लगन और प्रशिक्षण से दे रहे निशक्तता को मात
- ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे अलग-2 क्षेत्र में दिखा रहे अपनी प्रतिभा
- प्रशिक्षण, माता-पिता का सहयोग, खुद की जिज्ञासा बना रही सकारात्मक माहौल
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विस्तार
ऑटिज्म एक तरह से मानसिक मंदता जैसी बीमारी है। इसमें अंतर यह है कि बच्चा ठीक से संवाद नहीं कर पाता। बच्चा बहुत हाइपरएक्टिव होता है। वह पढ़ाई में तेज हो सकता है, लेकिन उसे अकेला रहना पसंद होता है। मेडिकल की भाषा में इसे ऑटिज्म स्प्रेक्ट्रम डिसऑर्डर कहा जाता है।
इसकी वजह इंद्रधनुष के रंगों की तरह हर बच्चे में विविधता का पाया जाना है। यह एक तरह की न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इससे बच्चे की सामाजिक कौशल, भाषा या संवाद की कमी और व्यवहार से जुड़ी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। चिकित्सकों का कहना है कि यह कोई बीमारी नहीं है।
यह केवल एक मानसिक अवस्था है। इससे सही प्रशिक्षण से काफी हद तक सामान्य किया जा सकता है। यदि सही समय पर इलाज व सलाह न दी जाए तो उनमें डिप्रेशन जैसी अन्य मानसिक बीमारियां पनपने लग जाती हैं। ऐसा भी देखने में आया कि समाज से विरक्त होने के कारण ऐसे बच्चे आत्महत्या भी कर लेते हैं।
ऑटिज्म से पीड़ितों को अगर सही प्रशिक्षण, परिवार का सहयोग मिले तो उनकी जिंदगी आसान हो जाती है। लखनऊ के ही कई ऐसे बच्चे अपने रोजमर्रा के काम खुद करने के अलावा अपने साथियों से हटके योग्यता विकसित कर चुके हैं।
ये बच्चे न सिर्फ स्किल डवलपमेंट में हाथ आजमा रहे हैं बल्कि कला के क्षेत्र में अपने हुनर का शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे वे दूसरे बच्चों के लिए प्रेरणा बन गए हैं।
ओजू की पेंटिंग के सब दीवाने, जीते कई पुरस्कार
ओजस्विन, उम्र 13 साल
नैनीताल के मूल निवासी ओजस्विन उर्फ ओजू सौभाग्यशाली रहा, जो उसके मां-बाप इलाज के लिए उसे सही जगह ले गए और उन्हें शुरुआत में ही पता चल गया कि उनका बेटा ऑटिज्म का शिकार है।
ओजू चार साल का था, उस समय से ही उसकी विशेष ट्रेनिंग चल रही है। उसकी मां हाउस वाइफ हैं और पिता बीमा कंपनी में अधिकारी हैं।
सक्सेस स्टोरी : ओजू की बीमारी पता चलने के बाद माता-पिता ने उसे लाचार बनाने की जगह मजबूत बनाने का फैसला लिया। दिल्ली के मिरांडा हाउस से पढ़ी मां ने एक्शन फॉर ऑटिज्म संस्था से अपने बेटे के लिए कोर्स भी किया ताकि उसे सही परवरिश मिले।
उसे स्पेशल स्कूल में भेजा गया। ओजू कई प्रतियोगिताओं में भाग ले चुका है। इनमें पेंटिंग बनाकर उसने अवार्ड भी जीते।
टैबलेट पर किशोर दा के गीत सुनने का शौकीन
श्रेयांस, उम्र-7 साल
श्रेयांस जब तीन साल का हुआ, तब उसके माता-पिता को पता चला कि उसे ऑटिज्म है। इससे पहले उसे बहरापन का शिकार मान लिया गया।
इसका इलाज भी शुरू हो गया। प्राइवेट जॉब करने वाले पिता को क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट ने जब उन्हें बताया कि वह बहरा नहीं है। असल में उसे अपनी बात दूसरे तक पहुंचाने में दिक्कत है। उसे ऑटिज्म बताया गया। इसके बाद उसका प्रशिक्षण शुरू हुआ।
सक्सेस स्टोरी : चार साल के लगातार प्रशिक्षण के बाद अब श्रेयांस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के काम खुद ही करता है। उसे गाने सुनने और नए-नए विज्ञापन देखने का बहुत शौक है। उसके ट्रेनरों ने पाया कि उसको आइकॉन पहचानने में बहुत आसानी होती है।
इससे श्रेयांस को टैबलेट और मोबाइल चलाने के लिए दिया गया। थोड़ी सी निगरानी के बाद अब श्रेयांस अपने पसंदीदा गाने जिनमें ज्यादातर किशोर कुमार के होते हैं, खुद ही सर्च कर लेता है। नए-नए विज्ञापन भी वह यूट्यूब पर खुद ही देख लेता है।
फैशन का शौक पूरा करने में अव्वल
काव्या, उम्र 8 साल
आठ साल की काव्या के घर वाले डेढ़ साल पहले तक उसे ऑटिज्म की शिकार मानने के लिए तैयार नहीं थे। छह साल की होने तक उसको बहरापन ही नोटिस किया गया।
डेढ़ साल पहले उसकी काउंसलिंग हुई तो पता चला कि वह ऑटिज्म की शिकार है। उसकी समस्या यह थी कि उसे मिर्गी के दौरे भी पड़ते हैं।
सक्सेस स्टोरी : काव्या का जब प्रशिक्षण हुआ तो उसकी योग्यता सामने आने लगी। उसे रंगों और नए-नए कपड़ों का बहुत शौक है। अपने स्पेशल स्कूल में वह अकेली है जोकि कभी यूनीफार्म में नहीं जाती।
तलाकशुदा और नौकरीपेशा मां की बेटी काव्या की देखरेख उसकी नानी ही करती हैं। प्रशिक्षण से काव्या की योग्यता निखरी। आज वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती है। काव्या का कहना है कि उसका पसंदीदा गाना इत्ती सी हंसी... है, जिस पर वह डांस करना पसंद करती है।
55 साल की उम्र में भी जज्बा
संतोष तिवारी आज 55 साल के हो चुके हैं। 1990 में उन्हें ऑटिज्म की बीमारी का पता चला। माता-पिता ने उसी समय उनका इलाज और प्रशिक्षण शुरू करा दिया। इससे वह अपने रोजमर्रा के काम खुद करने में सक्षम हो गए।
इसका फायदा यह हुआ कि आज वह अपने माता-पिता की मौत के बाद अपने भाई-भाभी पर बोझ नहीं बने। अपनी शेव तक वह खुद करते हैं। ब्लेड पुराना हो जाने पर अपने भाई से इसे बदलवा भी लेेते हैं। उम्र के साथ उनकी सेहत जरूर अब गिरती जा रही है।
बीमारी की पहचान के लिए ‘ऑटिज्म डायग्नोस्टिक स्केल 2014
ऑटिज्म के कारण
- प्रदूषित वातावरण
- हवा और दूसरे पदार्थों में लेड की मौजूदगी
- अनुवांशिकता
- प्रसव अथवा प्रसव के बाद होने वाली समस्याएं
- कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग
- खाद्य पदार्थों में रसायनों का उपयोग
ऑटिज्म के लक्षण
- हाथ फड़फड़ाना
- अंगुलियां घुमाना
- गोल-गोल घूमना
- सर पटकना
- रोशनी को एकटक देखना
- कान में अंगुली डालना
- खिलौनों को क्रमबद्ध करके लगाना
- खिलौनों से असामान्य ढंग से खेलना
- घूमती हुई चीजों को देखना
- शब्दों एवं आवाजों का दोहराना
- नजरें ना मिलाना
- हम उम्र बच्चों से घुलने-मिलने में परेशानी
- 16 से 18 माह की आयु तक कोई शब्द न बोल पाए
- अपना नाम पुकारने पर ध्यान न दे
ऑटिज्म की बीमारी की पहचान के लिए ‘ऑटिज्म डायग्नोस्टिक स्केल 2014’ में बनाया गया है, जिसके आधार पर देश भर में ऑटिज्म का परीक्षण किया जाता है।
इसके उपयोग क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट करते हैं। लखनऊ में इसकी सुविधा केजीएमयू और लोहिया संस्थान में मौजूद है। अगर आपका बच्चा 2 से 3 महीने में मुस्कुराना 3 से 5 महीने में सिर को स्थिर करना 4 से 5 महीने में लेटे-लेटे पलटना नौ महीने में बैठना 12 से 14 महीने में चलना 18 महीने में पांच छह शब्द बोलना दो साल में मम्मी खाना, मम्मी बाहर जैसे शब्द बोलना इन हावभावो को नहीं दिखाता है तो हो सकता है, वह ऑटिज्म से पीड़ित हो।