'इस समय' यादव की गिरफ्तारी, कहीं सियासी खेल तो नहीं!
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अरबों की काली कमाई के आरोपी नोएडा अथारिटी के निलंबित चीफ इंजीनियर यादव सिंह की गिरफ्तारी के पीछे कहीं सियासी खेल तो नहीं है। यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में सीबीआई पर सियासी आकाओं के इशारों पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं।
केस दर्ज होने के बाद यादव सिंह की गिरफ्तारी के लिए इतना वक्त दिए जाने से उसके सभी गुनाहों के पकड़ में आने पर संदेह जताया जा रहा है।
सुपर कॉप जेएफ रिबेरो चार महीने पहले ही सीबीआई के कामकाज पर अंगुलि उठा चुके हैं। उनका कहना है कि सीबीआई सत्ता में बैठे आकाओं के इशारे पर काम करती है।
यादव सिंह सपा-बसपा, दोनों ही सरकारों में चहेते रहे हैं। वे यादव के साथ या उसके बचाव में खड़े नजर आते हैं।
सीबीआई ने केस दर्ज करने के 6 माह बाद यादव सिंह की गिरफ्तारी की है। सियासी और प्रशासनिक हल्कों में चर्चा है कि यादव सिंह को जांच एजेंसी ने गिरफ्तारी से पहले बहुत मौका दिया है। सियासी लोगों के वरदहस्त के चलते बहुत सारे मामलों में पुख्ता सबूत शायद ही मिल पाएं।
सियासी मोहरे की तरह इस्तेमाल हो सकते हैं यादव सिंह
ऐसे में जांच एजेंसी के लिए उनके सारे गुनाहों को पकड़ पाना आसान नहीं होगा। खासतौर से तब, जब सीबीआई की भूमिका पर भी अंगुलियां उठती रही हों। दरअसल, यादव सिंह ऐसा मोहरा हैं, जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकार बसपा-बसपा के खिलाफ कर सकती है। इसी कारण पूरे मामले के पीछे सियासी खेल को भी नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है।
जस्टिस (रिटायर्ड) एमबी शाह की अध्यक्षता में काले धन की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने फरवरी 2015 में सीबीआई को यादव सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर जांच करने के लिए कहा था। इसके बावजूद सीबीआई ने यादव सिंह और उसके सहयोगियों के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया था।
जांच शुरू करने के लिए हाईकोर्ट के आदेश का इंतजार किया गया। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 16 जुलाई 2015 को यादव सिंह के घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दिए। 30 जुलाई को सीबीआई ने मुकदमा पंजीकृत किया।
केस दर्ज होने से छह माह बाद बुधवार को यादव सिंह की गिरफ्तारी हुई है। यानी मामला दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी में छह माह की देरी करके यादव को बचाव का पूरा मौका दिया गया।
सीबीआई की कार्रवाई से आरोपियों की मदद
भारत पुनरोत्थान अभियान (आईआरआई) से जुड़े सेवानिवृत्त जेएफ रिबेरो ने सीबीआई और सियासी लोगों की मंशा पर पहले ही सवाल खड़े किए थे। हाईकोर्ट से सीबीआई जांच का आदेश हो जाने के बाद उन्होंने एसआईटी के अध्यक्ष जस्टिस शाह को पत्र लिखा था।
कहा था कि सीबीआई जांच यादव सिंह व अन्य आरोपियों को मदद पहुंचाने वाली और पक्षपातपूर्ण है। सीबीआई को एसआईटी के निर्देश के बाद फरवरी 2015 में मामला दर्ज करना चाहिए था तभी गिरफ्तारी होनी चाहिए थी। सीबीआई कुछ खास वजहों से यादव सिंह के प्रति नरमी बरत रही है।
दोषियों को पूरा मौका दिया जा रहा है कि वे सबूतों से छेड़छाड़ करते रहें और जनता की नजरों में मामला ठंडा पड़ जाए। यह दर्शाता है कि कई दलों के नेताओं से संबंध होने की वजह से ऐसा किया गया।
उन्होंने एसआईटी से सीबीआई जांच में निगरानी करने का आग्रह किया था। रिबेरो ने यह भी कहा था कि सीबीआई सत्ता में बैठे आकाओं के इशारों पर काम करती है। किसे गिरफ्तार किया जाए और किसे छोड़ा जाए, यह सीबीआई तय करती है।
सपा, बसपा के नजदीकी रिश्ते रहे हैं जगजाहिर
बसपा शासन में चंद प्रभावशाली नेताओं से यादव सिंह के रिश्ते जगजाहिर थे। जांच के दौरान इसका खुलासा भी हुआ। सपा सरकार आई तो यादव सिंह को निलंबित कर दिया गया। उनके खिलाफ नोएडा के सेक्टर-9 थाने में मामला दर्ज हुआ। सपा नेताओं से नजदीकियां बढ़ी जांच सीबीसीआईडी को स्थानांतरित कर दी गई।
यादव सिंह को न केवल बहाल किया गया ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे का अतिरिक्त चार्ज भी दे दिया। नवंबर 2014 में आयकर के छापों के बाद उसे पद से तो हटाया लेकिन कार्रवाई पर चुप्पी साधे रखी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जांच को एसआईटी ने अपने हाथों में ले लिया तब जाकर उसे दोबारा निलंबित किया गया।
कहीं हो न जाए एनआरएचएम जैसा हाल
एनआरएचएम घोटाला 5700 करोड़ रुपये का था लेकिन इसे लेकर तमाम लोगों के खिलाफ चल रही जांच एक हजार करोड़ रुपये तक भी नहीं पहुंची। इसी तरह यादव सिंह ने नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे अथारिटी में ठेकों, प्लाटों या फर्जी कंपनियों के जरिये 9200 करोड़ के ठेकों, प्लाटों अन्य तरीकों से घोटाला किया।
जिस तरह से केस दर्ज होने और छापेमारी के बाद गिरफ्तारी में इतना वक्त दिया गया है, उससे लगता है कि कुछ सबूतों को मिटाने में मदद मिली होगी। हो सकता है कि इस घोटाले का आकार भी घटकर सैकड़ों करोड़ तक रह जाए।