने एक दिन वालिद से कहा, ‘अब्बू, आप मुझे एक तलवार ला दें।’ वालिद ने कहा, ‘बेटा! इतनी तलवार ला चुका हूं। इस बार भी कोई छीन लेगा।’
अशफाक बोले, ‘आप चांदी की तलवार न लाएं बल्कि लोहे की ला दें। उसे कोई नहीं छीनेगा।’ मां-पिता हंस पड़े। उन्हें क्या पता था कि तलवार की मांग उनके बेटे को आगे चलकर अंग्रेजों के खिलाफ हथियारों से लड़ने वाला क्रांतिकारी बना देगी।’
अशफाक बोले, ‘आप चांदी की तलवार न लाएं बल्कि लोहे की ला दें। उसे कोई नहीं छीनेगा।’ मां-पिता हंस पड़े। उन्हें क्या पता था कि तलवार की मांग उनके बेटे को आगे चलकर अंग्रेजों के खिलाफ हथियारों से लड़ने वाला क्रांतिकारी बना देगी।’