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जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव: हर हथकंडा अपना रही सपा

Thu, 07 Jan 2016 03:04 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 07 Jan 2016 03:04 AM IST
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SP stratigies for District Panchayat President election.

केस-1 : सीतापुर जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सपा की अधिकृत प्रत्याशी सीमा गुप्ता की जीत पक्की करने के लिए प्रशासन ने बागी विधायक रामपाल यादव एवं उनके करीबियों पर शिकंजा कसा है। पहले तो प्रशासन आंखें मूंदे रहा, लेकिन जब सरकार का दबाव पड़ा तो अवैध खनन के  नाम पर बड़े पैमाने पर धर-पकड़ शुरू कर दी गई।

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बिसवां में निलंबित विधायक के एक करीबी की गैस एजेंसी के गोदाम को सीज कर दिया गया। इसके बाद भी विधायक पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और खुलकर अपने बेटे जितेंद्र यादव की जीत पक्की करने में जुटे हैं।
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केस-2 : गोरखपुर में पार्टी की प्रत्याशी गीतांजलि की जीत के लिए सपा हर तरह के हथकंडे अपना रही है। निर्दल उम्मीदवार अजय बहादुर यादव के भाई व भाजपा विधायक विजय बहादुर यादव का आरोप है कि मंत्री राजकिशोर सिंह सत्ता का लाभ उठाकर पुलिस और एलआईयू के जरिये कुछ सदस्यों को गायब कर बाकी सदस्यों पर दबाव बना रहे हैं। सदस्यों को डराया-धमकाया जा रहा है।
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दिलचस्प बात यह है कि सपा के पूर्व प्रदेश सचिव कुंवर प्रताप सिंह, पूर्व जिलाध्यक्ष राम मिलन यादव, पूर्व उपाध्यक्ष मुख्तार अहमद के निष्कासन के बाद भी चुनाव में बगावत थमी नहीं है।

विरोधियों के खिलाफ जारी कर दिया वारंट

SP stratigies for District Panchayat President election.

केस-3 : बिजनौर में तो सपा की अंदरूनी लड़ाई खुलकर सामने आ गई है। वहां चुनाव बेहद कांटे का हो गया है। निलंबित विधायक रुचि वीरा के समर्थक जिला पंचायत सदस्यों पर प्रशासन ने शिकंजा कस दिया है।

जिन सदस्यों के पांच लाख के मुचलके किए गए थे, उन सबके खिलाफ वारंट जारी कर दिए गए हैं। प्रत्याशी उदयन वीरा का आरोप है कि सत्ताधारी दल के नेताओं के दबाव में प्रशासन यह कार्यवाही कर रहा है। सपा प्रत्याशी नीलम पारस की जीत पक्की करने के लिए शासन-प्रशासन हर तरह के हथकंडे अपना रहा है।

केस-4 : संतकबीरनगर में नाम वापसी के एक दिन पहले जिला पंचायत अध्यक्ष पद की प्रत्याशी नीना के पति अरुण कुमार पप्पू की गैस एजेंसी सील कर दी गई। उनके ऊपर इस कदर दबाव बनाया गया कि अंतत: उन्होंने नाम वापस ले लिया और संतोष यादव निर्विरोध चुनाव जीत गए।

बागियों को सबक सिखाने में नहीं छोड़ रही कसर

SP stratigies for District Panchayat President election.

ये चंद मामले हैं, जिन्होंने जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव की निष्पक्षता और सत्ताधारी समाजवादी पार्टी की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस चुनाव के जरिये सूबे में सियासी चौधराहट कायम करने की सपा की मंशा पूरी तरह उजागर हो गई है।

जिला पंचायत अध्यक्ष की ज्यादा से ज्यादा सीटें अपने खाते में दर्ज कराने के लिए पार्टी बगावत पर उतारू अपने विधायकों और नेताओं तक को बख्शने के लिए तैयार नहीं है।

36 जिलों में पार्टी के निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिए जाने के बाद सपा अब बृहस्पतिवार को 36 जिलों में होने जा रहे मतदान से पहले अपने प्रत्याशियों की जीत का रास्ता साफ करने के लिए हर तरह का दांव व हथकंडा अपना रही है।

एक ओर जहां मुकाबले में डटे प्रत्याशियों पर जायज-नाजायज दबाव बनाया जा रहा है तो बागियों को सबक सिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जा रही।

भाजपा-बसपा ने भी सपा के सामने घुटने टेके

SP stratigies for District Panchayat President election.

हैरत की बात यह है कि जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में अपने-अपने उम्मीदवारों की जीत का बढ़-चढ़कर दावा करने वाली बसपा व भाजपा ने भी इस चुनाव में सपा के सामने घुटने टेक दिए हैं। विपक्षी दलों ने अब पूरी तरह चुप्पी साध रखी है।

जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में सपा के अलावा दूसरा दल मैदान में नहीं दिखाई दे रहा। अलबत्ता सीतापुर, बिजनौर, गोरखपुर जैसे कुछ जिलों में सपा के मुकाबले उसके अपने ही ताल ठोककर चुनौती दे रहे हैं। विरोध को दबाने के लिए पार्टी ने कई विधायकों व नेताओं को निलंबित किया या बाहर का रास्ता भी दिखाया लेकिन कुछ जगहों पर चुनौती अब भी बररकार है।

दरअसल, सपा विधानसभा चुनाव से पहले जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के जरिये विरोधियों को अपनी सियासी ताकत का अहसास कराना चाहती है। यही वजह है कि ज्यादा से ज्यादा जिला पंचायतों पर कब्जे के लिए वह साम, दाम, दंड, भेद की नीति पर चल रही है।

फर्रुखाबाद में दबाव का असर दिखाई देने के बाद सपा अब इस कोशिश में है कि बृहस्पतिवार को होने वाले मतदान में भी उसे इसका फायदा मिले। प्रशासनिक मशीनरी भी इसमें सपा की पूरी मदद कर रही है।

क्लीन स्वीप करने की मंशा में सपा

SP stratigies for District Panchayat President election.

सपा की मंशा जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में क्लीन स्वीप करके विरोधियों को अपनी सियासी ताकत का अहसास कराने की है। पार्टी नेताओं की मानें तो चुनिंदा जिलों में ही दूसरे दलों के उम्मीदवारों से मुकाबला है। ज्यादातर जिलों में सपा के सदस्य जीते हैं।

ऐसे में ज्यादा से ज्यादा जिलों में सपा का ही अध्यक्ष बनना तय है। जिन 36 जिलों में चुनाव होने हैं, उनमें से भी कम से कम 30 सीटें सपा के खाते में आने की उम्मीद है।

भाजपा, बसपा ने डाले हथियार
जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में भाजपा और बसपा ने हथियार डाल दिए हैं। दोनों दलों ने प्रदेश स्तर से प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का कहना है कि जिन जिलों में समीकरण अनुकूल हैं, वहां चुनाव लड़ा जा रहा है। प्रदेश इकाई ने इसमें दखल नहीं दिया है और न ही उम्मीदवार घोषित किए हैं।

इसी तरह बसपा ने उम्मीदवारों का भी एलान नहीं किया है। जहां उसके समर्थक सदस्यों की संख्या ज्यादा है, वहां वह जरूर सपा से दो-दो हाथ करने के लिए मैदान में उतरी है। अंबेडकरनगर, हाथरस, अलीगढ़ समेत कई जिलों में बसपा के उम्मीदवार मैदान में हैं।

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