स्थापना दिवस: भूगोल, सियासत, नाम... सब बदला पर हमेशा बना रहा देश का मुकुट...यह उत्तर प्रदेश है
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आबादी के लिहाज से विश्व में 5वें देश की संज्ञा से नवाजे जाने वाले उत्तर प्रदेश का इतिहास काफी पुराना और उतार-चढ़ाव वाला रहा है। कभी उत्तर-पश्चिम प्रांत (आगरा प्रेसीडेंसी), कभी संयुक्त प्रांत आगरा व अवध और कभी केवल संयुक्त प्रांत। सीमाएं कभी मध्य प्रदेश में शामिल हो चुके कई क्षेत्रों तक फैली हुईं तो आज ललितपुर तक सिमटी हुई और चित्रकूट को दो हिस्सों में बांटती हुई। राज्य का नाम ही नहीं बदलता रहा बल्कि राजधानी भी बदलती रही। यह सिलसिला 1921 में रुका और तबसे लखनऊ के सिर पर ही राजधानी का मुकुट सजा है।
मजेदार बात तो यह है कि तमाम उतार-चढ़ाव के बाद मौजूदा उत्तर प्रदेश को आधिकारिक नाम मिला आजादी के बाद भारतीय संविधान लागू होने से ठीक दो दिन पहले 24 जनवरी 1950 को जब भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल के यूनाइटेड प्रॉविंसेज आल्ट्रेशन ऑफ नेम ऑर्डर 1950 पारित होने से। इन सैकड़ों साल में अगर एक बात नहीं बदली तो वह है उत्तर प्रदेश का महत्व, क्योंकि मौजूदा उत्तर प्रदेश सभी नामों में शामिल रहा... अखिलेश वाजपेयी की रिपोर्ट
70 साल पहले अस्तित्व में आया उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश को अस्तित्व में आए 70 साल हो गए। मुगलों, नवाबों और अंग्रेजों के शासन में सियासी, भौगोलिक और आर्थिक बदलावों से जूझकर अस्तित्व में आए उत्तर प्रदेश में इन 70 वर्षों में काफी बदलाव हुए। सियासत बदली, आजादी के बाद जो कांग्रेस आसमान पर दिखती थी, वह आज फर्श पर भी नहीं दिख रही। 15वीं शताब्दी से बदलता राज्य का भूगोल उत्तर प्रदेश का अस्तित्व आने का बाद उत्तराखंड बनने पर फिर बदला, सत्ता-प्रशासन का तौर-तरीका बदला। राजनीतिक धारा बदली। बसपा जैसी कुछ नई राजनीतिक धाराएं भी निकलीं।
शुरुआती दिनों में कांग्रेस का ही एक हिस्सा समाजवादी धारा तमाम हिस्सों मेें बंटती-बंटती आज की समाजवादी पार्टी, प्रसपा और रालोद जैसे धड़ों में खड़ी हो गई। इन सात दशकों में यूपी के नाम के साथ तमाम उपलब्धियां जुड़ीं लेकिन इस प्रदेश ने विसंगतियों के भी कम कीर्तिमान नहीं बनाए।
पहली महिला राज्यपाल व पहली महिला मुख्यमंत्री बनाने का रिकॉर्ड भी यूपी के नाम
सरोजनी नायडू के रूप में देश में पहली महिला राज्यपाल और सुचेता कृपलानी के रूप में पहली महिला मुख्यमंत्री बनाने का रिकॉर्ड भी यूपी के नाम है। नरेंद्र मोदी ऐसे पहले राजनेता नहीं हैं जिन्होंने दूसरे राज्य से आकर यहां से राजनीति में हाथ आजमाया। आचार्य जेबी कृपलानी और सुचेता कृपलानी जैसे कई नेताओं ने उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। हालांकि इसी उत्तर प्रदेश के नाम दलबदल की शुरुआत कराने का दाग भी लगा है। जब 1967-68 में चंद्रभानु गुप्त की सरकार गिराने के लिए चौधरी चरण सिंह ने अपने 15 साथियों के साथ विधानसभा के भीतर दलबदल किया।
पहली बार जनसंघ, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों को पहली बार एक साथ एक मंच पर आते हुए भी यूपी ने ही देश को दिखाया। हालांकि यह सरकार भी नहीं चली। विधानसभा में सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच मारपीट की घटना ने तो यूपी के चेहरे पर काला धब्बा लगाया ही, मुख्यमंत्री मायावती का 16 मिनट में 90 से ज्यादा विभागों का बजट पारित कराना और राज्य को चार हिस्सों में बांटने का एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित कराने की घटना भी यूपी के इन 70 वर्षों के सफर कसैली यादों के रूप में इतिहास में दर्ज हुई। सपा ने इसका जमकर विरोध किया था। हालांकि इससे पहले बतौर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में भी बजट बिना चर्चा के पारित कराया था, तब भी भारी हंगामा हुआ था। वहीं उत्तर प्रदेश ने स्टेट गेस्ट हाउस कांड के रूप में सियासत में बाहुबल का इस्तेमाल भी देखा।
सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री सबसे कम कार्यकाल भी
देश की सियासत में उत्तर प्रदेश का दबदबा यूं ही नहीं माना जाता है। बड़ा प्रदेश, बड़ी आबादी और देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी हिस्सेदारी। राज्यसभा में भी सबसे ज्यादा प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश के। देश का पहला प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से। देश की आजादी की लड़ाई का बड़ा केंद्र उत्तर प्रदेश। देश के 15 प्रधानमंत्रियों में से नौ प्रधानमंत्री सिर्फ उत्तर प्रदेश से।
डॉ. मनमोहन सिंह को अपवाद मानें तो उत्तर प्रदेश के अलावा किसी राज्य के हिस्से दो और दो से अधिक बार किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने का तमगा नहीं है। देश को इंदिरा गांधी के रूप में अब तक एकमात्र महिला प्रधानमंत्री देने का कीर्तिमान भी उत्तर प्रदेश के ही नाम है। अटल बिहारी वाजपेयी के रूप सबसे कम सिर्फ 13 दिन के प्रधानमंत्री देने का रिकॉर्ड भी यूपी के हिस्से में है।
तब कांग्रेस, अब भाजपा
इन 70 वर्षों में उत्तर प्रदेश की सियासत विभिन्न रास्तों और कई प्रयोगों से गुजरती हुई एकदम बदल गई। तब कांग्रेस अर्श पर थी, लेकिन आज वह फर्श पर भी ठीक से नहीं खड़ी है। उत्तर प्रदेश के जन्म के समय जिस जनसंघ या भाजपा का अस्तित्व भी नहीं था, वह आज अर्श पर है। सियासत में यह बड़ा बदलाव करने वाला प्रमुख कारक उत्तर प्रदेश का ‘राम मंदिर’ रहा। इसनेे न सिर्फ उत्तर प्रदेश में सियासी बदलाव किया, बल्कि देश की राजनीतिक धारा बदल दी।
उत्तर प्रदेश के सफर के ये 70 साल देश और प्रदेश की सियासत में भाजपा को मजबूती देने वाले ‘राम मंदिर’ विवाद के प्रमुख संघर्ष की शुुरुआत से लेकर विवाद के समाधान के भी साक्षी बने। दिलचस्प तो यह देखना भी है कि इन 70 वर्षों में एक पार्टी के विधायकों की संख्या अब तक चार बार 300 के पार पहुंची। दो बार यह कीर्तिमान कांग्रेस के खाते में दर्ज हुआ, एक बार जनता पार्टी के और अब यह भाजपा के खाते में दर्ज है।
राजनीतिक पार्टियों का उदय व अवसान
इन्हीं 70 वर्षों में जनसंघ व भाजपा ही नहीं, अपितु बहुजन समाज पार्टी के रूप में प्रदेश से अनुसूचित जातियों की सियासी ताकत की पहचान कराने वाली धारा भी निकली। इसने नौ साल के अंदर मुलायम सिंह यादव के साथ साझा सरकार बनाकर अपनी ताकत का एहसास कराया। साथ ही 25 साल के अंदर ही अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर भी दिखाया। इसके बाद ऐसा ग्राफ गिरा कि 2014 में बसपा का एक भी सांसद लोकसभा नहीं पहुंचा।
यही नहीं, इन 70 वर्षों में उत्तर प्रदेश ने 2014 में एक भी मुस्लिम को संसद न भेजकर एक नया रिकॉर्ड बनाया। साथ ही यूपी की सियासत में 19 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिमों की सियासी ताकत पर सवालिया निशान लगा दिया। समाजवादियों की सियासी ताकत के बंटवारे का भी उत्तर प्रदेश गवाह बना। कई प्रयोग हुए। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी, लोकदल और राष्ट्रीय लोकदल व समाजवादी पार्टी जैसे नामों से पार्टियां बनीं। आखिर में 1992 में मुलायम सिंह ने सपा बनाकर राजनीति शुरू की। सपा ने वर्ष 2012 में प्रदेश में अपने बल पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। पर, बाद में इसका भी यही हाल हुआ और इसका विभाजन हो गया।