बेहद दिलचस्प है सीएम अखिलेश के नाम की कहानी!
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(कुमार भवेश चंद्र)क्या आपको पता है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का नाम खुद उनकी मर्जी से तय हुआ था। इसकी तस्दीक अपने ऊपर लिखी एक किताब में अखिलेश खुद कर चुके हैं। कहानी बहुत ही दिलचस्प है।
बचपन में टीपू कहलाने वाले अखिलेश जब चार साल के हो गए तो तय हुआ कि उन्हें स्कूली पढाई के लिए सैफई के पास के शहर इटावा में भेज दिया जाए। उनके चाचा राजपाल सिंह और शिवपाल यादव तब इटावा में ही रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे थे।
इटावा के सैंट मेरी स्कूल की टीचर ने बाल अखिलेश से जब उसका नाम पूछा तो उन्होंने तपाक से कहा... टीपू। टीचर ने इस नाम को दर्ज कराने में हिचक दिखाई तो एडमिशन कराने गए मुलायम के सहयोगी एडवोकेट एसएन तिवारी ने बालक टीपू को कई नाम सुझाए। तब टीपू ने अपने लिए अखिलेश नाम चुना। इसके बाद ही बाल टीपू अखिलेश यादव बन गए, और अब वे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।
यह किस्सा मैं आपको इसलिए बता रहा हूं, क्योंकि उस बाल टीपू और अब सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश के सामने एक बार फिर कुछ नाम तय करने का सवाल था।
अपने मंत्रियों के नाम, लेकिन क्या मुख्यमंत्री को अब भी उतनी आजादी थी? शायद नहीं! 2012 के चुनाव से ठीक पहले पार्टी के टिकट के लिए एक नाम को ठुकराकर अखिलेश ने अपना एक नाम बनाया था। अपनी पार्टी के लिए डीपी यादव के दरवाजे बंद कर अखिलेश प्रदेश के नौजवानों की उम्मीद बन गए थे।
आज उस अखिलेश को उन नाम पर भी सहमति जतानी पड़ी है, जिन्हें उनकी अपनी पसंद का नाम नहीं माना जा रहा है। शायद वह पसंद नहीं करते हैं। पर, शायद जमीनी हकीकत और चुनावी मजबूरी सियासत का सच होती हैं।
पार्टी व सीनियर्स का माना जा रहा है फैसला
कैबिनेट मंत्री के रूप में प्रमोट किए गए, विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह के रूप में यह पहला नाम है। लेकिन पंडित जिस इलाके से आते हैं वहां की जमीनी जरूरत के लिहाज से यह फैसला पार्टी और सीनियर्स का माना जा रहा है।
शनिवार को मंत्रिपरिषद में शामिल किए गए नए चेहरों में कई अखिलेश के मिशन को लेकर उम्मीद तो जगाते हैं, पर इसी सूची में दबंगों का नाम देखकर यह अहसास जरूर होता है कि अखिलेश को अभी भी फ्री हैंड नहीं मिल पाया है।
यह बात और है कि पार्टी और उनके सीनियर्स ने उन पर पहले से अधिक भरोसा जताया है। पर इस टीम के साथ वे अपनी और अपनी पार्टी इस सियासी मजबूरी को पूरी तरह छिपा नहीं पाए हैं।
जाहिर है, वे कुछ दाग-धब्बों के साथ ही 2017 के चुनावों का सामना करने की ओर बढ़ रहे हैं। पार्टी के कुछ घिसे-पिटे और प्रभाव खो चुके चेहरों से तो अखिलेश ने मुक्ति पा ली है, लेकिन आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि नए चेहरों में से वो कौन से चेहरे हों जो अपने काम से जनता के बीच अपनी नई छवि बना पाते हैं।
यह तो तय ही है कि समाजवादी पार्टी अखिलेश के चेहरे के साथ ही 2017 के चुनाव मैदान में भी खम ठोकेगी। पर, अगर उनकी टीम से अपने काम के चलते कोई नया चेहरा सामने नहीं आया तो अखिलेश और उनकी पार्टी के लिए यह जंग इतना आसान नहीं रह जाएगा।