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नवाबों के शहर में कर्मचारी लगा रहे हैं 17 हजार की क्रीम

Tue, 27 Sep 2016 01:50 PM IST
ज्ञान सक्सेना/अमर उजाला, लखनऊ
ज्ञान सक्सेना/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 27 Sep 2016 01:50 PM IST
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केस एक : जवाहर भवन में कल्याण निगम के मुख्य सेल्स डिपो से 5 सितंबर को राज्य कर्मचारी कार्ड नंबर 042186 से 432 पीस फेयर एंड लवली ली गई। वैट मुक्त दर से एक पीस क्रीम 40.25 रुपये की पड़ी। लाला नाम के इस शख्स ने 17,388 रुपये चुकाए।

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केस दो: 8 सितंबर जवाहर भवन में कल्याण निगम के मुख्य सेल्स डिपो से कार्ड संख्या 043475 यूजर नेम मेहुल के नाम से तीन सेल्स इनवॉइस जारी हुईं।  इसमें एक इनवॉइस पर 12,160 रुपये का विम बार खरीदा गया है। 
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दूसरी इनवॉइस के अनुसार, रिन एएलए 500 एमएल और फिर विम बार के 350 पीस खरीदने पर 16440 रुपये चुकाए गए। इसी तारीख को इसी शख्स के नाम पर काटी गई तीसरी इनवॉइस बताती है कि उसने फिर रिन बार के 80 ग्राम के 2880 बार खरीदा और 12,384 रुपये चुकाए। यानी मेहुल का एक महीने का बर्तन और कपड़े धोने का खर्च 40,984 रुपये है।
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नवाबों के शहर के ढेरों किस्से आपने सुने होंगे। इस शहर के कर्मचारी भी नवाबी ठाट से रहते हैं। एक कर्मचारी का बिल देखिए तो 17 हजार से ज्यादा का महीने में फेयर एंड लवली खरीद डालता है तो दूसरे के घर में कपड़ा और बर्तन धुलने में 40,984 रुपये का डिटर्जेंट खर्च हो जाता है। यकीनन आप चौंकेंगे। 

पर राज्य कर्मचारियों को सस्ती दर पर सामान मुहैया कराने वाले कर्मचारी कल्याण निगम और फैमिली बाजारों के कर्मचारी ऐसी खरीदारी पर चौंकते नहीं। जाहिर है कि ये सामान खरीदकर या तो बाजार में खपाए जा रहे हैं और वैट को चूना लगाया जा रहा है या फिर निगम के कर्मचारी फर्जी इनवॉइस तैयार कर माल बाजार में पहुंचा रहे हैं।

छूट पर लूट के ल‌िए चल रहा है खेल

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शहर में कर्मचारी कल्याण निगम के 40 बिक्री डिपो हैं। यही नहीं एक दर्जन फैमिली बाजार भी संबद्ध किए गए हैं। इनसे राज्य सरकार के कर्मचारियों व रिटायर्ड कर्मचारियों, निगम व अर्द्ध सरकारी इकाइयों के कर्मियों को सस्ती दर पर रोजमर्रा का सामान मुहैया कराया जाता है। 

इनपर लिए जाने वाले सामान पर 5 से 14.5 फीसदी तक वैट में छूट मिलती है। यानी इस छूट की ‘लूट हो रही है।जवाहर भवन डिपो से लेकर हर जगह यह खेल चल रहा है। पर, कर्मचारी कल्याण निगम प्रशासन के जिम्मेदार कार्रवाई के नाम पर बस चुप्पी साधे हैं। इससे साफ है कि सब कुछ सेटिंग से चल रहा है। कर्मचारी के कोटे का सामान कहीं और बेचकर हर दिन लाखों की चपत लगाई जा रही है। 

दरअसल कर्मचारियों व रिटायर्ड कर्मचारियों को इन सेल्स डिपो और फैमिली बाजार से विभागीय आईकार्ड, पेंशन कार्ड के आधार पर उनका कार्ड बनाया जाता है। यह कार्ड बन जाने के बाद आईकार्ड या पेंशन कार्ड नहीं दिखाना पड़ता। 

आईकार्ड की अनिवार्यता नहीं होने से डिपो के कर्मचारी मिलीभगत से सस्ता सामान दुकानों पर पहुंचा कर अपनी जेब भर लेते हैं। इस बहाने डिपो का सेल्स रिकॉर्ड बढ़ाने में भी उन्हें कामयाबी मिल जाती है और अपनी जेब भरने में भी।

ऐसा भी कारनामा...

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निगम के फैमिली बाजारों से भी यही खेल चल रहा है। यह सब कितने बड़े पैमाने पर हो रहा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों स्वास्थ्य महानिदेशालय परिसर में चल रहे डिपो से तय कोटे से 500 गुना ज्यादा बिक्री हुई। 

इसको लेकर उत्पादों की सप्लाई करने वाली कंपनी हिंदुस्तान लीवर ने न सिर्फ आपत्ति दर्ज करायी थी बल्कि इस डिपो को कुछ माह तक सामान की सप्लाई पर भी रोक लगा दी।

कर्मचारी कल्याण निगम डिपो के जिम्मेदारों के अनुसार शहर में दो दर्जन से अधिक सेल्स डिपो व इकाई और 13 फेमिली बाजारों के माध्यम से औसतन हर दिन चार से पांच लाख की बिक्री होती है। ऐसे में माह के बीस कार्य दिवस को भी आधार लिया जाए तो हर माह 14.5 प्रतिशत की दर से सरकारी खजाने को करीब 15 लाख की चपत लगती है। फैमिली स्टोर के गोरखधंधे के कारण यह चपत बढ़ कर हर माह 18 से 20 लाख तक पहुंचने का अंदेशा है।

कर्मचारी कल्याण निगम के अधिशासी निदेशक श्रीप्रकाश गुप्ता का कहना है, सेल्स डिपो व फेमिली बाजार से गैर राज्यकर्मियों को सस्ती दर की उपभोक्ता सामग्री बेचने की शिकायतों को गंभीरता से लिया गया है। इसकी रोकथाम के लिए सचल दल बना कर औचक जांच की जाएगी। जहां भी गड़बड़ी मिलेगी वहां के प्रभारी को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानते हुए कार्रवाई की जाएगी।
श्रीप्रकाश गुप्ता अधिशासी निदेशक कर्मचारी कल्याण निगम

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